Spirit of a Fighter – Chapter 1031
बाहर निकले तो आसमान में लाली फैल रही थी। मोहन हमारे पीछे-पीछे आया, उसका एक पैर घसीटता हुआ। मैं उसके पास गया।
«तुमने बीस साल कहाँ बिताए?» मैंने पूछा।
«इधर-उधर,» उसने कहा। «भट्ठों पर। जंगलों में। जहाँ कोई मेरा चेहरा न देखे। पर मैं तुम्हें देख रहा था, वीर सिंह। हर वक़्त। जब तू अखाड़े के बाहर खड़ा होता था, तब भी। मैं तुझे पहचानता था — भवानी की आँखें तुझमें हैं।»
मेरा गला भर आया। मैंने मुँह फेर लिया।
«तू अंदर क्यों नहीं आया पहले?» मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में गुस्सा था जो मैं खुद नहीं समझ रहा था। «बीस साल! तू सच बोल सकता था!»
«और फिर?» उसने कहा। «फिर ठाकुर मुझे मरवा देता, और मेरे साथ तेरी माँ को भी। मैं इंतज़ार कर रहा था उस दिन का जब कोई और भी सच बोले। और वो दिन आज आया, वीर सिंह। तेरी वजह से। तेरी माँ की वजह से।»
उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आधी जली आँख में पानी चमक रहा था।
«पर एक बात है,» उसने धीरे से कहा, और उसकी आवाज़ अब भी खुरदरी थी, पर अंदर से कुछ और निकल रहा था। «जो काग़ज़ मैंने तेरे लिए रखा है — वो ठाकुर का नहीं है। वो भवानी का है। और उसे देखकर तुझे पता चलेगा कि भवानी ने खुद ज़हर क्यों पिया।»
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। «क्या मतलब? माँ ने बताया था कि गंगा देवी ने गुड़िया की जान की धमकी दी थी…»
«आधी बात सच है,» मोहन ने कहा। «आधी बात वो भी नहीं जानती जो भवानी ने आख़िरी रात लिखी। मैं तुझे वो काग़ज़ दूँगा — पर अभी नहीं। पहले सुनवाई। पहले ठाकुर का अंजाम। वरना वो काग़ज़ भी जल जाएगा।»
मीरा पीछे से आई और मेरे बगल में खड़ी हो गई। उसने मोहन की तरफ़ देखा और कुछ देर चुप रही। फिर बोली, «तुमने बीस साल बाहर रहकर बहुत कुछ सहा है। पर एक बात पूछूँ?»
«पूछो, बेटी।»
«जब तुम भट्ठों पर थे, तुमने खाना कैसे खाया? पानी कैसे पिया? जब कोई तुम्हारा चेहरा देखता, तो तुम क्या बोलते थे?»
मोहन हँसा — छोटी, टूटी हँसी। «मैं कहता था कि मैं भट्ठे पर जल गया था। लोग दया कर देते थे। कुछ रोटी दे देते थे। कुछ दूर से देखकर मुँह फेर लेते थे। मैंने तीस साल में एक ही बात सीखी है, बेटी — ज़िंदा रहने के लिए चेहरा नहीं, ज़ुबान चाहिए। और मेरी ज़ुबान अभी ज़िंदा है।»
उसने मेरी तरफ़ देखा। «कल सुनवाई है। और मैं तुझे बताता हूँ, वीर सिंह — जब मैं अंदर जाऊँगा, तब ठाकुर की आँखों में वो डर देखूँगा जो उसने बीस साल पहले मेरी आँखों में देखा था। और उसके बाद… उसके बाद मैं अपने भाई से मिलूँगा।»
«मुंशीजी से?»
«हाँ। मेरे भाई से। उस आदमी से जिसने मुझे मरवाया और फिर मेरी लाश की शक्ल में बीस साल अपने घर में रखा।»
मैं चौंक गया। «क्या मतलब?»
मोहन ने अपना जला हुआ चेहरा उठाया। «मेरा भाई मुंशीजी, वीर सिंह, वो आदमी नहीं है जो तू समझता है। वो सिर्फ़ ठाकुर का मोहरा नहीं है। वो ठाकुर से भी बड़ा खिलाड़ी है। और जब मैं उसके सामने जाऊँगा, तब वो मुझे देखकर रोएगा — और रोते-रोते वो अपने आप को भी धोखा देगा।»
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर सवाल था। मेरे चेहरे पर भी।
सुक्खी बुआ पीछे से आईं और मोहन को देखकर एक कदम पीछे हट गईं। फिर उन्होंने पान चबाया और बोलीं, «अरे मैंने तो सुना है कि मुंशीजी की एक औरत थी, जो बीस साल पहले मर गई। पर मुझे तो लगता है वो मरी नहीं, वो भी भाग गई थी।»
मोहन ने सुक्खी बुआ की तरफ़ देखा। और इस बार उसकी आँख में कुछ ऐसा चमका जो मैंने पहले नहीं देखा।
«तुम ठीक कहती हो, बुआ,» उसने कहा। «मेरी भाभी ज़िंदा है। और वो उसी जगह है जहाँ मुझे जाना है। पर वो बात कल की है। आज रात मुझे तुमसे कुछ कहना है, वीर सिंह। अकेले में।»
रात हो चुकी थी। मैं नहर के किनारे खड़ा था, और मोहन मेरे बगल में बैठा था। उसने अपने जले हुए हाथ से एक पुरानी पोटली खोली। उसमें से एक काग़ज़ निकला — पीला, सूखा, मुड़ा हुआ।
«ये भवानी का आख़िरी ख़त है,» उसने कहा। «जो उसने मुझे दिया था उस रात। पढ़।»
मैंने काग़ज़ खोला। लिखाई काँपती हुई थी, जल्दी में लिखी हुई।
पढ़ते-पढ़ते मेरी आँखें भर आईं।
«क्या हुआ?» मोहन ने पूछा।
मैंने काग़ज़ उसे वापस दिया और अपना मुँह फेर लिया।
«कुछ नहीं,» मैंने कहा। «बस — अब मुझे पता चल गया कि मेरे पिता ने मरने से पहले किसके लिए दुआ माँगी थी।»
मोहन चुप रहा।
नहर का पानी किनारे से टकरा रहा था। दूर कहीं से एक कुत्ता भौंका, और फिर सन्नाटा छा गया। मैंने काग़ज़ अपनी जेब में रखा और एक लंबी साँस ली।
«कल सुनवाई में,» मैंने धीरे से कहा, «जब तुम अंदर जाओगे — तब मैं तुम्हारे साथ खड़ा रहूँगा।»
«नहीं,» उसने कहा। «तू अपनी माँ के साथ खड़ा रह। मैं अकेला जाऊँगा। बीस साल से अकेला हूँ — एक दिन और सही।»
और फिर उसने वो कहा जो मुझे अंदर तक हिला गया।
«पर वीर सिंह, एक बात याद रखियो। जिस दिन ठाकुर का अंजाम होगा, उस दिन कुछ और होगा। क्योंकि ठाकुर सिर्फ़ एक हाथ है। और उस हाथ को चलाने वाला दिमाग़ बाहर है — और वो दिमाग़ जानता है कि मैं ज़िंदा हूँ। कल जब मैं अदालत में खड़ा होऊँगा, तब वो दिमाग़ मुझे देख लेगा। और उसके बाद हमारे पास बहुत कम वक़्त बचेगा।»
मैंने उसकी तरफ़ देखा। «कौन? कौन है वो दिमाग़?»
मोहन ने नहर की तरफ़ देखा। चाँद पानी में काँप रहा था।
«वो जो आज अदालत में बैठा था, सबसे आगे की कुर्सी पर। वो जिसने आज तेरे पिता को देखकर अपनी आँखें नीची कर लीं। वो जो हर बार सच के सामने सबसे ज़्यादा चुप रहता है।»
«ठाकुर का वकील?»
«नहीं।»
«तो कौन?»
मोहन ने मेरी तरफ़ मुड़कर देखा, और उसकी आधी जली आँख में जो था, वो डर नहीं था — वो एक ठंडा हिसाब था, बीस साल का।
«जिसने मुझे आज अदालत तक जाने का रास्ता दिया,» उसने धीरे से कहा। «वो मेरा दुश्मन नहीं लगा। वो मेरा मददगार लगा। और यही सबसे बड़ी बात है, वीर सिंह — जब कोई बीस साल का दुश्मन अचानक मदद करने लगे, तो समझ लेना कि वो कुछ ऐसा चाहता है जो तू अभी दे नहीं सकता।»
«कौन?» मैंने फिर पूछा, और मेरी आवाज़ तेज़ हो गई। «नाम बोलो!»
«कमला देवी।»
मेरे हाथ जम गए। नहर का पानी बहता रहा। मोहन ने काग़ज़ की पोटली बाँधी और उठ खड़ा हुआ।
«मैं बीस साल से यही सोच रहा हूँ,» उसने कहा। «और कल अदालत में मुझे पता चल जाएगा कि मैं सही था या ग़लत।»
वो चलने लगा, एक पैर घसीटता हुआ।
«पर एक बात, वीर सिंह।»
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
«अगर कल मैं अदालत से लौटकर न आऊँ — तो उस काग़ज़ को अपनी माँ को देना। वो जान जाएगी कि क्या करना है। और वो तुझे बता देगी कि भवानी सिंह ने आख़िरी साँस में किसका नाम लिया था।»
और वो अंधेरे में गायब हो गया।
मैं नहर के किनारे देर तक खड़ा रहा। मेरी जेब में काग़ज़ था, और मेरे दिल में एक नया डर — ऐसा डर जो किसी शीशी से नहीं, किसी छुरी से नहीं, बल्कि उस नाम से आया था जिस पर मैंने कभी शक नहीं किया था।
कमला देवी।
वो औरत जिसने आज सुबह मेरे हाथ में अपनी लाठी थमाई थी और कहा था — «अब तू लड़, मैं तेरे पीछे हूँ।»
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। चाँद पर बादल आ गए थे।
और तभी मेरे कानों में एक आवाज़ आई — दूर से, नहर के उस पार से, जहाँ पुराना रास्ता शहर की तरफ़ जाता है। एक बैलगाड़ी की घंटी, धीमी और रुक-रुक कर बज रही थी। मैंने गर्दन उठाई और उस अंधेरे में देखा।
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