Spirit of a Fighter – Chapter 1034
और तभी कोठी के अंदर से आवाज़ आई — हरनाम की चीख।
मैं दौड़ा। खिड़की से अंदर झाँका।
हरनाम फ़र्श पर गिरा था, और उसके ऊपर एक आदमी खड़ा था — वो तीसरा, जो पीली शीशी लेकर अंधेरे में खड़ा था। उसने हरनाम की कमीज़ पकड़कर उसे उठाया।
"बोल," वो कह रहा था, "तेरी ज़ुबान से निकला क्या? उस लड़के को क्या बताया?"
मैंने पीछे की खिड़की से छलाँग लगाई।
अंदर पहुँचकर मैंने उस आदमी की कलाई पकड़ी। उसने मेरी तरफ़ देखा। उसका चेहरा लालटेन की रोशनी में साफ़ दिख रहा था — एकदम आम चेहरा, कोई निशान नहीं, कोई दाग़ नहीं। बस आँखों में एक ठंडी चमक।
"तो तू है," मैंने कहा। "जो बीस साल से सबको चला रहा है।"
उसने अपना हाथ छुड़ाया और पीछे हटा।
"मैं कुछ नहीं चला रहा," उसने कहा। "मैं तो सिर्फ़ एक काम करता हूँ।"
"क्या काम?"
"पहलवानों को चुनना," उसने कहा, और उसके होंठों पर एक मुस्कान आई। "जो ताकतवर हैं, उन्हें ख़त्म करना। और जो कमज़ोर हैं, उन्हें खरीदना।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और तभी, उसकी जेब से कुछ गिरा — एक छोटी सी पीतल की डिबिया।
मैंने उसे उठाया और खोला।
अंदर एक काग़ज़ था। और उस पर सिर्फ़ एक नाम लिखा था।
मैंने उसे पढ़ा, और मेरे हाथ काँप गए।
वो नाम मेरी माँ का था।
"सरस्वती," उसने कहा, और हँसा। "तेरी माँ। जिसने तीस साल तक सब जानकर भी कुछ नहीं कहा। और तू सोचता है कि वो मासूम है?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा, और मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया।
"तू झूठ बोल रहा है," मैंने कहा।
"झूठ?" उसने कहा। "तो जाकर पूछ अपनी माँ से — कि जिस रात भवानी मरा, उस रात वो किससे मिलने गई थी। और जब लौटी, तो उसके हाथ में क्या था।"
और उसी पल, बाहर से आवाज़ आई — कई पैरों की आहट, और मशालों की रोशनी खिड़कियों से अंदर आने लगी।
इंस्पेक्टर शर्मा की आवाज़ आई — "चारों तरफ़ से घेर लो!"
अजनबी ने मेरी तरफ़ देखा।
"तेरी माँ ने मुझसे एक वादा किया था, वीर सिंह," उसने धीरे से कहा। "और आज रात वो उसे पूरा करने आई है।"
और वो पीछे की खिड़की से कूदकर अंधेरे में गायब हो गया।
मैं कोठी से बाहर भागा। इंस्पेक्टर शर्मा के आदमी हरनाम को पकड़ रहे थे। मीरा मेरी तरफ़ दौड़ी आई।
"वीर! क्या हुआ?"
मैंने अपने हाथ में पकड़ी पीतल की डिबिया देखी। उस काग़ज़ को देखा, जिस पर मेरी माँ का नाम था।
"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ टूट रही थी, "मुझे घर जाना है। अभी।"
"क्यों? क्या हुआ?"
मैंने उसे वो काग़ज़ दिया। उसने पढ़ा, और उसका चेहरा पीला पड़ गया।
"वीर," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो मैंने अब तक उसकी आवाज़ में नहीं सुना था, "अगर ये सच है… तो तेरी माँ…"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "इसीलिए तो जा रहा हूँ।"
और मैं उस अंधेरे में घर की तरफ़ दौड़ पड़ा, जहाँ मेरी माँ और मेरी बहन थीं — और जहाँ मुझे पता नहीं था कि मुझे किस चीज़ का सामना करना है।
मेरे पीछे, कोठी के अंदर, कालू काका ने धीरे से कहा — "आज रात हिसाब बराबर होगा। सिर्फ़ ये नहीं पता कि किसका।"
॥
"आज रात हिसाब बराबर होगा। सिर्फ़ ये नहीं पता कि किसका।"
कालू काका की वो आवाज़ कोठी की गरम दीवारों से टकराकर बाहर आई, और मेरे पैर वहीं जम गए। इंस्पेक्टर शर्मा के सिपाही हरनाम को घसीटकर गाड़ी की तरफ़ ले जा रहे थे। हरनाम की कमीज़ का कॉलर फटा हुआ था और उसके होंठ काँप रहे थे। वो मेरी तरफ़ देखता रहा, जैसे कुछ कहना चाहता हो, पर बोल न पाया।
मैंने हाथ में पकड़ी पीतल की डिबिया को मुट्ठी में कस लिया। उस काग़ज़ पर माँ का नाम था। सिर्फ़ नाम — सरस्वती। और उसके नीचे एक तारीख़। वही तारीख़ जो पिता की मौत की रात थी।
मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी।
"वीर, सुन।" उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "वो आदमी तुझे भड़काने के लिए ये सब कह गया है। भागकर जाने से कुछ नहीं होगा।"
"माँ अकेली है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी ही नहीं लग रही थी।
"अकेली नहीं है," कालू काका ने कहा। वो कोठी के दरवाज़े पर खड़े थे, उनकी सफ़ेद दाढ़ी पर धुएँ की कालिख लगी थी। "मैंने गुड़िया को सुक्खी के घर भेज दिया है, और सरस्वती के आँगन में चार आदमी हैं। हरनाम के गाँव वाले। वो उन्हें छूने की हिम्मत नहीं करेंगे।"
"तुमने कब भेजा?" मैंने पूछा।
"जब तू कोठी में घुसा था।" उन्होंने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई। "मैं बूढ़ा हूँ, वीर, अंधा नहीं। मुझे पता था कि ये रात आएगी।"
इंस्पेक्टर शर्मा मेरे पास आए। उनके माथे पर पसीना था।
"वीर सिंह," उन्होंने कहा, "तुम्हें अदालत में होना चाहिए। अभी। कमला देवी को गवाही देनी है, और तुम्हारे बिना वो मामला कमज़ोर पड़ जाएगा।"
"मेरी माँ—"
"तेरी माँ सुरक्षित है। मैंने खुद दो सिपाही उसके आँगन में बिठाए हैं।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आवाज़ थोड़ी नरम पड़ी। "बेटा, ये मुक़दमा सिर्फ़ तेरे बाप का नहीं है। ये ग्यारह पहलवानों का है जो भैरव के पानी से मरे। अगर तू आज यहाँ से भाग गया, तो वो सब भूल जाएंगे कि तू किसके लिए लड़ रहा था।"
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। सुबह की पहली किरण नीम के पेड़ों के पीछे से आ रही थी। वो काग़ज़ मेरी जेब में जल रहा था, जैसे कोई ज़िंदा चीज़ हो।
"वीर।" मीरा ने मेरा हाथ थामा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं और हल्की काँप रही थीं। "एक घंटा। बस एक घंटा अदालत में। उसके बाद, चाहे जो हो, मैं तेरे साथ चलूँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। सुबह की रोशनी में उसके बालों पर धूल थी और उसकी आँखों के नीचे काली लकीरें थीं। वो पूरी रात मेरे साथ भागती रही थी, और एक बार भी नहीं कहा कि थक गई है।
"ठीक है," मैंने कहा। "एक घंटा।"
अदालत का कमरा पहले से भरा हुआ था। गाँव की औरतें एक तरफ़ बैठी थीं, मर्द दूसरी तरफ़। पीछे की बेंच पर सुक्खी बुआ बैठी थीं, हाथ में पान का बीड़ा लिए, और उनके बगल में गुड़िया थी — स्कूल की कॉपी छाती से लगाए, आँखें सूजी हुई, पर चुप।
गुड़िया ने मुझे देखा और उसके होंठ हिले — "भैया।" आवाज़ नहीं निकली। बस होंठ हिले।
मैंने उसे सिर हिलाकर जवाब दिया। अंदर से मैं जल रहा था।
आगे की कुर्सी पर रणवीर सिंह बैठे थे। आज वो व्हीलचेयर पर नहीं थे। उन्होंने सहारे के लिए अपनी लाठी पकड़ी थी और वो खड़े थे — पूरे कद के, काँपते पैरों के साथ, पर खड़े। उनके सफ़ेद बाल आज बँधे हुए थे और उनकी आँखें लाल थीं।
मेरे बैठते ही जज ने अपना चश्मा ऊपर किया।
"मोहन," जज ने कहा, "अदालत तुम्हारी गवाही सुन रही है। तुमने कहा था कि भवानी सिंह की मौत में एक और आदमी शामिल था। अदालत जानना चाहती है — वो कौन था?"
मोहन गवाह के बॉक्स में खड़ा था। उसका जला हुआ चेहरा अदालत की रोशनी में और भी डरावना लग रहा था। एक आँख पूरी तरह बंद थी, दूसरी में वो सफ़ेद पानी भरा था जो मैंने पहले भी देखा था।
"मैंने उसका चेहरा नहीं देखा," मोहन ने धीरे से कहा। "पर आवाज़ पहचानता हूँ। वो अखाड़े का ही कोई पुराना आदमी है, जो हर बात भैरव तक पहुँचाता था। जब भी कोई पहलवान बीमार पड़ता, वो पहले आता था — दवा लेकर नहीं, काग़ज़ लेकर। उसके हाथ में हमेशा एक कॉपी होती थी, जिसमें वो हर मौत का हिसाब लिखता था।"
अदालत में सन्नाटा छा गया।
मेरे पीछे किसी ने खाँसा। कुर्सी की चरमराहट सुनाई दी।
और तभी — मुझे याद आया।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno