Spirit of a Fighter – Chapter 1048
पुल की लकड़ी मेरे पैरों के नीचे चरमराई, और पूरा रामपुर मेरे पीछे-पीछे चढ़ आया। सौ पहलवान सामने खड़े थे, हर एक की छाती फूली हुई, हर एक के हाथ में लाठी। पर मैं दीपक को देख रहा था। वो अपनी जगह से हिला नहीं।
"रुक," उसने हाथ उठाया। उसकी आवाज़ में वो दम था जो मैदान में गूँजकर दूर तक जाता है। "तेरे पिता ने मुझे मिट्टी दी थी, वीर। मुझे अपने हाथ से ईंटें उठाना सिखाया था। और फिर एक दिन उन्होंने मुझे बुलाकर कहा — भैरव के पास जा, उससे सीख।"
मेरे पैर वहीं रुक गए। उसकी बात मेरे सीने में एक ठंडी सुई की तरह उतर गई।
"तू झूठ बोल रहा है," मैंने कहा। पर मेरी आवाज़ में भरोसा नहीं था, और वो जानता था।
"झूठ?" उसने कमरबंद के नीचे से कुछ निकाला। पीली रोशनी। वो शीशी उसकी हथेली पर नाच रही थी। "ये तेरे पिता ने मुझे नहीं दी थी। ये मुझे भैरव ने दी थी, उस दिन जब तेरे पिता ने मुझे अखाड़े से निकाला। उसने कहा — तेरा गुरु तुझे छोड़ चुका, अब मैं तेरा गुरु हूँ।"
कालू काका ने मेरा कंधा पकड़ा। उनका हाथ काँप रहा था, पर आवाज़ साफ़ थी।
"दीपक," वो बोले, "तू उस दिन रोया था। मैंने तुझे रोते देखा था। भवानी के दरवाज़े पर बैठकर। याद है?"
दीपक की आँखें एक पल के लिए झुकीं। बस एक पल। फिर वो फिर से सख्त हो गईं।
"रोया था," उसने कहा। "क्योंकि उस दिन मुझे पता चला कि गुरुजी भी बाकी सब की तरह हैं। जो अपने बेटे को बचाने के लिए किसी और के बेटे को कुर्बान कर देते हैं।"
मेरी मुट्ठी भर गई। मैं आगे बढ़ा, पर पीछे से व्हीलचेयर की आवाज़ आई — चरमराती, धीमी, पर पूरे पुल पर भारी।
रणवीर सिंह आगे आए। दो आदमी उनकी गाड़ी धकेल रहे थे, और उनका चेहरा उस सुबह की धूप में और भी सफ़ेद लग रहा था। उन्होंने दीपक की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़, फिर कालू काका की तरफ़।
"दीपक," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो गरज लौट आई थी जो बीस साल से सोई थी। "तुझे भवानी ने भैरव के पास भेजा था। हाँ। ये सच है। पर क्यों भेजा था, वो तू जानता है?"
दीपक हिचका। उसकी उँगलियाँ शीशी पर कस गईं।
"सीखने के लिए," वो बोला। "ताकि मैं बड़ा पहलवान बनूँ।"
"नहीं।" रणवीर सिंह ने अपना हाथ उठाया, और उनकी उँगली काँप रही थी। "भवानी को उस रात पता चल गया था कि भैरव पहलवानों को पानी पिला रहा है। और उसके पास सबूत नहीं थे। तो उसने तुझे नहीं, तेरे जैसे दो और लड़कों को भैरव के पास भेजा। तीन लड़के, दीपक। तीन। जो सीखने नहीं गए थे — जो अंदर जाकर देखने गए थे कि वो पानी कहाँ से आता है, कौन पिलाता है, और किसके हाथ में रहता है।"
दीपक का चेहरा हिला। उसने एक कदम पीछे किया, फिर रुक गया।
"मैं…" उसकी आवाज़ फँसी। "मैं अकेला था। मुझे कोई और नहीं मिला।"
"क्योंकि बाकी दो को भैरव ने तेरे सामने से हटा दिया," रणवीर सिंह ने कहा। "एक को उसने शहर भेज दिया, दूसरे को… दूसरे को उसने बीमार कर दिया। तू बच गया क्योंकि तू चुप रह गया। तूने पूछना बंद कर दिया और पीना शुरू कर दिया।"
पुल पर सन्नाटा छा गया। मुझे अपने कानों में अपनी साँस सुनाई दे रही थी।
तभी भीड़ में से कोई हिला। एक बूढ़ा आदमी आगे आया — कुबड़ा, सफ़ेद दाढ़ी, हाथ में लाठी। उसके पीछे दो और। तीनों के चेहरे पर वो निशान थे जो सिर्फ़ पुराने पहलवानों के होते हैं — टूटी नाक, कटे कान, घुटनों की गठान।
"मैं बोलूँ, दीपक?" पहले बूढ़े ने कहा। उसकी आवाज़ में बल था, पर आँखें नम थीं। "मैं हूँ रामू। तेरे साथ मैं भी गया था उस दिन। हम तीन थे — तू, मैं, और ये बैजू। और हमें भी वही पानी दिया गया था।"
दीपक ने उसे देखा, और उसकी आँखों में कुछ टूटा।
"तुम…" वो फुसफुसाया। "तुम तो अखाड़े से चले गए थे।"
"चला गया था," रामू ने कहा। "क्योंकि तीसरे महीने मेरे हाथ काँपने लगे थे और मुझे समझ आ गया था कि ये ताकत नहीं, ये कर्ज़ है। और मैंने पीना छोड़ दिया। बैजू ने भी छोड़ दिया। तूने नहीं छोड़ा, दीपक। तू पीता रहा। और इसलिए आज तू उसके पास खड़ा है और हम यहाँ।"
दीपक की पकड़ शीशी पर ढीली पड़ी। उसने अपने हाथ की तरफ़ देखा, जैसे पहली बार देख रहा हो। उसकी उँगलियाँ पतली थीं, नसें उभरी हुईं, और चमड़ी पर वो पीलापन था जो सिर्फ़ उस पानी से आता है।
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। कालू काका ने मेरा हाथ पकड़ा, पर मैंने धीरे से छुड़ाया।
"दीपक," मैंने कहा। "तेरे कंधे पर जो निशान है — वो किसका है?"
उसने अपने बाएँ कंधे पर हाथ रखा, उस गोल जले निशान पर। उसका होंठ काँपा।
"तेरे पिता का," वो बोला। "उस दिन जब उन्होंने मुझे अखाड़े से निकाला, मैंने उनका हाथ पकड़ा था। उन्होंने मुझे झटके से हटाया और मैं तंदूर के पास गिरा। ये निशान वहीं से है। मैंने सोचा था कि वो मुझे जलाना चाहते थे।"
"वो तुझे बचाना चाहते थे," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ भर आई। "तू उस वक़्त तंदूर की तरफ़ गिर रहा था और भैरव के आदमी तेरे पीछे आ रहे थे। भवानी ने तुझे धक्का देकर बचाया। उनका हाथ तेरे कंधे पर लगा, इसलिए वो निशान है।"
दीपक की आँखें भर आईं। उसने शीशी को अपनी हथेली में दबाया, फिर उसे देखा, जैसे वो कुछ ऐसा हो जिसे उसने पहली बार पहचाना हो।
"मैंने बीस साल…" उसकी आवाज़ टूटी। "मैंने बीस साल उन्हें कोसा।"
वो अपने घुटनों पर गिर पड़ा। पुल की लकड़ी पर उसके हाथ टिके और शीशी उसकी उँगलियों से फिसलकर नीचे नहर में गिरी। पानी में एक पीली झलक उठी और फिर गायब हो गई।
रणवीर सिंह ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाएं। उनकी गाड़ी के दोनों तरफ़ के आदमियों ने उन्हें सहारा दिया, और वो आगे झुके। उन्होंने दीपक के दोनों कंधे पकड़े और उसे अपनी तरफ़ खींचा।
"तू भटका है," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ वो आवाज़ नहीं थी जो मैदान में गरजती है — ये वो आवाज़ थी जो कोई पिता अपने बेटे को सुनाता है। "तू बिगड़ा नहीं है। भवानी ने तुझे अपना बेटा कहा था, और भवानी का बेटा बिगड़ नहीं सकता। बस रास्ता भूल सकता है।"
दीपक ने उनका हाथ पकड़ लिया। उसके कंधे हिल रहे थे और वो कुछ नहीं बोल रहा था, बस उनके हाथ पर अपना माथा रख दिया। पीछे खड़े रामू और बैजू ने अपनी आँखें पोंछीं। गाँव की भीड़ में से कोई रो रहा था, कोई चुप था।
मैं वहीं खड़ा था और मेरा गला सूख रहा था। मेरे पिता ने इस आदमी को बचाया था। मेरे पिता ने उसके कंधे पर अपना हाथ रखा था — वो हाथ जिसे मैं कभी नहीं छू पाया।
मीरा ने मेरा हाथ थामा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर उसकी पकड़ मज़बूत थी।
"देख," उसने धीरे से कहा। "सौ से निन्यानवे हो गए।"
उसने सही कहा। दीपक के पीछे खड़े पहलवानों में से कुछ ने अपनी लाठियाँ नीचे कर दी थीं। उनके चेहरे देख रहे थे, एक-दूसरे को, और उनकी आँखों में वो शक था जो पहले नहीं था।
तभी ठाकुर आगे आया।
वो उस पूरे मैदान में अकेला दिख रहा था, जबकि उसके पीछे सौ आदमी थे। उसकी लाठी उसके हाथ में नाच रही थी और उसका चेहरा लाल था। उसने दीपक को घसीटकर खड़ा किया।
"तू पागल हो गया है," उसने दीपक के कान के पास कहा, पर आवाज़ इतनी ऊँची थी कि सबने सुना। "ये सब नाटक है। ये बूढ़ा तुझे बहका रहा है। तेरे पास शीशी थी, तेरे पास ताकत थी। और तू इनके सामने रो रहा है?"
दीपक ने उसकी पकड़ छुड़ाई। वो अब भी काँप रहा था, पर उसकी आवाज़ में कुछ लौट रहा था।
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