Spirit of a Fighter – Chapter 1037
"मैंने कहा था ना भाई," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ अब टिंकू की नहीं थी। किसी और की थी — गहरी, ठंडी, जैसे कुएँ से आती हुई। "मैं अकेला नहीं था।"
और वो कुएँ की तरफ़ चल पड़ा, और उसके कदमों की आवाज़ अदालत के सन्नाटे से भी गहरी थी।
॥
टिंकू के कदमों की आवाज़ दूर जा रही थी, और मैं अपनी जगह पर जमा खड़ा था। मेरे पाँव नहीं हिल रहे थे। मेरी आँखों के सामने वही टोपी पड़ी थी जो सुबह तक टिंकू के सिर पर थी, और अब ज़मीन पर धूल खा रही थी।
"रुक!" मैंने आवाज़ निकाली। मेरी आवाज़ फटी हुई थी। "टिंकू, रुक जा!"
वो नहीं रुका। उसकी पीठ सीधी थी, कदम बराबर, जैसे कोई सालों से इसी रास्ते पर चल रहा हो। मैंने मीरा का हाथ छोड़ा और उसके पीछे दौड़ा। पैर फिसल रहे थे। मेरे गले में कुछ अटका था — क्या, ये नहीं बता सकता। डर या गुस्सा, पता नहीं।
मैंने उसका कंधा पकड़ा और घुमाया।
जो चेहरा मेरे सामने आया, वो टिंकू का था। वही टोपी वाला सपाट माथा, वही कान के पीछे की पेंसिल, वही हल्दी और घी की गंध। पर आँखें… आँखें वो नहीं थीं। उनमें वो मुस्कान नहीं थी जो टिंकू की खीर से पहले आती थी।
"भाई," टिंकू ने कहा। आवाज़ वही थी, पर उसमें एक हल्की सी गरमाहट थी जो अदालत के सन्नाटे में अजीब लगी। "तू मेरा कंधा ऐसे पकड़ता है जैसे मैंने तेरी मिठाई खा ली हो।"
"तू कौन है?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़।
"अरे, मैं ही हूँ।" उसने अपनी कलाई दिखाई। उस पर वो जला हुआ निशान था, गोल, पुराना। "ये निशान देख। माँ ने बताया था — जब मैं पैदा हुआ, तो पहली बार उन्होंने मुझे तहखाने की मिट्टी में लिटाया था। उसी मिट्टी का ये निशान है।"
मेरे पीछे मीरा आई। उसने टिंकू के चेहरे को गौर से देखा, फिर उसकी कलाई को।
"ये निशान जला हुआ है," मीरा ने कहा। "मिट्टी से ऐसा निशान नहीं बनता। ये आग का है। तूने हाथ आग में डाला था।"
टिंकू हँसा। पर हँसी टिंकू की नहीं थी।
"तू समझदार है, मैडम," उसने कहा। "इसीलिए तुझे यहाँ नहीं होना चाहिए था।"
और उसी पल कुएँ की तरफ़ से फिर वो आवाज़ आई — धीमी, हँसती हुई। "अंदर आ जाओ। सबको बुला लो। मैं इंतज़ार कर रहा हूँ।"
कालू काका दौड़कर आए। उन्होंने टिंकू का चेहरा देखा और उनकी दाढ़ी काँपने लगी।
"बेटा," वो बोले, "तेरे हाथ में क्या लगा है? किसने—"
"काका," टिंकू ने कहा, "आप चुप रहिए। आपने तो बीस साल चुप रहकर यही सिखाया है।"
कालू काका जैसे पत्थर बन गए।
यह सुनकर मेरे पेट में आग जली। मैंने टिंकू का कॉलर पकड़ा। "अब बोल, तू किसके साथ है? माँ ने कहा था तू मेरा भाई है। और तू ये सब कर रहा है?"
टिंकू ने मेरा हाथ नहीं छुड़ाया। उसने बस मेरी आँखों में देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो… जो मैंने सुबह उसके चेहरे पर देखा था जब वो लड्डू खिला रहा था।
"भाई," उसने धीरे से कहा, "मैं किसी के साथ नहीं हूँ। मैं तो बस… मैं बीस साल से उस आदमी के पास रहा हूँ जिसने मुझे पाला। और अब जब तू सच्चाई तक पहुँच गया है, तो मुझे बताना पड़ेगा कि मैं कौन हूँ।"
"कौन है तू?"
"मैं वो हूँ," उसने कहा, "जिसे ठाकुर ने उठाया था। जिसे मुंशीजी ने पाला। जिसे भैरव ने सिखाया। और जिसे… जिसे माँ ने भूल गई।"
उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ टूटा।
"माँ ने तुझे भुलाया नहीं," मैंने कहा। "उसने सोचा तू मर गया।"
"तो फिर वो आज तक क्यों नहीं आई?" टिंकू की आँखें लाल हो गईं। "बीस साल। बीस साल में एक बार भी नहीं। और तू आया — तो उसने तेरे लिए खीर बनाई। मेरे लिए बनाई थी कभी?"
मैं चुप हो गया।
"अरे," टिंकू ने हँसते हुए आँसू पोंछे, "मैं तो बस मज़ाक कर रहा था। चल, अंदर। वो इंतज़ार कर रहा है। और मुझे उसकी नौकरी करनी है।"
वो पलटा और कुएँ की तरफ़ चला।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। "वीर, ये टिंकू नहीं है। ये कोई और है। इसे रोक।"
"रोकूँ कैसे?" मैंने कहा। "ये मेरा भाई है।"
"अभी तेरा भाई नहीं है," मीरा ने कहा। "अभी ये उनका आदमी है। और अगर ये हमें कुएँ में ले गया, तो हम बाहर नहीं आएंगे।"
कालू काका ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनका हाथ ठंडा था, जैसे कुएँ का पानी।
"वो सही कह रही है, बेटा," वो बोले। "टिंकू… वो आज सुबह से अजीब था। मैंने देखा था — वो अपनी टोपी बार-बार पोंछ रहा था, और उसकी उँगलियाँ जल रही थीं। मैंने पूछा तो बोला — 'काका, गरम तवा है।' पर तवा नहीं था। वो तहखाने की गरम मिट्टी थी।"
मैंने टिंकू को देखा। वो कुएँ के मुँह पर खड़ा था, और नीचे से आती आवाज़ से बात कर रहा था। हमें सुनाई दे रहा था — धीमी फुसफुसाहट।
"हाँ," टिंकू कह रहा था, "वो आ गया है। मीरा भी है। और कालू काका भी।"
नीचे से कोई बोला, फिर टिंकू हँसा।
मैंने मीरा और कालू काका को इशारा किया। हम तीनों दबे पाँव उसकी तरफ़ बढ़े। मेरी जेब में भवानी की डायरी थी, और मेरे हाथ में वो काग़ज़ जो फाटक पर चिपका था।
जैसे ही मैंने उसका कंधा फिर पकड़ा, टिंकू ने पलटकर मेरी तरफ़ देखा — और इस बार उसकी आँखों में कुछ और था। डर।
"भाई," उसने धीरे से कहा, "मुझे… मुझे याद नहीं कब से। वो कहता है और मैं कर देता हूँ। जब से उसने मेरी कलाई पकड़ी थी—"
"किसने?" मैंने कहा। "किसने पकड़ी?"
"मुंशीजी ने," टिंकू ने कहा। "दस साल पहले। बोले — 'टिंकू, तेरी माँ ने तुझे छोड़ दिया, अब मैं तेरा बाप हूँ।' और फिर उन्होंने मेरी कलाई पकड़ी और मुझे तहखाने में ले गए। वहाँ एक कुर्सी थी, रस्सियाँ थीं—"
"टिंकू!"
नीचे से आवाज़ आई। तेज़, गुस्से वाली। टिंकू का शरीर झटके से सीधा हो गया, जैसे किसी ने उसे खींचा हो।
"मैं आ रहा हूँ," उसने जवाब दिया, और उसकी आवाज़ फिर वैसी ही हो गई — ठंडी, सपाट। "चलो, भाई। तेरे पापा तुझसे मिलना चाहते हैं।"
"मेरे पापा मर चुके हैं," मैंने कहा।
"अरे नहीं," टिंकू हँसा। "तेरे पापा की हड्डियाँ मर चुकी हैं। पर जिसने उन्हें मारा, वो ज़िंदा है। और वो तेरा इंतज़ार कर रहा है।"
वो कुएँ की सीढ़ियों पर पैर रखने ही वाला था कि मैंने उसका हाथ पकड़ा और खींचा। टिंकू गिरा, पर उठकर फिर खड़ा हो गया। उसके हाथ में अब एक छोटी सी छुरी थी — वही जो वो मिठाई काटने के लिए रखता था।
"टिंकू, ये क्या है?" मैंने कहा। "तू मेरे साथ ऐसा क्यों—"
"क्योंकि तू सबको बचाने आया है," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ फिर टूटी। "और मैं… मैं बीस साल से कोई मुझे बचाने नहीं आया। भाई, तू आया — तो तेरे लिए सब कुछ है। मेरे लिए कुछ नहीं।"
मीरा आगे आई। उसने अपना बैग खोला और उसमें से वो हरी शीशी निकाली।
"टिंकू," उसने धीरे से कहा, "मैं तुझे बचा सकती हूँ। पर तुझे मेरा हाथ थामना होगा।"
टिंकू ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था।
"मैडम," उसने कहा, "मैंने तेरे लड्डू में भंग मिलाया था। मुझे माफ़ कर दे।"
"माफ़ी बाद में," मीरा ने कहा। "पहले हाथ दे।"
टिंकू ने हाथ बढ़ाया। और उसी पल कुएँ से एक रस्सी ऊपर आई — मोटी, रस्सी जैसी नहीं, जैसे कोई हाथ। और उसने टिंकू की कमर पकड़ ली।
टिंकू चीखा और नीचे खिंच गया।
"टिंकू!" मैंने चीखकर उसका हाथ पकड़ा। मेरी कमर भी झुकी। मीरा ने मेरी कमर पकड़ी। कालू काका ने मीरा की।
हम चारों कुएँ के मुँह पर एक रस्सी बन गए — और नीचे से कोई ज़ोर लगा रहा था।
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