Spirit of a Fighter – Chapter 1044
"तो वो क्या बोली?"
"कुछ नहीं," मीरा ने कहा। "वो चुप है। बैठी है, और आँखों से आँसू बह रहे हैं, पर कुछ बोल नहीं रही।"
मैंने रामदीन की तरफ़ देखा। उसने फिर कोयला उठाया और लिखा।
"शीशी के साथ एक काग़ज़ आता है। उस पर उल्टा उपाय लिखा होता है। बिना वो काग़ज़, कोई नहीं जगा सकता।"
"काग़ज़ कहाँ है?"
रामदीन ने अपनी छाती पर हाथ रखा — और मुस्कुराया, पर वो मुस्कान थकी हुई थी।
मैंने उसके कुर्ते की जेब में हाथ डाला। अंदर एक छोटा, मुड़ा हुआ काग़ज़ था, जिस पर मज़बूत गंध थी — कपूर, नीम का तेल, और गुड़ की चाशनी।
मैंने काग़ज़ खोला।
उस पर लिखा था, बड़े साफ़ अक्षरों में, जैसे किसी ने जल्दी में लिखा हो — "उल्टा उपाय: शीशी पीने वाले के माथे पर हल्दी का टीका, और कान में उसका अपना नाम तीन बार। फिर उसे अपने बच्चे की आवाज़ सुनाओ। बस। नाम और बच्चे की आवाज़ — ये दो चीज़ें ही याद दिलाती हैं कि वो कौन है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"कमला देवी के बच्चे?" मैंने कहा।
मीरा ने सिर हिलाया।
"उसका कोई बच्चा नहीं," उसने कहा। "उसने कभी शादी नहीं की।"
कालू काका सीढ़ियों पर खड़े थे और उनका चेहरा अजीब था।
"उसका एक बच्चा था," वो धीरे बोले। "एक बेटी। जो पैदा होते ही मर गई। कमला ने उसे कभी नहीं देखा।"
मैं चुप खड़ा रहा। कमरे में सिर्फ़ मशाल की चटकती आवाज़ थी।
"तो फिर," मैंने धीरे कहा, "उसे बच्चे की आवाज़ कैसे सुनाएँगे?"
रामदीन ने कोयला उठाया और दीवार पर एक आख़िरी शब्द लिखा।
"भवानी की आवाज़।"
मैंने काग़ज़ फिर पढ़ा। मेरी नज़र "अपने बच्चे की आवाज़" पर अटक गई।
फिर मुझे याद आया। कल, हवेली में, कमला देवी ने कहा था — "भवानी मेरा भाई नहीं था, वो मेरे लिए सब कुछ था।" और जब उसने भवानी की डायरी पढ़ी थी, उसकी आवाज़ काँपी थी। वो भवानी के शब्द थे, भवानी की आवाज़ नहीं।
"माँ," मैंने कहा, और मेरा गला भर गया। "माँ को लाना होगा। वो भवानी की आवाज़ की नकल कर सकती है।"
"तू पागल है," कालू काका ने कहा। "सरस्वती को यहाँ लाएगा? रात के अंधेरे में? जब भैरव अभी भी भागा हुआ है?"
"भैरव ने भागकर अपने आप को बचाया," मैंने कहा। "ठाकुर ने उसका हाथ पकड़कर कहा — कुछ कर। और भैरव ने कहा — मैंने तुझे बीस साल बचाया। अब तू खुद बचा। भैरव को अब किसी की ज़रूरत नहीं। वो अकेला है। और अकेला आदमी सबसे ज़्यादा ख़तरनाक होता है — पर सबसे ज़्यादा डरा हुआ भी।"
टिंकू ने कहा, "भाई, मैं माँ को बुला लाता हूँ।"
"नहीं," मैंने कहा। "तू रामदीन के पास रहेगा। मैं जाऊँगा।"
मैं सीढ़ियों से ऊपर चढ़ा। आधी रात बीत चुकी थी और आसमान में तारे धुँधले थे। गाँव की तरफ़ रास्ता अंधेरा था, और मशाल की रोशनी में मुझे दूर कुछ दिखा।
एक बैलगाड़ी। खड़ी हुई। और उसके पास एक आदमी — लंबा, सीधा खड़ा, और उसके हाथ में बेंत।
मैं रुका।
"वीर सिंह?" आवाज़ आई — मीठी, पर उसमें वो ठंडक थी जो मैंने सिर्फ़ एक आदमी में सुनी थी।
भैरव।
"तू आया," मैंने कहा।
"मैं आया," उसने कहा। "पर तेरे लिए नहीं। मैं उस बूढ़े के लिए आया हूँ जो तेरे पीछे खड़ा है।"
"शंकर?"
"हाँ," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ नरमी आई। "वो मेरा सबसे पुराना साथी है। मैंने उसके हाथ नहीं काटे। ठाकुर ने काटे। और मैं उस दिन से उसका दुश्मन हूँ — पर मैं उससे मिल नहीं सका, क्योंकि ठाकुर ने कहा था — अगर तू उससे मिला, तो मैं उसे मरवा दूँगा।"
मैं चुप खड़ा रहा।
"तू शंकर को ले जा," भैरव ने कहा। "और मुझे जाने दे। मेरे पास कुछ नहीं बचा — न अखाड़ा, न पैसा, न नाम। पर मेरे पास एक चीज़ है जो तेरे काम आएगी।"
"क्या?"
"रामदीन की ज़ुबान," भैरव ने कहा। "मैंने उसे बीस साल तक खुद चुप रखा — डर से नहीं, बीमारी से। उसकी ज़ुबान के नीचे एक सुई है। अगर तू सुई निकाल दे, तो वो बोलेगा। और जो वो बोलेगा, वो ठाकुर को फाँसी तक ले जाएगा।"
मेरे हाथ काँपे।
"तू झूठ बोल रहा है," मैंने कहा।
"मैं झूठ बोलता हूँ," भैरव ने कहा, "पर हर बार सच के अंदर। ये मेरी आदत है, वीर सिंह। तू मुझसे नफ़रत कर, पर मेरी बात सुन।"
वो बैलगाड़ी पर चढ़ा।
"एक और बात," उसने कहा। "कमला देवी ने शीशी पी है। मुझे पता है। और मैं जानता हूँ कि उल्टा उपाय क्या है — पर मैं नहीं बताऊँगा। तू खुद ढूँढ।"
"तू जानता है?"
"मैंने वो शीशी बनवाई थी," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में गर्व था, जैसे कोई माँ अपने बच्चे की तारीफ़ कर रही हो। "बीस साल पहले। एक वैद्य से। उस वैद्य को ठाकुर ने मरवा दिया, पर उसका बेटा आज भी ज़िंदा है — और वो तेरे गाँव में ही है।"
वो बैलगाड़ी पर बैठा और बेंत उठाया।
"तेरे पिता ने मुझे बचाया था," वो धीरे से बोला। "उस रात। तहखाने में। उसने कहा — विक्रम, तू जा। मैं जानता हूँ कि तूने क्या किया, पर तू मेरा शिष्य है। और मैं अपने शिष्य को नहीं मारता।"
उसकी आवाज़ टूटी। और फिर उसने बेंत मारा और बैलगाड़ी अंधेरे में गायब हो गई।
मैं वहीं खड़ा रहा, और मेरे कानों में भैरव की आवाज़ गूँज रही थी।
"वीर," मीरा ने पीछे से कहा। "वो जा रहा है।"
"जाने दे," मैंने कहा। "उसका वक़्त आएगा। पर अभी — माँ को लाना है।"
मैं गाँव की तरफ़ दौड़ा।
घर पहुँचा तो आँगन में चक्की स्थिर थी, और माँ दीवार से टिकी बैठी थी — आँखें खुली, पर वो देख नहीं रही थी। गुड़िया उसके पास बैठी थी और उसका हाथ पकड़े हुए थी।
"भैया," गुड़िया ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो बच्चों में होता है जब उन्हें लगता है कि बड़ों ने हार मान ली है।
"कुछ नहीं हुआ," मैंने कहा। "माँ को लेकर चलना है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो चमक लौटी जो कल अदालत में थी।
"कहाँ?"
"अखाड़े में," मैंने कहा। "भवानी की आवाज़ चाहिए।"
माँ ने कुछ नहीं पूछा। वो उठीं, चक्की पर हाथ फेरा, और अपनी साड़ी का पल्ला ठीक किया।
"गुड़िया," उन्होंने कहा, "मेरा हल्दी वाला डिब्बा ला।"
गुड़िया दौड़ी और लाई। माँ ने डिब्बा खोला, उँगली डुबोई, और मेरे माथे पर हल्दी का टीका लगाया।
"ये टीका तेरे पिता की माँ ने मुझे दिया था," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो नरमी थी जो सिर्फ़ उनके पास थी। "आज मैं तुझे दे रही हूँ।"
मेरा गला भर आया।
"माँ," मैंने कहा।
"चुप," उन्होंने कहा, और उनकी आँखों में पानी था, पर वो मुस्कुरा रही थीं। "भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा। और आज तेरा पेट भूखा नहीं है।"
हम अखाड़े पहुँचे तो आसमान हल्का हो रहा था। रामदीन के पास कमला देवी बैठी थी — चुप, आँखों में आँसू, और उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
माँ उसके पास गईं और घुटनों के बल बैठ गईं।
"कमला," उन्होंने धीरे कहा, "मैं सरस्वती हूँ।"
कमला देवी ने उनकी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ हिला।
"मैं तुझे भवानी की आवाज़ सुनाऊँगी," माँ ने कहा। "तू बस सुन।"
और फिर माँ ने आँखें बंद कीं और बोलीं — धीमी, भारी आवाज़ में, जैसे कोई आदमी बोल रहा हो।
"कमला, तू मेरी बहन है। तूने मेरे लिए सब किया। मैं जानता हूँ। पर अब तू मेरे लिए एक काम कर — अपनी आँखें खोल। मैं मरा नहीं हूँ। मैं तेरे अंदर हूँ।"
कमला देवी का शरीर काँपा। उसके होंठ हिले और पहली आवाज़ निकली — टूटी, बच्चों जैसी।
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