Spirit of a Fighter – Chapter 1040
"वीर अकेला जाएगा," उन्होंने कहा। "पहले। हम बाहर रहेंगे। जब वक़्त आएगा, तब अंदर घुसेंगे।"
"नहीं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मेरे कानों में अजीब लगी। "मैं अकेला नहीं जाऊँगा।"
"वीर—" रणवीर सिंह ने शुरू किया।
"ठाकुर चाहता है कि मैं अकेला आऊँ। वो मुझे अकेला देखना चाहता है, टूटा हुआ। अगर मैं अकेला गया, तो वो जीत गया।" मैंने भवानी की लाठी उठाई। "मैं उसके सामने अकेला खड़ा होऊँगा — पर मेरे पीछे मेरा गाँव होगा। वो मेरे साथ अंदर नहीं आएगा, पर मेरे अंदर रहेगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले नहीं देखा था — डर नहीं, कुछ और।
"मैं तेरे साथ अंदर जाऊँगी," उसने कहा।
"मीरा—"
"मैं तेरी बात नहीं सुन रही," उसने काट दिया। "तू अकेला लड़ेगा, पर तेरे पीछे मैं खड़ी रहूँगी। दूर। पर खड़ी रहूँगी। अगर तू गिरा, तो मैं उठाऊँगी। और अगर तू उठ न पाया, तो मैं वो लाठी उठाऊँगी।"
मेरा गला भर आया। मैंने कुछ कहना चाहा, पर शब्द नहीं निकले।
तभी पीछे से आवाज़ आई — धीमी, पर साफ़।
"मेरा बेटा अकेला नहीं लड़ेगा।"
मैं पलटा। मेरी माँ खड़ी थी। चक्की वाली साड़ी में, बाल बँधे हुए, हाथ में एक छोटी-सी पोटली। वो मेरे पास आई और मेरे सिर पर हाथ रखा। उनकी हथेली गरम थी, और उसमें चक्की के आटे की गंध थी।
"भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा," उन्होंने कहा, "और आज तूने खाया है।"
मेरे घुटने ज़मीन पर टिक गए। मैं उनके पैरों में गिर पड़ा। मेरा माथा उनके पैरों से लगा, और मैंने महसूस किया — उनके पैरों में वो काँटा अब भी था, जो कभी नहीं निकला था। मैंने उसे छुआ। वो काँप गईं, पर हटीं नहीं।
"उठ," उन्होंने कहा। "मेरा बेटा रोता नहीं। मेरा बेटा लड़ता है।"
मैं उठा। मेरी आँखें गीली थीं, और मुझे उसकी शर्म नहीं थी।
फिर वो पोटली मेरे हाथ में रखी और बोलीं, "ये चक्की के पत्थर का एक टुकड़ा है। जब डर लगे, इसे जेब में रख लेना। ये भारी है — जैसे मेरा हाथ।"
मैंने पोटली जेब में रखी। वो सच में भारी थी।
रणवीर सिंह ने धीरे से कहा, "अब चलो। रात ख़त्म हो रही है।"
पर मैं रुका। मैंने मीरा की तरफ़ देखा और फिर सबकी तरफ़।
"एक बात कहनी है," मैंने कहा। "काग़ज़ पर एक लाइन आई थी — कि शहर में मैं अपने खून से लड़ूँगा। मुझे नहीं पता वो सच है या जाल। पर अगर सच है…" मेरी आवाज़ रुकी। "…तो भी मैं पीछे नहीं हटूँगा।"
सब चुप रहे। फिर कालू काका ने कहा, "चल, ईंट ढोने वाले। तेरा वक़्त आ गया।"
हम पुल पार करने लगे। मशालें धीमी हो रही थीं, और शहर की रोशनी दूर से दिखने लगी थी। मेरे जेब में चक्की का पत्थर भारी था, और मेरे कंधे पर भवानी की लाठी।
तभी मेरे कान में एक फुसफुसाहट आई — वही आवाज़, वही मिट्टी वाली।
"बेटा, मिट्टी से कभी मत डरना। वो तेरी माँ है।"
मैंने कदम तेज़ किए। शहर की रोशनी अब पास थी। और उसी रोशनी में, दूर, अखाड़े का लोहे का जाल चमक रहा था — जैसे कोई बड़ा जानवर अपनी आँखें खोल रहा हो।
॥
अखाड़े का लोहे का जाल मेरी आँखों के सामने खुल रहा था, और उसके पीछे से आती गरम हवा के साथ एक गंध आ रही थी — जली मिट्टी की, कपूर की, और किसी पुराने तेल की।
मैंने अपना हाथ ऊपर उठाया और सब रुक गए।
"सुनो," मैंने कहा। "अंदर घुसने से पहले एक बात। वो आदमी जो मुझे अकेला बुला रहा है, उसके पास पैसा है, ताकत है, और सौ पहलवान हैं। पर मेरे पास एक चीज़ है जो उसके पास नहीं — मैंने ये मिट्टी नहीं बेची।"
कालू काका ने लालटेन ऊपर की। रोशनी में सबके चेहरे दिखे — टिंकू का डरा हुआ, मीरा का साफ़, रणवीर सिंह का जैसे पत्थर पर लिखा हुआ।
"तू बोल," रणवीर सिंह ने कहा।
"मैं अंदर अकेला जाऊँगा," मैंने कहा। "पर मेरे पीछे मेरी माँ की पोटली जेब में रहेगी, और मेरे कंधे पर भवानी की लाठी। इतना ही काफ़ी है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और उसका गला भर आया।
"भाई, तू अकेला जाएगा तो मैं क्या करूँगा?"
"तू मेरे पीछे रहेगा," मैंने कहा। "दूर। पर रहेगा।"
"अरे, ये सब अंदर जाने से पहले की बातें हैं," सुक्खी बुआ ने कहा, अपनी साड़ी का पल्ला ठीक करते हुए। "पहले मैं बताऊँ, मैंने क्या सुना है।"
सब उसकी तरफ़ मुड़े।
"अरे मैंने तो सुना है," उसने आँखें बड़ी करके कहा, "कि शहर के अखाड़े में ठाकुर ने सौ पहलवान जमा किए हैं। सौ! और उन सबको रात भर खीर खिलाई गई है, ताकि सुबह वो हाथ न उठा सकें जितना वो उठाते हैं।"
कालू काका ने सुक्खी बुआ की तरफ़ देखा।
"ये बात तूने किससे सुनी?"
"चाय वाले की बीवी के भाई की साली ने बताया। वो शहर में कपड़े धोती है।"
मैं मुस्कुराया। और मुझे लगा — ये औरत जो बात बढ़ा-चढ़ाकर बोलती है, वो अक्सर सच ही बोलती है।
"तो सौ पहलवान," मैंने कहा।
"सौ," सुक्खी बुआ ने दोहराया। "और एक खीरे वाला भी है जो उन्हें ताकत का पानी पिलाता है।"
"वो पानी नहीं, ज़हर है," मैंने कहा।
"तो फिर तू अकेला कैसे—"
"मैं अकेला नहीं जाऊँगा," मैंने कहा, और मैंने पीछे मुड़कर देखा।
पीछे, अंधेरे में, मशालों की रोशनी में, गाँव खड़ा था। मैंने उन्हें गिनना चाहा और नहीं गिन पाया। सत्तर-अस्सी आदमी, औरतें, बच्चे — रामपुर का पूरा गाँव, मशालें लिए, लाठियाँ लिए, कुछ लोटे लिए।
वो एक साथ बोले, और उनकी आवाज़ अखाड़े की दीवार से टकराकर लौटी।
"वीर सिंह, हम तुम्हारे साथ हैं।"
मेरे घुटनों में जान नहीं थी। मैंने भवानी की लाठी का सहारा लिया।
टिंकू मेरे पास आया, हाथ में लड्डुओं की एक बड़ी टोकरी। उसका चेहरा पसीने से भीगा था, पर मुस्कान पूरी थी।
"भाई," उसने कहा, "आज सुबह मैंने दुकान पर ताला लगाया और सोचा — क्या करूँ? फिर मैंने सारा घी, सारी बूरा, सारा मैदा उठाया और लड्डू बनाए। सोलह किलो।" उसने टोकरी ऊपर की। "मैंने एक बात कही थी — एक दिन मेरी मिठाई जीतने वाले पहलवान के मुँह में जाएगी। आज वो दिन आ गया।"
"टिंकू," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भर आई, "तू हारा हुआ पहलवान के मुँह में भी डाल देगा?"
"हारे हुए के मुँह में तो मैं रोज़ डालता हूँ," उसने कहा, और सब हँस पड़े। "तू जीतने पर बात करते हैं।"
मीरा मेरे पास आई। उसने मेरे हाथ पर हाथ रखा। उसकी हथेली ठंडी थी, और उसमें तुलसी और अदरक की गंध थी।
"अब तुम अकेले नहीं हो," उसने कहा।
"मुझे पता है," मैंने कहा।
और फिर हम दोनों चुप हो गए। उस चुप्पी में बहुत कुछ था जो कहा जा सकता था, पर कहा नहीं गया। मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा।
"वीर," उसने धीरे से कहा, "मैं तुम्हारे साथ शहर चलूँगी। और जब तुम जीतोगे, तो मैं मिट्टी में तुम्हारे साथ खड़ी होऊँगी।"
मेरी साँस रुक गई।
"मीरा—"
"मुझे कुछ मत कहना," उसने कहा। "बस चल।"
मैं हँसा। मेरी आँखें गीली थीं और मैं हँस रहा था।
"चलो," मैंने कहा।
हम पुल पार करके शहर की सड़क पर पहुँचे। सड़क के दोनों तरफ़ लोहे के खंभे थे, और उन पर बड़े-बड़े होर्डिंग लगे थे। एक होर्डिंग पर मोटे अक्षरों में लिखा था — "भारत केसरी मुकाबला — आज रात।"
मैंने होर्डिंग के नीचे एक लाइन देखी, छोटे अक्षरों में।
"रामपुर का वीर सिंह बनाम शहर के दस पहलवान।"
मेरे पैर ठिठक गए।
"दस?" मैंने कहा।
"सुक्खी बुआ ने सौ कहा था," टिंकू ने धीरे से कहा।
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