Spirit of a Fighter – Chapter 1046
मैं पलटा। मीरा दरवाज़े पर खड़ी थी। उसने सब सुना था। उसके हाथ में वही हरी शीशी थी जो उसने सुरंग में दिखाई थी, और उसके कुर्ते पर अभी भी जली मिट्टी की धूल थी।
वह मेरे पास आई और मेरी कलाई पकड़ ली।
"गुस्सा रख," उसने धीरे से कहा, "पर दिमाग़ ठंडा रख। ये चिट्ठी इसलिए भेजी गई है कि तुम बिना सोचे पहुँच जाओ। जो आदमी गुस्से में अखाड़े में उतरता है, वो अपने पैरों के नीचे की मिट्टी नहीं देखता।"
"माँ की लाश की बात लिखी है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ फटी हुई आई।
"तो?" उसने मेरी कलाई और कस ली। "उसने लिखा है, इसका मतलब ये नहीं कि वो कर सकता है। ठाकुर शब्द से मारता है, वीर। पहले शब्द, फिर छड़ी। अगर तुम शब्द से ही मर गए, तो छड़ी का काम आसान हो गया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। रात की लौ में उसका चेहरा थका हुआ था, पर आँखें वैसी ही — जैसे कोई किताब का आख़िरी पन्ना पढ़कर भी पहला पन्ना याद रखती हो।
तभी पीछे से चप्पलों की आवाज़ आई। माँ मेरे सामने आकर खड़ी हो गईं। उन्होंने साड़ी का कोना कमर में खोंसा और अपनी आँखें सीधी मेरी आँखों में डालीं।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो चीज़ आ गई जिससे मैं डरता था, "आप घर पर रहिए। प्लीज। मैं लौटकर आऊँगा।"
उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा। उनकी हथेली ठंडी थी और भारी थी, चक्की चलाने वाली हथेली।
"मैं तेरी माँ हूँ," वो बोलीं। "मैं डरकर कहीं नहीं छिपूँगी। और जो कहेगा कि मैं तेरे पीछे छिपी हूँ, उससे कहना — मैं चक्की चलाने वाली सरस्वती हूँ। मेरे हाथ में आटा है, तलवार नहीं। पर आटा भी किसी दिन पत्थर बन जाता है।"
मेरा गला भर आया। मैंने कुछ कहना चाहा, पर मीरा ने मेरी कलाई पर उँगली रख दी। चुप रहना ही ठीक था।
आँगन के बाहर से आवाज़ें आने लगीं। पहले एक, फिर दो, फिर दस। लालटेनें दिखाई देने लगीं। गाँव वाले आ रहे थे — बिना बुलाए, जैसे सारे रामपुर को नींद में ही खबर मिल गई हो।
सबसे आगे सुक्खी बुआ थीं, चमकीली साड़ी और हाथ में पान का बीड़ा, आँखों में वो डर जो वो कभी नहीं छिपातीं।
"अरे मैंने तो सुना है," वो सबसे पहले बोलीं, "कि शहर के अखाड़े में आज रात कोई मरेगा।" फिर उन्होंने मेरा चेहरा देखा और उनका बीड़ा हाथ से गिर गया। "हे भगवान, वीर… तेरा चेहरा ऐसा क्यों है जैसे तू खुद को मरा हुआ देख रहा हो?"
"बुआ," मैंने कहा, "आप घर जाइए।"
"घर?" उन्होंने आँचल झटका। "तू मेरे गाँव का बेटा है। मैं चुगली करने वाली हूँ, कायर नहीं। मैं चलूँगी। और सबको बताऊँगी कि ठाकुर ने मेरे बेटे को धमकाया है।"
एक-एक करके सारा गाँव आँगन में भर गया। चबूतरे वाले ठाकुर के खिलाफ़ बोलने वाले किसान आए, मिट्टी के घरों से औरतें आईं, बच्चे माँओं की गोद में। रणवीर सिंह अपनी व्हीलचेयर पर आए — और उनके पीछे-पीछे दो नौजवान चल रहे थे जिन्हें मैंने अखाड़े में कभी नहीं देखा था।
रामदीन बूढ़ा आया, अपने कटे हाथों को आँचल में छिपाए। शंकर आया — बीस साल कैद में रहा आदमी — और उसके कदम अभी भी काँप रहे थे, पर वो खड़ा था। हरनाम आया, गोलू का हाथ पकड़े।
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से बोला, "बीस साल पहले मैं ऐसे ही एक आँगन में खड़ा था। उस रात भवानी सिंह ने भी ऐसी ही चिट्ठी पाई थी। और वो अकेला गया।" उसकी आवाज़ रुकी। "आज कोई अकेला नहीं जाएगा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा। और उसके बाद जो हुआ, वो मैंने नहीं सोचा था।
रामदीन ने अपना आँचल खोला और उसमें से एक छोटी सी पीतल की चिराग़दान निकाली।
"ये अखाड़े के नीचे वाले तहखाने का दीया है," उसने कहा। "जो इसे जलाता है, उसके पीछे मिट्टी खुद चलती है। ये मैंने शंकर के कमरे से निकाला है। भैरव इसे कभी नहीं जलाता था, क्योंकि ये उसके पानी की ताकत को काटता है।"
मेरे सीने में कुछ हिला।
"तो हम इसे जलाएँगे," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ में वो गरज लौट आई थी जो मैंने सिर्फ़ एक बार सुनी थी, अदालत में जब वो खड़े हुए थे।
"नहीं," मैंने कहा, और मेरी अपनी आवाज़ सुनकर मुझे अचरज हुआ कि वो इतनी साफ़ क्यों थी। "पहले इसे जलाएँगे नहीं। पहले मैं उससे पूछूँगा कि उसने भवानी सिंह को क्यों मारा।"
रामदीन हँसा। एक सूखी, पुरानी हँसी।
"यही बात भवानी ने भी कही थी," उसने कहा। "और वो लौटकर नहीं आया।"
कालू काका आगे आए। उनके हाथ में लालटेन थी, और उनकी कमर अब पहले जैसी झुकी नहीं थी — जैसे बीस साल का बोझ आज उतर गया हो।
"मिट्टी ने अपना हिसाब रख लिया, बेटा," उन्होंने कहा। और फिर उन्होंने अपनी लालटेन ऊँची की और सब पर रोशनी डाली। "अब सिर्फ़ तेरा पैर रखना बाकी है।"
टिंकू दौड़ता हुआ आया। उसके हाथ में मिठाई की एक बड़ी डिब्बी थी, ढक्कन उल्टा, और उसके चेहरे पर हल्दी लगी थी जैसे उसने खुद को माथे पर टीका लगाया हो।
"अब कल से कसरत शुरू करूंगा," उसने घोषणा की, "पर पहले ये लड्डू ख़त्म करो। बेकार जाएँगे तो दुकान बंद करनी पड़ेगी।"
"टिंकू," मैंने कहा, "कल कसरत आज करनी पड़ेगी।"
"तो कल से दुगनी," उसने कहा, और लड्डू मेरे हाथ में रख दिया। और उसकी आवाज़ में जो हँसी थी, वो असली थी — पहली बार कई दिनों में। मैंने लड्डू खाया। घी की गंध और गुड़ की मिठास मेरे मुँह में घुल गई और मुझे अपना बचपन याद आया, जब टिंकू पहली बार दुकान के बाहर खड़ा था और उसकी माँ उसकी टोपी को सीधी कर रही थी।
सुक्खी बुआ ने एक और लड्डू उठाया और सबसे ऊँची आवाज़ में बोलीं, "अरे मैंने तो सुना है कि शहर के अखाड़े में ठाकुर के पास अब भी दो सौ पहलवान हैं।"
"सौ," रामदीन ने ठीक किया।
"सौ दो सौ ही होते हैं," बुआ ने कहा और लड्डू मुँह में डाल दिया। "फ़र्क़ सिर्फ़ हिम्मत का है।"
रात की तैयारी शुरू हुई। गाँव के बाहर से ट्रैक्टर आए, दो बसें आईं जिनके पहिये ठीक किए गए। बैलगाड़ियों में पुआल बिछाया गया ताकि बूढ़े और औरतें बैठ सकें। मशालें बनाई गईं — बाँस के डंडों पर चीथड़े लपेटकर, ऊपर मिट्टी का तेल डालकर। मैंने अपने हाथों से पाँच मशालें बनाईं, और हर एक पर मिट्टी लगाई — वही लाल मिट्टी, अखाड़े की।
कालू काका मेरे पास आए और मेरी बनाई मशाल देखकर बोले, "मिट्टी क्यों लगाई?"
"ताकि अगर पहलवान के हाथ में जाए, तो उसे पता चले कि कहाँ से आई है," मैंने कहा।
वो मुस्कुराए। उनके दाँत कम थे, पर मुस्कान पूरी थी।
"तेरे पिता भी ऐसी ही बातें करते थे," उन्होंने कहा। "वो भी चीज़ों में मिट्टी लगाते थे। कहते थे — जो चीज़ मिट्टी से जुड़ी नहीं, वो टिकती नहीं।"
मेरी आँख भर आई। मैंने पलटकर अपनी आवाज़ संभाली।
मीरा मेरे पास आई। उसके हाथ में एक लंबी पट्टी थी — साफ़ सूती कपड़े की, जिस पर वो कुछ जड़ी-बूटियाँ बाँध रही थी। तुलसी, अदरक, काली मिर्च — उसके हाथों की गंध मेरे पास आई, वो गंध जो अब मुझे घर जैसी लगती थी।
"ये किसके लिए?" मैंने पूछा।
"तुम्हारे लिए," उसने कहा। "अगर तुम्हें चोट लगे तो।"
"तुम मेरे साथ चलोगी?"
वो रुकी। उसने पट्टी को अपने घुटने पर रखा और मेरी तरफ़ देखा।
"मैं तुम्हारे पीछे नहीं चलूँगी," उसने कहा। "मैं तुम्हारे साथ चलूँगी।"
मैं मुस्कुराया। मेरी मुस्कान कमज़ोर थी, पर थी।
रात के तीसरे पहर आँगन खाली हो गया। गाड़ियाँ भर गईं, लोग अपनी-अपनी जगह बैठ गए, और सिर्फ़ मैं, माँ, गुड़िया और मीरा आँगन में बचे रहे।
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