Spirit of a Fighter – Chapter 1047
गुड़िया मेरे पास आई। उसके हाथ में थैली थी — वही जिसमें वो अखाड़े की मिट्टी रखती थी।
"भैया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो सिर्फ़ बारह साल की बहन में होती है। "मैं भी चलूँगी।"
"नहीं," मैंने कहा। "तू माँ के साथ रहेगी।"
"माँ तो खुद चल रही हैं," उसने कहा। "और मैं जानती हूँ कि तुम वहाँ जाकर मार खाओगे। मुझे पता है। मैंने सपने में देखा है।"
मेरा गला भर गया। मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"तो सपना बदल दे," मैंने कहा। "सपने बदलने से कहानी बदलती है।"
उसने थैली मेरी जेब में खोंस दी।
"ये मिट्टी तेरे हाथ में है," उसने कहा। "मेरी भी है। तू हारेगा तो मैं भी हारूँगी।"
मैंने उसे गले लगाया। वो मेरी कमर से लिपट गई और मैंने उसकी चोटियों की गंध पहचानी — नारियल के तेल की, स्कूल की कॉपी की स्याही की, और माँ की हल्दी की।
फिर माँ ने मुझे अपनी तरफ़ खींचा। उन्होंने अपनी दोनों हथेलियाँ मेरे कंधों पर रखीं और दबाईं, जैसे कोई पहलवान कुश्ती से पहले अपने शिष्य को सीधा करता है।
"मेरी बात सुन," वो बोलीं। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर आँगन के हर कोने तक पहुँची। "आज सुबह जब तू जाए, तो पहले उसकी तरफ़ देख, फिर मिट्टी को छू, फिर लड़। और जब लड़े, तो याद रख कि तू मेरे पेट की भूख से पैदा हुआ है। भूख हार नहीं मानती।"
मैंने उनके पैर छुए। उन्होंने मुझे उठाया और गले लगाया। उनकी पीठ पर मेरा हाथ गया और मुझे उनकी रीढ़ की हड्डियाँ महसूस हुईं — एक-एक, जैसे चक्की के पत्थर।
"भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा," उन्होंने मेरे कान में कहा। "आज मेरा पेट भरा है। इसलिए आज मेरी दुआ सबसे ऊँची जाएगी।"
मैं उनके कंधे पर सिर रखकर रो पड़ा। ऐसे नहीं रोया जैसे बच्चा रोता है — धीरे, बिना आवाज़, जैसे कोई पुराना घाव खुल रहा हो। मेरे कंधे हिल रहे थे। माँ ने मेरी पीठ पर हाथ फेरा, ऊपर से नीचे, ऊपर से नीचे, जैसे कोई चक्की चला रहा हो।
मीरा पास आई और उसने मेरी दूसरी तरफ़ से मेरा हाथ पकड़ लिया। मैंने अपना हाथ नहीं खींचा।
माँ ने मीरा को देखा। उनके चेहरे पर वो भाव आया जो मैंने आज तक नहीं देखा था — एक पहचान। जैसे वो पहले से जानती थीं कि ये लड़की कौन है, ये लड़की क्या करेगी।
"तू इसे संभाल," माँ ने मीरा से कहा। "ये अपने पिता की तरह ज़िद्दी है। मुझे आता है।"
मीरा ने सिर हिलाया।
"और तू भी संभल," माँ ने मेरी तरफ़ देखकर कहा। "मैं तेरे लिए चक्की नहीं फेंकना चाहती।"
मैं हँसा। रोते हुए हँसा, जो सबसे अजीब हँसी होती है।
सुबह जब आसमान लाल होने लगा, पूरा रामपुर शहर की तरफ़ निकल पड़ा। गाड़ियों की कतार सड़क पर लंबी हो गई। मशालों की रोशनी में नीम के पेड़ों की परछाइयाँ नाच रही थीं। बच्चे गाड़ियों पर बैठकर गाने गा रहे थे, और बूढ़े अपने हाथों में लाठियाँ पकड़े चुपचाप चल रहे थे।
मैंने आख़िरी बार पीछे मुड़कर अपना गाँव देखा। कच्चे घर, टूटी घड़ी वाला आँगन, टिंकू की दुकान का टीन का शेड — और सबसे ऊपर, अखाड़े की मिट्टी की दीवार, जो सुबह की लाल रोशनी में और भी लाल दिख रही थी।
मैंने अपनी जेब में रखी मिट्टी की थैली छुई। ठंडी थी।
ट्रैक्टर के पीछे बैठे रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा और अपनी चिराग़दान उठाई। मैंने सिर हिलाया।
शहर का फाटक पार हुआ और सड़क चौड़ी हो गई। सामने, दूर, एक पुल था जिस पर सुबह की धुंध में कोई खड़ा था। जैसे-जैसे हम पास आए, वो परछाई साफ़ होने लगी। भारी शरीर। बड़ी मूँछें। लाल धोती। हाथ में छड़ी।
ठाकुर।
वो खड़ा था और हमारी तरफ़ देख रहा था। उसके चेहरे पर डर नहीं था। उसके चेहरे पर हँसी थी — वो हँसी जो आदमी तब हँसता है जब उसने अपना सब कुछ दाँव पर लगा दिया हो और उसे जीत का भरोसा हो।
और उसके पीछे, पुल के उस पार, सड़क खुली हुई थी और उस पर खड़े थे पहलवान। एक कतार में। सफ़ेद कपड़े, लाल कमरबंद, चौड़ी छातियाँ। मैंने गिनना शुरू किया — दस, बीस, पचास… सौ। सौ पहलवान, एक साथ, और सबकी आँखें हमारी तरफ़।
ठाकुर ने अपनी छड़ी उठाई।
और उसी पल, सौ पहलवानों ने एक साथ अपनी छाती पीटी — एक ऐसी आवाज़ जो पुल के नीचे बहते पानी की आवाज़ को भी दबा गई। धम। धम। धम। तीन बार। और फिर सन्नाटा।
उस सन्नाटे में, सबसे आगे खड़े एक पहलवान ने अपना हाथ उठाया और मेरी तरफ़ इशारा किया। उसका चेहरा जाना-पहचाना था, पर मैं उसे पहचान नहीं रहा था। चौड़ा माथा, मोटी गर्दन, बाएँ कंधे पर एक पुराना निशान — जला हुआ निशान, गोल, किसी मोहर जैसा।
उसने अपनी आवाज़ में उस पूरे मैदान को भर दिया।
"ये वही है जिसके पिता को हमने मिट्टी में मिलाया था।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए। मैंने कालू काका की तरफ़ देखा।
कालू काका का चेहरा पीला पड़ गया था। उनकी लालटेन हाथ से छूटकर गाड़ी पर गिरी और बुझ गई। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर वो बोले, धीरे, जैसे किसी कब्र से आवाज़ आ रही हो।
"ये तो… ये तो भवानी सिंह का शिष्य है। दीपक। जिसे सबने मरा हुआ माना था।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में पानी था। "वीर, ये वो लड़का है जिसे भवानी ने अपने हाथ से मिट्टी सिखाई थी। इसे भवानी ने अपना बेटा कहा था।"
मैंने पुल की तरफ़ देखा। दीपक मेरी तरफ़ देख रहा था, और उसकी आँखों में वो कुछ नहीं था जो किसी भाई की आँखों में होता है।
उसने अपना हाथ नीचे किया और मुस्कुराया।
"तेरे पिता ने मुझे मिट्टी दी थी," उसने कहा, "और तेरे पिता ने ही मुझे मिट्टी में मिलाने की कोशिश की। जब मैंने उनके सामने ठाकुर के पानी से इनकार किया, तो उन्होंने मुझे अखाड़े से निकाल दिया। तब से मैं ठाकुर का हूँ। और आज मैं तुझे वही सिखाऊँगा जो तेरे पिता ने मुझे सिखाया था — कैसे गिरना है।"
मेरी मुट्ठी भर गई। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
"वीर," उसने धीरे से कहा, "देख।"
मैंने उसकी आँखों के रास्ते देखा। दीपक के कमरबंद के नीचे, उसकी धोती की परत में, कुछ चमक रहा था — पीली रोशनी, शीशी जैसी।
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आवाज़ में अब लालटेन की रोशनी लौट आई थी।
"वो पीली शीशी है," उन्होंने कहा। "वो उसके पास है।"
मैंने अपने हाथ की मुट्ठी खोली और उसमें रखी मिट्टी को देखा। सुबह की रोशनी में वो लाल थी, गरम थी — जैसे अभी किसी ने उसे अपने हाथ से सींचा हो।
मैंने मिट्टी को सूंघा। उसमें नमी थी, और उसमें वो गंध थी जो मुझे पहचानी थी — भवानी सिंह की गंध, धोती की, हल्दी की, और उस एक रात की जब उन्होंने अपने बेटे के माथे पर हाथ रखा था।
मैंने सिर उठाया। दीपक अब भी मुस्कुरा रहा था।
"तेरे पिता ने कहा था," मैंने अपनी आवाज़ में कहा, और वो पूरे मैदान में गूँजी, "कि मिट्टी से बैर मत करो। वो तुम्हारी माँ है।"
दीपक की मुस्कान थोड़ी हिली।
"आज," मैंने कहा, "तेरी माँ तुझे पहचानेगी या नहीं, ये तेरे पास है। पर मेरी माँ ने मुझे बताया है कि भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है।" मैंने मिट्टी को अपने माथे पर लगाया, धीरे से, जैसे माँ ने रात में लगाई थी। "और आज मेरा पेट भूखा नहीं है।"
कालू काका ने अपनी नई लालटेन जलाई और सबसे आगे उठाई।
"रामपुर!" उन्होंने पुकारा, और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ सत्तर साल की मिट्टी में होती है। "मिट्टी ने अपना हिसाब रख लिया!"
और पूरा गाँव, एक साथ, आगे बढ़ा।
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