Spirit of a Fighter – Chapter 1033
"तो आप ये काग़ज़ क्यों जला रही हैं?" मीरा ने पूछा, और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो किसी वकील की होती है। "अगर आप सच बोलना चाहती हैं, तो इन्हें बचाइए!"
कमला देवी ने मीरा की तरफ़ देखा। और फिर वो चीज़ हुई जो मैंने नहीं सोची थी। उन्होंने बर्तन से आग निकालकर फ़र्श पर फेंक दी और जो काग़ज़ बचे थे, उन्हें दोनों हाथों से उठा लिया।
"ये तेरे लिए हैं," उन्होंने कहा, और मेरी तरफ़ बढ़ा दिए। "मैं इन्हें जलाने आई थी क्योंकि मुझे डर था। पर तीस साल में पहली बार…" उनकी आवाज़ रुकी। "पहली बार मुझे कोई ऐसा दिखा जो इन्हें जलने नहीं देगा।"
मैंने काग़ज़ लिए। वो गरम थे। मेरी उँगलियाँ जलीं, पर मैंने उन्हें गिराया नहीं।
और तभी दरवाज़े पर एक आवाज़ आई।
"बहुत अच्छा हुआ।"
हम सब पलटे।
दरवाज़े के फ़्रेम में एक आदमी खड़ा था। लंबा, दुबला, सफ़ेद शेरवानी, हाथ में चमड़े का बैग। चश्मे के पीछे उसकी आँखें लालटेन की रोशनी में चमक रही थीं।
हरनाम।
"तू?" मैंने कहा।
"मैं," उसने कहा, और अंदर आया। "मैंने सोचा था कि आज रात यहाँ कुछ दिलचस्प होगा। और मैं सही था।"
कमला देवी उसकी तरफ़ देखकर पीछे हटीं।
"तू भी उन्हीं में से है?" उन्होंने कहा।
"नहीं," हरनाम ने कहा। "मैं तो सिर्फ़ हिसाब रखता हूँ, मैडम। बीस साल से मैं यही कर रहा हूँ — जो मरते हैं उनका हिसाब, जो जीते हैं उनका हिसाब। और आज रात…" उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक मोटी फ़ाइल निकाली। "आज रात मुझे एक और हिसाब जोड़ना है।"
"क्या चाहिए तुझे?" मैंने पूछा।
"तू," उसने कहा। "तू मेरे साथ चल। अदालत जाएगा, और जो जानता है सब बोल देगा। मेरे बेटे गोलू की जान की क़ीमत पर।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ काँप रहे थे। उसकी आवाज़ में वो दबंगई नहीं थी जो अदालत में थी।
"गोलू कहाँ है?" मैंने पूछा।
"ठाकुर के आदमियों के पास। और अगर तू कल अदालत में मेरे ख़िलाफ़ गवाही देगा, तो वो उसे मार डालेंगे।"
कालू काका ने अपनी लाठी ज़मीन पर टेकी।
"बेटा," उन्होंने मुझसे कहा, "ये आदमी बीस साल से झूठ बोल रहा है। और आज ये भी झूठ बोल रहा है।"
हरनाम ने उनकी तरफ़ देखा।
"क्यों?" उसने कहा। "तुम्हें क्या पता?"
"क्योंकि," कालू काका ने धीरे से कहा, "गोलू को ठाकुर के आदमी नहीं उठा ले गए। तूने खुद उसे भेजा है। उसी स्कूल में। जहाँ करण बेहोश मिला था।"
हरनाम का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"तू… तू कैसे जानता है?"
"क्योंकि मैंने तेरे बेटे से बात की थी," कालू काका ने कहा। "उस दिन स्कूल में। जब वो पीली शीशी लेकर आया था। उसने मुझसे कहा था — 'काका, पापा ने कहा है कि अगर मैं ये शीशी वीर भैया को दे दूँ, तो हमें नया घर मिल जाएगा।'"
हरनाम पीछे हटा। उसका बैग फ़र्श पर गिरा और काग़ज़ बिखर गए।
"अब बोल," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी थी, "तू किसके लिए काम कर रहा है?"
हरनाम ने अपना चश्मा उतारा और उसे अपनी कमीज़ से पोंछा। उसके हाथ काँप रहे थे।
"मैं ठाकुर के लिए नहीं," उसने कहा। "मैं… मैं उसके लिए काम करता हूँ जो ठाकुर के पीछे है। जो आज अदालत में सबसे आगे की कुर्सी पर बैठा था।"
मेरी साँस रुक गई।
"नाम?" मैंने कहा।
"वो…" हरनाम ने नीचे देखा। "वो मेरा साला है। मेरी पत्नी का भाई। उसने मुझे बीस साल पहले इस काम में डाला था। और अब अगर मैं मुकर जाऊँ, तो वो मेरे बच्चों को नहीं छोड़ेगा।"
"नाम!" मैंने कहा, और इस बार मेरी आवाज़ तेज़ थी।
हरनाम ने अपना मुँह खोला।
और तभी, बाहर से एक आवाज़ आई — बहुत तेज़, किसी चीज़ के टूटने की आवाज़।
हम सब दरवाज़े की तरफ़ भागे।
बाहर, आँगन में, एक बैलगाड़ी खड़ी थी। और उसके पास, मशाल की रोशनी में, दो आदमी एक आदमी को पकड़कर खींच रहे थे। जिसे खींच रहे थे, उसका चेहरा जला हुआ था।
मोहन।
"वीर सिंह!" उसने चीखकर कहा। "वो जानता है! वो जानता है कि मैं आज रात आया हूँ! उसने भेजा है!"
मैंने अपने पैरों को हिलाया, पर कालू काका ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"रुक," उन्होंने कहा। "ये जाल है।"
"पर वो…"
"देख," उन्होंने कहा और ठुड्डी से इशारा किया।
मैंने देखा। बैलगाड़ी के पीछे, अंधेरे में, एक तीसरा आदमी खड़ा था। उसके हाथ में कुछ चमक रहा था — पीली शीशी।
"और वो?" मैंने पूछा।
"वो इंतज़ार कर रहा है," कालू काका ने कहा। "इसका कि तू भागे। और वो तुझे रास्ते में पकड़ ले।"
मोहन फिर चीखा। उसकी आवाज़ में दर्द था।
और तभी मीरा ने मेरा दूसरा हाथ थाम लिया।
"वीर," उसने कहा, बहुत धीमे से, "मेरे पास एक तरीक़ा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"हरनाम हमारे साथ है," उसने कहा। "उसे बोल, वो उन दोनों को बुला ले। और जब वो आएं, तो हम पीछे के दरवाज़े से निकल जाएँ।"
मैंने हरनाम की तरफ़ देखा। वो दहलीज़ पर खड़ा था, उसका चेहरा सफ़ेद।
"अगर तूने मेरी एक बात मानी," मैंने कहा, "तो मैं तेरे बेटे को बचा दूँगा। गोलू को ठाकुर के आदमियों से नहीं, उससे बचा दूँगा जो उसके पीछे है।"
हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था।
"कैसे?"
"तू अंदर जा," मैंने कहा। "और उन दोनों को बुला। और जब वो अंदर आएं, तो तू बाहर निकलकर मेरे साथ चल।"
हरनाम ने एक पल सोचा। फिर उसने अपना बैग उठाया, अंदर गया, और चीखा — "अरे! अंदर कोई है! जल्दी आओ!"
बाहर, दोनों आदमियों ने मोहन को छोड़ा और कोठी की तरफ़ दौड़ पड़े।
और उसी पल, हम तीनों — मैं, मीरा और कालू काका — पीछे की खिड़की से बाहर कूद गए।
पीछे कोठी के पीछे अंधेरा था, और एक पुरानी दीवार, जिसके पीछे से नहर की आवाज़ आ रही थी।
"मोहन!" मैंने धीरे से आवाज़ दी। "मोहन!"
कोई जवाब नहीं।
"वो उनके साथ नहीं गया," मीरा ने कहा। "जब वो दोनों अंदर दौड़े, तो वो यहीं कहीं…"
तभी हमारे पीछे कुछ हिला।
हम पलटे। मोहन दीवार से चिपका खड़ा था। उसकी जली हुई आधी आँख से खून बह रहा था।
"तुम आ गए," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फटी हुई थी। "मुझे डर था कि तुम नहीं आओगे।"
"क्या हुआ?" मैंने पूछा। "वो कौन थे?"
"वही," उसने कहा। "जो मुझे मारने आए थे। उन्होंने मुझे बैलगाड़ी में डालकर यहाँ खींच लिया। और वो तीसरा — उसने मुझे कुछ पिलाने की कोशिश की, पर मैंने मुँह बंद कर लिया।"
"क्या पिलाना चाहता था?"
"वही," मोहन ने कहा और उसने अपनी जेब से एक टूटी शीशी निकाली। "वही पीला पानी।"
मैंने शीशी ली। उसकी गंध उठी — कपूर, जली मिट्टी, और एक तीखी चीज़ जो मैंने पहले नहीं सूँघी थी।
"ये वही नहीं है," मैंने कहा।
मोहन ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्या मतलब?"
"ये वही शीशी नहीं है," मैंने कहा। "जो भैरव देता था, उसमें सिर्फ़ कपूर और जली मिट्टी की गंध थी। इस में एक और चीज़ है।"
"क्या?"
मैंने फिर सूँघा। और मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"धतूरा," मैंने कहा। "और अफ़ीम। ये वो पानी है जो आदमी को बेहोश कर देता है। ये मारने के लिए नहीं है।"
"तो किसलिए?"
"इसलिए," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ ठंडी थी, "कि जब तू बेहोश हो जाए, तो तुझे कहीं ले जाया जाए। जहाँ से तू कभी न लौटे।"
मोहन ने अपना मुँह खोला, पर कुछ नहीं बोला।
"कहाँ ले जाना था?" मैंने पूछा।
मोहन ने हमारी तरफ़ देखा। और उसकी आँखों में वो डर आया जो मैंने किसी आदमी की आँखों में नहीं देखा था।
"उस जगह," उसने कहा। "जहाँ भवानी की हड्डियाँ भेजी गई थीं। जहाँ से कोई ज़िंदा नहीं लौटता।"
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