Spirit of a Fighter1036 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1036

7 min read November 5, 2026

"वो जगह है," उन्होंने धीरे से कहा। "भट्ठे के पीछे, नहर के उस पार, एक पुरानी बावड़ी है। जिसे सब भूतिया कहते हैं। वहाँ पहलवान नहीं रहते, वीर। वहाँ जो रहते हैं…" उन्होंने रुककर साँस ली, "वो पहलवान नहीं रहे।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"मतलब?"

"मतलब," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ भारी हो गई, "कि ठाकुर पहलवानों को ख़त्म नहीं करता। वो उन्हें तोड़ता है। और फिर जो बचता है, उससे अपना काम करवाता है। बीस साल में मैंने कम से कम सात आदमी ऐसे देखे हैं जो अखाड़े से गए और फिर कभी लौटे नहीं। पर वो मरे नहीं। वो बावड़ी में हैं।"

मेरे पीछे गुड़िया की आवाज़ आई।

"भैया।"

मैं पलटा। गुड़िया दौड़कर मेरे पास आई और मेरी कमर से लिपट गई। उसकी कॉपी उसके हाथ से गिर गई और खुल गई। पन्नों पर उसकी लिखाई दिख रही थी — टेढ़ी-मेढ़ी, बच्चों वाली।

"माँ ठीक है," उसने रोते हुए कहा। "सुक्खी बुआ ने बताया। वो घर पर हैं। पर भैया, वो आदमी — जो तुम्हारे पीछे आया था — उसने मुझे देखा था। उसने कहा था कि अगर तुम जीत गए, तो वो माँ को ले जाएगा।"

मैंने गुड़िया के सिर पर हाथ रखा।

"वो नहीं ले जाएगा," मैंने कहा। "मैं वादा करता हूँ।"

पर मेरी आवाज़ में वो यकीन नहीं था जो मेरे शब्दों में था। और गुड़िया — बारह साल की गुड़िया — उसने मेरी आँखों में देखकर वो यकीन ढूँढा जो वहाँ नहीं था।

उसने कुछ नहीं कहा। बस मेरी कमर को और कसकर पकड़ लिया।

तभी जज की आवाज़ आई — "अदालत ख़त्म। अगली सुनवाई कल सुबह।"

और जैसे ही लोग उठने लगे, कमला देवी मेरे पास आईं। उनकी लाठी की आवाज़ अब मुझे पहचानी लग रही थी। उनके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था — पीला, मुड़ा हुआ, जिस पर कुछ लिखा था।

"ये तुम्हारे लिए है," उन्होंने कहा। "मुंशीजी ने भेजा है। भागने से पहले।"

मैंने लिफ़ाफ़ा लिया और खोला।

अंदर एक काग़ज़ था। और उस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी —

"बावड़ी में सात पहलवान हैं। तीन ज़िंदा हैं। और उनमें से एक तुम्हारा भाई है।"

मैंने वो काग़ज़ मीरा को दिया। उसने पढ़ा, और उसका चेहरा पीला पड़ गया।

"मेरा भाई?" मैंने धीरे से कहा। "मेरा तो कोई भाई नहीं—" और फिर मैं रुक गया।

टिंकू।

मैंने चारों तरफ़ देखा। टिंकू अदालत के पिछले हिस्से में खड़ा था, अपनी टोपी हाथ में लिए। वो मेरी तरफ़ देख रहा था — और उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने कभी नहीं देखा था।

"टिंकू," मैंने कहा। "तू यहाँ है।"

"हाँ भाई," उसने कहा। "मैं तो यहीं था।"

"तो फिर ये कौन है?" मैंने काग़ज़ उसकी तरफ़ बढ़ाया। "मुंशीजी लिखते हैं कि बावड़ी में मेरा भाई है।"

टिंकू ने काग़ज़ पढ़ा। उसके हाथ काँपने लगे। और फिर उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ और आ गया — कुछ जो डर से भी गहरा था।

"भाई," उसने धीरे से कहा, "माँ ने मुझे छोड़ा था, ये तो पता है। पर… पर उसने कभी नहीं बताया कि मैं अकेला था।"

"मतलब?"

"मतलब," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई, "कि जब माँ ने मुझे सुक्खी बुआ के पास छोड़ा था, तो मैं अकेला नहीं था। मेरे साथ एक और बच्चा था। माँ ने हम दोनों को छोड़ा था। और उस दूसरे बच्चे को…" उसने काग़ज़ की तरफ़ देखा, "बाद में ठाकुर ले गया।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

"कौन?" मैंने पूछा। "कौन था वो?"

टिंकू ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"मुझे नाम नहीं पता," उसने कहा। "सुक्खी बुआ ने कभी नहीं बताया। पर वो लड़का… वो मुझसे बड़ा था। और वो हमेशा कहता था कि एक दिन वो अखाड़े का सबसे बड़ा पहलवान बनेगा।"

कालू काका ने अचानक अपनी लाठी ज़मीन पर पटक दी। आवाज़ इतनी ज़ोर की थी कि आस-पास के लोग पलटकर देखने लगे।

"मुझे पता है वो कौन है," उन्होंने कहा। उनकी आँखों में वो चमक थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी। "बीस साल पहले, जब भैरव ने बावड़ी बनवाई थी, तो उसके पास एक लड़का था — कम उम्र का, तेज़, गुस्सैल। उसे अखाड़े में हर कोई 'अंधा' कहकर बुलाता था, क्योंकि वो रात में भी दिन जैसा देखता था। और उसका हाथ…" कालू काका रुके। उन्होंने अपनी कलाई उठाई। "उसकी बाईं कलाई पर जली हुई मिट्टी का निशान था। भैरव ने खुद उसे गरम मिट्टी से दागा था।"

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। टिंकू ने अपनी बाईं कलाई देखी। उस पर कोई निशान नहीं था।

"मुझे नहीं पता," उसने धीरे से कहा। "मैंने उसे कभी नहीं देखा। हम दोनों को अलग कर दिया गया था।"

मैंने काग़ज़ को अपनी जेब में रखा।

"तो मुझे बावड़ी जाना है," मैंने कहा। "आज रात।"

"नहीं," मीरा ने कहा। "आज नहीं। तू पूरी रात जागा है, वीर। तेरे हाथ काँप रहे हैं और तेरी आँखें लाल हैं। बावड़ी में जाने के लिए तुझे ताकत चाहिए, और ताकत नींद से आती है।"

"मेरी माँ—"

"तेरी माँ सुरक्षित है। मैंने खुद सिपाही बिठाए हैं।" मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। "और अगर तू बावड़ी में गिरा, तो वो सात पहलवान कभी बाहर नहीं आएंगे। सोच।"

मैंने उसकी आँखों में देखा। वो सही कह रही थी। पर मेरे अंदर कुछ था जो सोने नहीं दे रहा था।

"ठीक है," मैंने कहा। "चार घंटे।" मैंने अपनी मुट्ठी भींची। "चार घंटे बाद, चाहे जो हो, मैं बावड़ी जाऊँगा।"

मीरा ने सिर हिलाया।

"मैं साथ चलूँगी।"

"मीरा—"

"ये बहस नहीं है," उसने कहा। और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मैंने पहली बार अखाड़े की मिट्टी में सुनी थी। "तू अकेला नहीं जाएगा।"

बाहर निकलते वक़्त सूरज पूरा ऊपर आ चुका था। गाँव के लोग अदालत से निकलकर अपने-अपने काम पर जा रहे थे। किसी ने मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया। किसी ने हाथ जोड़े। कोई कुछ नहीं बोला।

पर सुक्खी बुआ मेरे रास्ते में आ खड़ी हुईं।

"अरे सुन," उन्होंने पान का बीड़ा एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ किया, "मैंने तो सुना है कि तेरी माँ ने सुबह कुआँ देखा था। बोली — 'पानी नीचे से ऊपर आ रहा है।' अब ये क्या बात हुई?"

मेरे पैर रुक गए।

"कुआँ?" मैंने कहा। "कौन-सा कुआँ?"

"अरे वही," सुक्खी बुआ ने कहा, "जो अखाड़े के पीछे है। जिसे बंद कहते हैं। तेरी माँ ने आज सुबह वहाँ जाकर खड़े होकर कहा — 'वो आ गया।' और फिर घर चली आई, चुपचाप।"

मैं मीरा की तरफ़ देखा। मीरा की आँखें फैल गईं।

"वो कुआँ," मीरा ने धीरे से कहा, "जिसके नीचे तहखाना है?"

कालू काका ने अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरा।

"मुंशीजी भागा नहीं," वो बोले। "वो कुएँ में उतरा है।"

मैंने मीरा का हाथ पकड़ा।

"चार घंटे रद्द," मैंने कहा। "अभी चलते हैं।"

और हम भीड़ को चीरते हुए अखाड़े की तरफ़ चल पड़े — जहाँ कुएँ के नीचे, किसी अंधेरे में, एक आदमी बैठा था जिसके पास मेरे पिता की मौत का हिसाब था, और शायद… शायद मेरे भाई का पता भी।

पर जैसे ही हम अखाड़े का फाटक खोलने पहुँचे, मैंने देखा कि फाटक पर एक काग़ज़ चिपका था — नया, ताज़ा, जिसकी स्याही अभी सूखी भी नहीं थी।

और उस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी —

"वीर, तेरी माँ कह रही है — 'वो आ गया'। और मैं कहता हूँ — 'वो सच कह रही है। मैं आ गया हूँ।'"

मेरे हाथ से काग़ज़ छूट गया और हवा में लहराने लगा। मीरा ने उसे झपटा। और उसी पल, कुएँ की तरफ़ से एक आवाज़ आई — धीमी, हँसती हुई, जैसे कोई बहुत पुराना दोस्त बुला रहा हो।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था।

"वीर," उसने धीरे से कहा, "ये लिखाई… ये तो टिंकू की लिखाई है।"

मैं पलटा। टिंकू वहीं खड़ा था — पर उसके हाथ खाली थे, और उसकी टोपी ज़मीन पर पड़ी थी। उसने अपनी बाईं कलाई उठाई, और उस पर — गरम मिट्टी से जला हुआ, पुराना, धुँधला निशान — साफ़ दिख रहा था।

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