Spirit of a Fighter – Chapter 1043
"ये… ये वही धोती है," वो धीरे से बोले। "मैंने इसे भवानी के शरीर पर देखा था। उस रात। मैंने इसे पहचाना।"
"तो ठाकुर ने इसे बीस साल तक संभालकर रखा?" मीरा ने पूछा। "क्यों?"
"क्योंकि काग़ज़ जल जाते हैं," शंकर ने कहा, "पर कपड़ा नहीं जलता। और धोती के उस पल्ले में, अंदर की तरफ़, भवानी ने कुछ लिखा था। मैंने पढ़ा नहीं — वो पढ़ा नहीं सकता, तो जला नहीं। वो इसे रखता रहा, ये सोचकर कि जिस दिन ज़रूरत पड़ेगी, इससे किसी को फँसाएगा।"
मैंने धोती का टुकड़ा उलटा किया। अंदर की तरफ़, जले हुए किनारे के पास, स्याही से कुछ लिखा था — छोटा, दबी हुई लिखाई, जैसे कोई जल्दी में लिख रहा हो।
"रामदीन," मैंने पढ़ा। "मेरी जान शेर सिंह के हाथ में है। अगर मैं मरूँ, तो सच उसके पास है। उसे मत मारना — वो गवाह है।"
कमरे में एक पल के लिए कोई नहीं बोला।
"रामदीन," मीरा ने धीरे से कहा। "वो बूढ़ा जिससे हम मिले थे। वो शेर सिंह के पास है।"
"वो अब भी ज़िंदा है?" शंकर ने पूछा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ बदला — जैसे सूखी ज़मीन में एक बूँद गिरी हो।
"वो हमें अखाड़े में मिला," मैंने कहा। "वो बोल नहीं सकता। पर उसने इशारे से बताया — भैरव, तहखाना, और एक और आदमी जिसका नाम वो नहीं ले सका।"
शंकर ने आँखें बंद कर लीं।
"फिर तो वो सच बोलने की कोशिश कर रहा है," उसने कहा। "और जो सच बोलने की कोशिश करता है, उसकी उम्र कम हो जाती है। तुम वो काग़ज़ ले जाओ जो तुम्हें चाहिए। पर एक बात सुनो।"
"क्या?"
"ठाकुर के पास एक और शीशी है। पीली नहीं। नीली। वो ज़हर नहीं — वो उल्टा है। वो भूलने की दवा है। जो उसे पीता है, वो दो दिन का सब भूल जाता है। ठाकुर उसे गवाहों को देता है — पंचायत में, कोर्ट में। और पिछली बार उसने वो शीशी किसी को दी है।"
"किसी को?"
"एक औरत को," शंकर ने कहा, और मेरी आँखों में देखा। "जो कल तुम्हारे साथ थी।"
मेरे पाँव के नीचे ज़मीन खिसक गई।
"कमला देवी?" मीरा ने कहा।
"मुझे नाम नहीं पता," शंकर ने कहा। "पर वो काली साड़ी पहने आई थी, और उसने ठाकुर से कहा — मेरा हिसाब अलग है। मैं भवानी की बहन हूँ, मैंने सब कुछ बर्दाश्त किया, पर अब मुझे वो शीशी चाहिए। और ठाकुर ने उसे दे दी।"
मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। उनका चेहरा पत्थर जैसा हो गया था।
"तो कमला देवी," मैंने धीरे कहा, "अदालत में जो कुछ कहा, वो सब भूल सकती है?"
"नहीं," शंकर ने कहा। "वो भूल चुकी है। शीशी आज सुबह दी गई थी। दो दिन का वक़्त है। अगर तुमने उसे दो दिन में नहीं जगाया, तो वो कुछ भी गवाही नहीं देगी। और तुम्हारा सारा सबूत हवा में उड़ जाएगा।"
टिंकू ने अपना डिब्बा ख़ाली हाथ में पकड़ लिया। वो हँसा — पर हँसी आधी रास्ते में ही रुक गई।
"भाई," उसने कहा, "ये अखाड़ा इतना बड़ा है, और यहाँ बातें इतनी छोटी नहीं होतीं।"
"चलो," मैंने कहा। "रामदीन को ढूँढना है।"
शंकर ने मेरा हाथ पकड़ा — नहीं, अपनी कटी कलाई का अगला हिस्सा रखा मेरी हथेली पर, और वो ठंडा था।
"वीर सिंह," उसने कहा, "मुझे यहाँ से निकाल ले। मैं बीस साल से इस कमरे में हूँ। मुझे बाहर की हवा चाहिए — बस एक बार सूँघ लूँ, फिर मर जाऊँ तो चलेगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो शांति अब भी थी, पर उसके नीचे कुछ और भी था — उम्मीद, जो बीस साल में सूख गई थी और अब फिर से हिल रही थी।
"तुम बाहर चलोगे," मैंने कहा। "और तुम्हारे बच्चे, जो अब बड़े हो गए होंगे, उन्हें पता चलेगा कि उनका बाप किसी कोठी में नहीं, शहर के अखाड़े में कैद था।"
शंकर ने मुँह फेर लिया। उसका गला हिला, पर आवाज़ नहीं निकली।
मीरा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"वीर," उसने कहा, "आधी रात को कहाँ जाएँगे? रामदीन कहाँ है, ये भी नहीं पता।"
"रामदीन अखाड़े में है," कालू काका ने कहा। "भैरव उसे कभी बाहर नहीं जाने देता। वो उसका सबसे पुराना गवाह है। और वो अखाड़े के उस हिस्से में है जहाँ लोग नहीं जाते — पीछे, जहाँ मिट्टी नहीं है।"
"तो फिर वहीं चलते हैं," मैंने कहा।
हम बाहर निकले। मशालों की रोशनी अब भी मैदान में थी, पर भीड़ छँटने लगी थी। ठाकुर को कुछ लोग पकड़े हुए थे, और उसके होंठ अब भी हिल रहे थे, पर अब उसकी आवाज़ किसी को सुनाई नहीं दे रही थी।
मैंने शंकर को कालू काका और टिंकू के सहारे चलाया और अखाड़े के पीछे की तरफ़ बढ़ा।
फिर मैं रुका।
"मीरा," मैंने कहा। "तुम कमला देवी के पास जाओ। अभी। अगर वो सो रही है, तो उसे उठाओ। अगर वो जगी है और कुछ भूल रही है, तो उसे पकड़कर रखो। उसकी आँखों में देखो — अगर वो धुँधली हैं, तो मुझे बताओ।"
"तुम अकेले?"
"मैं अकेला नहीं हूँ," मैंने कहा, और टिंकू की तरफ़ देखा।
टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की।
"भाई," उसने कहा, "एक बात कहूँ?"
"कह।"
"अबकी बार मैं डरूँगा नहीं। अबकी बार मैं लड्डू बाँटने जा रहा हूँ।"
वो मुस्कुराया, और उस मुस्कान में डर था, पर उसके नीचे कुछ और था — वो कुछ जो पहले नहीं था। और मुझे समझ आया कि टिंकू बदल गया है। वो अब मेरा छोटा भाई था, पर वो अब भी टिंकू था — और शायद इसी में उसकी ताकत थी।
मीरा गई और मैं रामदीन की तरफ़ बढ़ा।
अखाड़े के पीछे, उस हिस्से में जहाँ मिट्टी नहीं थी, पत्थर का फ़र्श था, और उस फ़र्श के नीचे एक और कमरा था। कालू काका ने एक पत्थर उठाया और नीचे सीढ़ियाँ दिखीं।
"यहाँ से मत जाना," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ काँपी। "यहाँ से बीस साल पहले मैं गया था। और मैंने वही देखा जो मुझे नहीं देखना चाहिए था।"
"क्या देखा?"
"एक आदमी," उन्होंने कहा, "जो दीवार से बातें कर रहा था।"
मैं सीढ़ियों से नीचे उतरा। टिंकू मेरे पीछे था, और उसके हाथ में अब भी वो डिब्बा था — ख़ाली, पर पकड़ा हुआ।
नीचे एक लंबा, अंधेरा कमरा था। मशाल की रोशनी में मुझे दीवारों पर बने निशान दिखे — हज़ारों, किसी कील से खींचे हुए, जैसे कोई गिनती कर रहा हो।
"रामदीन?" मैंने आवाज़ दी।
कोई जवाब नहीं आया।
फिर, कमरे के कोने से, एक छोटी सी आवाज़ आई — जैसे कोई काग़ज़ खिसक रहा हो।
मैं आगे बढ़ा और मशाल नीचे की।
रामदीन वहाँ था। बैठा हुआ, दीवार से टिका हुआ, और उसके हाथ में कोयले का एक टुकड़ा था। उसके सामने की दीवार पर, बड़े-बड़े अक्षरों में, कुछ लिखा हुआ था — अधूरा, पर साफ़।
"जो शीशी पीता है, वो दो दिन बाद खुद नहीं जानता कि वो क्या बोला।"
रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में पानी था। उसके होंठ हिले, और उसने कोयला मेरी तरफ़ बढ़ाया — जैसे कह रहा हो, अब तुम लिखो।
मैंने कोयला लिया।
"तुम क्या कहना चाहते हो?" मैंने पूछा।
रामदीन ने दीवार पर एक और शब्द लिखा — धीरे, हाथ काँपते हुए।
"कमला को बचाओ। वो शीशी उसने नहीं पी। वो शीशी उसने मुझे पिलानी चाही।"
मैं जम गया।
"तो कमला देवी ने शीशी नहीं पी?"
रामदीन ने सिर हिलाया। और फिर उसने एक और शब्द लिखा।
"अभी भी मेरे पास है।"
मेरे हाथ से कोयला गिर गया।
मीरा भागकर आई। उसकी साँस फूल रही थी और उसके हाथ में एक कटोरी थी — पीली, मिट्टी की, जिसमें कुछ रखा था।
"वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना, "कमला देवी ने शीशी पी ली है।"
मेरे पाँव के नीचे ज़मीन फिर खिसकी।
"कब?"
"आधी घड़ी पहले," मीरा ने कहा। "मैं उसके पास पहुँची तो वो मुँह में कुछ डाल रही थी — कह रही थी कि भवानी ने जो कसम दी थी, वो पूरी होगी। और फिर उसकी आँखें घूम गईं।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno