Spirit of a Fighter – Chapter 1038
"छोड़ मत!" मैंने दाँत भींचकर कहा। "टिंकू, छोड़ मत!"
"भाई," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब वो डर था जो बचपन में था, "मैंने तुझे धमकी वाला काग़ज़ लिखा था। माँ ने नहीं। मैंने लिखा था।"
"पता है," मैंने कहा। "खींच!"
हमने एक झटके में खींचा। टिंकू ऊपर आया — उसका पैर कुएँ के किनारे पर टिका। उसके हाथ में अब भी वो छुरी थी, पर वो उसे फेंकने ही वाला था कि नीचे से फिर आवाज़ आई।
"टिंकू… तू भी उनके साथ?"
टिंकू रुका। उसने नीचे देखा।
"अब्बा," उसने कहा, "मैं थक गया हूँ।"
"तू मेरा बेटा नहीं," आवाज़ ने कहा। "तू मेरा हाथ था।"
"तो फिर हाथ को छोड़ दे," टिंकू ने कहा, और उसने अपनी कलाई पर बँधी रस्सी को छुरी से काट दिया।
रस्सी टूटी, और नीचे से एक चीख आई — गुस्से की, हार की।
टिंकू कुएँ के किनारे पर गिरा। उसकी साँस फूल रही थी। उसकी आँखों से पानी बह रहा था।
"भाई," उसने कहा, "मुझे माफ़ कर दे।"
मैंने उसे उठाया और गले लगाया। मेरी आँखें भी भर आई थीं। "चुप कर," मैंने कहा। "तेरी खीर अभी बाकी है।"
कालू काका ने कुएँ में झाँका। "अंदर रोशनी है," वो बोले। "और सीढ़ियाँ… नीचे तक जाती हैं।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "वीर, ये जाल है।"
"पता है," मैंने कहा। "पर टिंकू ने रास्ता दिखा दिया है।"
मैंने टिंकू को कालू काका के हाथ में दिया और कुएँ की सीढ़ियों पर पैर रखा। नीचे से गरम हवा आ रही थी — वही गरम मिट्टी, वही कपूर, वही बादाम का तेल।
पर इस बार कुछ और भी था। चंदन। और… ताज़ी छपी स्याही।
मैं उतरा। दस सीढ़ियाँ, बीस, तीस। अंधेरा गाढ़ा हो रहा था। मीरा मेरे पीछे थी, उसके हाथ में लालटेन। कालू काका सबसे पीछे, टिंकू को सहारा देते हुए।
नीचे पहुँचकर मैंने देखा — एक छोटा कमरा, जिसकी दीवारों पर तेल के दीये जल रहे थे। बीच में एक लकड़ी की मेज़ थी। मेज़ पर एक काग़ज़, एक कलम, और एक कटोरी।
कटोरी में खून था।
मेरी नज़र दीवार पर पड़ी। वहाँ एक आदमी खड़ा था — सफ़ेद बाल, झुका शरीर, चश्मा। मुंशीजी। उनके हाथ में कलम थी, और वो काग़ज़ पर कुछ लिख रहे थे। उनकी कलाई से खून टपक रहा था।
"आ गए," उन्होंने सिर उठाए बिना कहा। "बैठो। मैं अभी तुम्हारी मौत का सर्टिफिकेट लिख रहा हूँ।"
मेरी मुट्ठी भींच गई। "मुंशीजी, आपने मेरे पिता को—"
"मैंने कुछ नहीं किया," उन्होंने कहा, और पहली बार उनकी आवाज़ में कुछ सच्चा था। "मैंने सिर्फ़ हिसाब रखा। हर मौत का। हर शीशी का। हर ज़मीन के सौदे का।" उन्होंने काग़ज़ उठाया। "ये देखो। भवानी सिंह — मौत की वजह: दिल का दौरा। असली वजह: मेरी कलम।"
उन्होंने काग़ज़ फाड़ दिया।
"अब लिखो," उन्होंने कहा। "मुंशीजी — मौत की वजह: सच। असली वजह: वीर सिंह।"
और वो मेज़ पर गिर पड़े।
मीरा दौड़ी। उसने उनकी कलाई देखी, नाड़ी टटोली।
"ये खुद को काटा है," उसने कहा। "बहुत खून बह गया।"
मैंने उनका चेहरा उठाया। उनकी आँखें खुली थीं।
"वीर," उन्होंने धीरे से कहा, "मैंने तेरे पिता को मारा नहीं। मैंने सिर्फ़ काग़ज़ लिखा। असली हाथ तो… असली हाथ तो ठाकुर का था। और उसका हाथ आज भी ज़िंदा है।"
"कहाँ?" मैंने कहा।
"शहर में," मुंशीजी ने कहा। "बड़े अखाड़े में। वहाँ आज रात एक मुकाबला है। और उसमें तेरा नाम… मरने वालों की लिस्ट में लिखा है।"
उनकी आँखें बंद हो गईं।
मैंने उन्हें कालू काका के हाथ में दिया। "इन्हें ऊपर ले जाओ। और टिंकू को भी।"
"तू कहाँ जा रहा है?" मीरा ने कहा।
मैंने मेज़ पर पड़ा काग़ज़ उठाया। उस पर एक पता लिखा था — शहर का बड़ा अखाड़ा, और समय — आज रात, नौ बजे।
"अब आख़िरी लड़ाई शहर में होगी," मैंने कहा।
कालू काका ने मेरा हाथ पकड़ा। "बेटा, ये जाल है।"
"जाल है," मैंने कहा। "पर मैं अंदर जाऊँगा। क्योंकि अगर मैं नहीं गया, तो वो अगली लिस्ट में माँ का नाम लिखेगा। और गुड़िया का।"
मीरा ने मेरा हाथ थामा। "तो मैं भी चलूँगी।"
"मीरा—"
"बहस नहीं," उसने कहा। "तूने कहा था — तू अकेले नहीं है। अब मेरी बारी है।"
हम ऊपर आए। अदालत के बाहर पुलिस अब भी ठाकुर को ढूँढ रही थी। इंस्पेक्टर शर्मा ने हमें देखा और दौड़े आए।
"ठाकुर नहीं मिला," उन्होंने कहा। "उसका भतीजा भी गायब है। गाड़ी का पता चला — शहर की तरफ़ गई है।"
हरनाम भीड़ में से निकला। उसका चेहरा पीला था, हाथ काँप रहे थे।
"शहर," उसने कहा। "वो शहर के बड़े अखाड़े में गया है। वहाँ भैरव के बचे हुए आदमी इकट्ठे हो रहे हैं। मुझे पता है — मैंने ही उनके काग़ज़ बनाए थे।"
"कितने आदमी?" मैंने कहा।
"पचास से ज़्यादा," हरनाम ने कहा। "और सबके हाथ में पीली शीशी है।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "बेटा, अब क्या?"
मैंने काग़ज़ को जेब में रखा और गाँव की तरफ़ मुड़ा।
"पहले घर चलते हैं," मैंने कहा। "माँ से मिलना है।"
गाँव लौटते वक़्त सूरज ढल रहा था। नीम के पेड़ों की छाया लंबी हो रही थी। रास्ते में किसी ने कुछ नहीं पूछा। बस सिर हिलाया, हाथ जोड़े। सुक्खी बुआ ने दूर से ही हाथ उठाया और बोलीं — "अरे, मैंने तो सुना है कि शहर में बड़ा मुकाबला है। मैं भी चलूँगी।"
"बुआ, वहाँ खतरा है," मीरा ने कहा।
"खतरा तो घर में भी है," सुक्खी बुआ ने पान का बीड़ा पलटकर कहा। "कम से कम वहाँ मज़ा आएगा।"
हम आँगन में पहुँचे। सरस्वती चक्की पर बैठी थीं — पर चक्की नहीं चल रही थी। वो बस बैठी थीं, हाथ गोद में, आँखें बंद।
"माँ?"
उन्होंने आँखें खोलीं। मुझे देखकर उनके चेहरे पर कुछ बदला — डर नहीं, थकान नहीं। कुछ और।
"आ गया," उन्होंने कहा। "मैं जानती थी।"
"माँ, आपने कुएँ पर जाकर कहा था — 'वो आ गया'?"
वो उठीं। उनके हाथ चक्की के पत्थर पर टिके रहे। "हाँ। क्योंकि मैंने उसकी आवाज़ सुनी थी। मुंशीजी नहीं। कोई और। कोई जो बीस साल से मेरे कानों में बोल रहा था।"
"कौन?"
"भवानी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ नहीं काँपी। "मैंने सुना — 'सरस्वती, अब तेरा बेटा लड़ेगा।' और मैं जानती हूँ कि ये बात सच है। इसलिए आज मैंने चक्की नहीं चलाई।"
वो आँगन के बीच आईं और पहली बार उस चौकी पर बैठीं जो पिताजी की थी। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया।
"आज मैं चक्की नहीं चलाऊँगी," उन्होंने कहा। "आज मेरा बेटा लड़ने जा रहा है।"
गुड़िया दौड़कर आई और मेरे गले लग गई। "भैया, मुझे पता था तुम आओगे।"
"तू ठीक है?" मैंने उसका चेहरा देखा।
"हाँ," उसने कहा, और उसकी आँखों में पानी था पर होंठ सख्त। "मैंने रोया नहीं। माँ ने कहा था — 'जो रोता है, वो हारता है।' तो मैंने नहीं रोया।"
मैंने उसे सीने से लगाया। मेरी आँखें जल रही थीं।
उसी वक़्त रणवीर सिंह की बैलगाड़ी आँगन में आई। वो व्हीलचेयर पर थे, पर उनका चेहरा आज कुछ और कह रहा था। उनके पीछे कमला देवी थीं, लाठी टेकती हुई।
रणवीर सिंह ने आँगन में सबको देखा — सरस्वती, गुड़िया, टिंकू (जो अब सुध में था, कालू काका के सहारे खड़ा), हरनाम, मीरा, और मैं।
"सब सुनो," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो गरज लौट आई थी जो सालों से नहीं सुनी थी। "अब आख़िरी लड़ाई शहर में होगी।"
सन्नाटा छा गया।
"ठाकुर वहाँ है," रणवीर सिंह ने कहा। "उसके आदमी वहाँ हैं। और आज रात वहाँ एक मुकाबला है — जिसमें वो चाहते हैं कि वीर मारा जाए। पर मैं कहता हूँ — वीर लड़ेगा, और जीतेगा।"
"पर वो पचास आदमी हैं," हरनाम ने कहा।
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