Spirit of a Fighter – Chapter 1041
"दस लिखा है," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी लौट आई थी जो अदालत में थी। "मतलब वो हमें कम आँक रहा है। या फिर…" उसने होर्डिंग को करीब से देखा। "…या फिर ये सिर्फ़ वो दस हैं जो मंच पर लड़ेंगे। बाकी नब्बे बाहर होंगे। भीड़ में।"
"वो भीड़ में छुपे होंगे," रणवीर सिंह ने कहा। "ताकि अगर वीर जीतता दिखे, तो भीड़ में से कोई उठकर उसके पैर खींच दे।"
मैंने होर्डिंग के नीचे लगी तारीख़ देखी। आज। और नीचे लिखा था — "प्रवेश केवल न्योते से।"
"न्योता?" मैंने कहा।
"हाँ," एक आवाज़ आई, और हम सब पलटे।
भीड़ के पीछे से एक बूढ़ा आदमी आ रहा था। उसके दोनों हाथ कटे हुए थे — कलाइयों से ऊपर बस पट्टी बँधी थी। उसका चेहरा जला हुआ था, और उसकी चाल में एक अजीब-सी हिचक थी, जैसे उसके पैर भी कभी टूटे हों और ठीक से जुड़े न हों।
वो मेरे सामने आकर रुका।
"मैं बब्बर का साथी था," उसने कहा। "बब्बर जिसे तूने तहखाने में ज़िंदा जलते देखा था। ठाकुर ने मेरे हाथ कटवा दिए थे — कहा, 'जो हाथ मेरे खिलाफ़ उठे, वो रहने ही क्यों।'"
मैंने उसके कटे हाथों को देखा। उसकी आँखों में पानी नहीं था। सिर्फ़ एक ठंडी चीज़ थी, जो बीस साल से जमी हुई थी।
"और मैं जानता हूँ," उसने कहा, "कि शहर के अखाड़े में ठाकुर का काला कमरा कहाँ है।"
वही पल, मेरे पीछे, अखाड़े के लोहे के जाल में एक आवाज़ हुई, जैसे कोई भारी पत्थर घसीटा जा रहा हो।
मैं पलटा। जाल धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा था।
और जाल के पीछे से, अंधेरे में से, एक आवाज़ आई — मीठी, धीमी, जैसे गुड़ की चाशनी।
"आ जा, वीर सिंह। तेरा इंतज़ार है।"
मैंने जेब में हाथ डाला और चक्की के पत्थर को छुआ। वो भारी था, और गरम था — माँ के हाथ जैसा।
मैंने कदम बढ़ाया।
कटे हाथों वाला बूढ़ा मेरे पीछे-पीछे चला और धीरे से बोला, "काले कमरे की चाबी ठाकुर की छड़ी में है। छड़ी उसके हाथ से कभी नहीं जाती।"
"तुम्हारा नाम?" मैंने पूछा।
"बद्री," उसने कहा। "और मैं तेरे साथ अंदर नहीं जाऊँगा। मैं बाहर रहूँगा। पर जब तू अंदर हो, तो एक बात याद रख — ठाकुर तेरे पिता का क़ातिल नहीं है। वो सिर्फ़ चाकू है। जिसने चाकू पकड़ा है, वो कोई और है।"
मैं ठिठका।
"कौन?"
"जब वक़्त आएगा, खुद देख लेगा," बद्री ने कहा, और वो भीड़ में गुम हो गया।
जाल पूरा उठ चुका था। मैंने अंदर कदम रखा।
शहर का अखाड़ा गाँव के अखाड़े से दुगना बड़ा था। मिट्टी काली थी, और सूखी। मैंने उसे पैर से दबाया तो वो चरमराई — मिट्टी में पानी नहीं था, सिर्फ़ धूल थी। मेरे पेट में एक झटका लगा। जिस अखाड़े में मिट्टी नहीं सींची जाती, वहाँ पहलवान पैदा नहीं होते — सिर्फ़ तमाशे होते हैं।
तभी मुझे एक गंध आई। तेज़, तीखी, जैसे आम की फाँस। मैंने सिर घुमाया।
किनारे पर, छाया में, एक पीतल की बाल्टी रखी थी, और उसमें से भाप उठ रही थी। उसी भाप में वो गंध थी।
"वही पानी," मीरा ने मेरे कान के पास कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "पर कुछ और भी है। इसमें आम की फाँस है।"
"आम की फाँस?"
"हाँ। जो पानी में मिलाई जाए, वो पीने वाले का गला जलाता है — ताकि उसे पता न चले कि उसमें ज़हर है। वो सोचेगा, बस ताकत का असर है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चमक आ गई जो अदालत में थी।
"तो ये पानी सबको पिलाया जा रहा है," उसने कहा। "दस पहलवानों को भी।"
"दसों को," मैंने कहा। "और उन्हें पता भी नहीं।"
रणवीर सिंह ने मेरा कंधा पकड़ा।
"वीर," उन्होंने कहा, "अगर वो दसों नशे में हैं, तो तू अकेला दस से कैसे लड़ेगा?"
"मैं उनसे नहीं लड़ूँगा," मैंने कहा। "मैं उस पानी से लड़ूँगा।"
मैं बाल्टी की तरफ़ बढ़ा। तभी एक आवाज़ आई।
"बाप-दादों की मिट्टी में आए हो, तो पहले सलाम करो।"
मैं रुका।
मंच के ऊपर, एक ऊँची कुर्सी पर, ठाकुर महेंद्र सिंह बैठा था। उसके हाथ में सोने की मूठ वाली छड़ी थी, और उसके चारों तरफ़ मशालें जल रही थीं। उसका चेहरा मशाल की रोशनी में लाल दिख रहा था, और उसकी आँखें… उसकी आँखें मुझे देख रही थीं, पर जैसे किसी और को ढूँढ रही हों।
"वो सलाम नहीं करेगा, महेंद्र," एक दूसरी आवाज़ आई, और कुर्सी के पीछे से एक आदमी निकला।
मेरे हाथ की मुट्ठी कस गई।
भैरव सिंह।
वो अभी भी वही था — भारी शरीर, तेल लगी मूँछें, गले में सोने की चेन। पर कुछ बदला था। उसकी एक कलाई पर पट्टी बँधी थी, और उसके कपड़े मैले थे — जेल के कपड़े। वो कुर्सी के पीछे खड़ा था, और उसकी आँखों में वो मिठास नहीं थी। सिर्फ़ ठंडक थी।
"भैरव," मैंने कहा। "तू जेल से भाग आया।"
"नहीं," भैरव ने कहा। "मैं जमानत पर बाहर हूँ। महेंद्र ने मेरी जमानत करवाई।" उसने ठाकुर की तरफ़ देखा। "और अब ये मेरी बात नहीं सुनता। उसे लगता है वो मेरा मालिक है।"
ठाकुर ने छड़ी घुमाई।
"चुप, भैरव।"
"क्यों?" भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक ऐसी थकान थी जो पहले नहीं थी। "अब तो सब कुछ बाहर आ गया। तेरी अदालत, तेरे काग़ज़, तेरी ज़मीन — सब खत्म। अब बचा है तो सिर्फ़ ये रात।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और ये लड़का।"
ठाकुर उठा। वो कुर्सी से उतरा और मंच के किनारे पर आया। उसकी छड़ी मिट्टी में टिकी थी, और वो उसे दबा रहा था — जैसे वो मिट्टी उसकी हो।
"वीर सिंह," उसने कहा। "तेरे पिता भवानी ने भी मेरी मिट्टी में पैर रखा था। और तू जानता है क्या हुआ?"
मैं चुप रहा।
"वो मर गया," ठाकुर ने कहा, और उसके होंठ हिले। "और आज तेरे साथ भी वही होगा। फ़र्क़ सिर्फ़ ये है — वो मेरे सामने नहीं मरा। तू मेरे सामने मरेगा।"
"मैं मरने नहीं आया," मैंने कहा।
"तो क्या करने आया है?"
मैंने जेब से माँ की पोटली निकाली। चक्की का पत्थर मेरी हथेली में भारी था। मैंने उसे मिट्टी पर रख दिया।
"मैं ये मिट्टी बदलने आया हूँ," मैंने कहा। "ये काली है, सूखी है, और इस पर किसी का नाम लिखा है। मैं इसे वापस लाल करने आया हूँ — जैसे मेरे अखाड़े की मिट्टी है।"
मंच के नीचे, दस पहलवान खड़े थे। उनके शरीर बड़े थे, पर उनकी आँखें धुँधली थीं। एक की नाक से खून की एक पतली लकीर सूख चुकी थी। दूसरे के हाथ काँप रहे थे। तीसरा अपनी जगह पर झूल रहा था, जैसे नींद में हो।
मैंने उन्हें देखा और मेरा दिल भर आया।
"तुम लोग," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सबको सुनाई दी, "तुम्हें क्या लगता है ये ताकत है? ये ताकत नहीं है। तुम्हारी उम्र तुम्हारे पैरों के नीचे से खिसक रही है और तुम्हें पता भी नहीं।"
एक पहलवान ने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था।
"हमें पता है," उसने कहा। "पर हमारे पास और क्या है?"
मैं उसके पास गया। उसका हाथ पकड़ा। उसकी हथेली ठंडी थी, और उसमें एक कंपकंपी थी।
"मेरा नाम वीर सिंह है," मैंने कहा। "मैं एक मज़दूर हूँ। मैं रोज़ ईंट ढोता हूँ। और मैंने वो पानी नहीं पिया। आज तुम मेरे साथ लड़ो — न ठाकुर के लिए, न उस पानी के लिए। अपने लिए।"
वो पहलवान मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने अपना हाथ छोड़ा और पीछे हटकर मेरी तरफ़ खड़ा हो गया।
"मैं तेरे साथ हूँ," उसने कहा।
ठाकुर ने छड़ी मिट्टी पर पटकी।
"बेवकूफ़!" वो चिल्लाया। "उसे भड़काने वाले सब इसी तरह मरे हैं!"
"मैं नहीं मरूँगा," मैंने कहा, और मैंने अपना हाथ आगे बढ़ाया। "पर तेरी छड़ी मुझे दे।"
ठाकुर हँसा। वो हँसा, और उसकी हँसी अखाड़े की दीवारों से टकराई।
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