Spirit of a Fighter – Chapter 1030
«और ये तारीख़,» मीरा ने कहा, «इसी दिन दयाल की मौत हुई थी। सुबह दस बजे। जबकि इस काग़ज़ पर दोपहर के चार बजे का समय लिखा है। मेरे पिता उस दोपहर कहाँ थे? पंचायत के चबूतरे पर — जहाँ पूरा गाँव उनके साथ बैठा था। चालीस लोग गवाही दे सकते हैं।»
जज साहब ने काग़ज़ रख दिया। मुंशी की तरफ़ देखा।
«इस काग़ज़ को किसने बनाया?»
और तभी वकील सुधा देवी खड़ी हुईं। वो पहले से ज़्यादा ठंडी लग रही थीं, जैसे कोई आख़िरी हथकंडा बचा रखा हो।
«जज साहब,» उन्होंने कहा, «ये काग़ज़ मुंशीजी के भाई रामाधार ने बनाया था। वो अखाड़े के पुराने हिसाब का काम देखता था। और मैं अदालत से कहूँगी कि गवाह को बुलाया जाए।»
जज ने आदेश दिया। «रामाधार को तुरंत अदालत में पेश किया जाए।»
सिपाही बाहर गए। हम सब इंतज़ार करने लगे।
दस मिनट बीते। सिपाही लौटा — अकेला। उसने सलाम किया।
«जज साहब, रामाधार जी के घर पर ताला लगा है। पड़ोसी बोलते हैं कि वो सुबह से गायब है। और उनका बेटा कहता है कि वो एक अजनबी के साथ गाड़ी में बैठकर गए।»
मेरे पीछे से सुक्खी बुआ की आवाज़ आई, ऊँची और साफ़, «अरे मैंने तो सुना है कि वो ठाकुर के आदमी के साथ गाड़ी में बैठकर गया!»
मीरा ने सुक्खी बुआ की तरफ़ देखा। «आपने कब सुना?»
«अभी! पिछवाड़े के गलियारे में! जब मैं उस आदमी के पीछे भागी थी। वहाँ एक औरत खड़ी थी — मुंशीजी की बहू। वो अपने ससुर को ढूँढ रही थी, रो रही थी। उसने कहा कि रात को ठाकुर का आदमी उनके घर आया था, कुछ काग़ज़ दिए, और सुबह रामाधार उसी की गाड़ी में बैठकर निकल गए।»
अदालत में सन्नाटा छा गया।
जज साहब ने काग़ज़ पर हाथ रखा और कुछ देर सोचते रहे। फिर उन्होंने कहा, «अदालत इस बात को नोट करती है कि गवाह रामाधार फ़रार है, और उसके फ़रार होने से ये बात साबित होती है कि ये काग़ज़ जाली है।»
उन्होंने हथौड़ा उठाया।
और उसी पल अदालत का दरवाज़ा खुला।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
एक आदमी अंदर आया। कद छोटा, पीठ झुकी हुई, सिर पर गहरा काला कपड़ा लपेटा हुआ। जब उसने कपड़ा उतारा, तो पूरा कमरा साँस लेना भूल गया।
उसका चेहरा जला हुआ था — एक तरफ़ की खाल सिकुड़ी हुई, एक आँख पर झुर्रियों का जाल, और उँगलियाँ आधी — जैसे किसी ने आग से निकालकर फेंक दिया हो। वो धीरे-धीरे चला, एक पैर घसीटता हुआ, और सीधे जज की मेज़ के सामने जाकर खड़ा हो गया।
«मैं मोहन हूँ,» उसने कहा। आवाज़ जली हुई लग रही थी, खुरदरी, जैसे कोयला रगड़ रहा हो, पर साफ़। «और मैं खुद गवाही दूँगा।»
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। कालू काका! मैंने पीछे देखा। वो मेरे पीछे ही बैठे थे, सफ़ेद दाढ़ी में हाथ डाले। उनका चेहरा ऐसा था जैसे उन्होंने भूत देख लिया हो। उनके होठ हिले — कुछ कहना चाहा — पर आवाज़ नहीं निकली।
«तुम कौन हो?» जज ने पूछा।
«मैं वही हूँ,» उसने कहा, «जिसे बीस साल पहले मरा हुआ मान लिया गया था। मैं वही हूँ जिसने इन काग़ज़ों को लिखवाया — नहीं।» उसने रुककर साँस ली। «मुझसे लिखवाया गया। ठाकुर और भैरव के हाथों। और मैं बीस साल से ज़िंदा हूँ, पर मरा हुआ हूँ — क्योंकि जो मैं जानता हूँ, उसे बोलने पर मेरी जान जाती।»
वकील सुधा देवी खड़ी हुईं, «जज साहब, ये आदमी कौन है? इसकी पहचान क्या है?»
«मेरी पहचान,» मोहन ने धीरे से कहा, «ये है कि मैं मुंशीजी का भाई हूँ। रामाधार। और मैंने अपना नाम बदल दिया था, क्योंकि मेरे भाई ने मुझे मरवा दिया था।»
कालू काका तुरंत खड़े हो गए। «नहीं!» उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ फट गई। «तू झूठ बोल रहा है! मैंने तुझे देखा है! तू दयाल है! तू वो ही है जिसने भवानी को ज़हर दिया!»
मोहन ने धीरे-धीरे कालू काका की तरफ़ देखा। और फिर उसने वो किया जो किसी ने उम्मीद नहीं की थी — वो मुस्कुराया। उस जले हुए चेहरे पर मुस्कान भयानक लग रही थी।
«कालू,» उसने कहा। «तूने मुझे तीस साल पहले देखा था, जब मैं जवान था। आज मैं जला हुआ हूँ। पर तेरी आँखें आज भी वही हैं। तूने मुझे पहचाना कैसे?»
«तेरी आवाज़ से,» कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। «तेरी बोली से। बीस साल पहले तू इसी तरह बोलता था, अपनी माँ के सामने भी।»
मोहन ने सिर हिलाया। «और तूने कभी किसी को नहीं बताया कि मैं ज़िंदा हूँ।»
«मैं डरता था!» कालू काका ने कहा, और उनका पूरा शरीर हिल रहा था। «तूने मुझे धमकाया था कि अगर मैंने कुछ कहा तो मेरे बेटे का…»
«मेरे बेटे का क्या?» मोहन ने कहा। «मैंने तुझे क्या कहा था, कालू? बोल।»
कालू काका चुप हो गए। उनकी आँखों में पानी था।
«मैंने तुझे कुछ नहीं कहा था, कालू,» मोहन ने धीरे से कहा। «मैंने तुझे बस ये कहा था कि तू मेरे बारे में किसी से कुछ न कह। क्योंकि अगर तूने कहा, तो ठाकुर को पता चल जाएगा कि मैं ज़िंदा हूँ। और उस दिन मैं सच बोलना चाहता था — अपने वक़्त पर। तूने मुझे सच बोलने से रोका, कालू। तूने मुझे बीस साल तक जला हुआ ज़िंदा रखा।»
कालू काका अपनी जगह पर गिर पड़े। मैं दौड़कर गया। उनके हाथ काँप रहे थे और वो बार-बार कह रहे थे, «मुझे माफ़ कर दे, मुझे माफ़ कर दे।»
मैंने उनका हाथ पकड़ा। «काका, उठो। ये वक़्त नहीं है।»
मोहन ने जज साहब की तरफ़ देखा।
«जज साहब, मैं हर काग़ज़ के बारे में बताना चाहता हूँ। मैंने ये सब अपनी आँखों से देखा है। ठाकुर ने, भैरव ने — जो अब विक्रम है — ने मुझे बीस साल पहले ज़िंदा जलाया था, क्योंकि मैंने उनके सौदे का काग़ज़ लिखने से मना कर दिया था। मैं उस आग से बच निकला। मेरी आधी खाल जल गई, पर मेरी ज़ुबान बच गई। और आज मैं उसी ज़ुबान से बोलूँगा।»
जज ने कुछ देर उसे देखा। फिर बोले, «अदालत गवाही सुनना चाहती है। पर पहले — क्या तुम बता सकते हो कि ये काग़ज़ किसने बनाया?»
«मैंने बनाया,» मोहन ने कहा। «पर लिखवाया ठाकुर ने। और — जज साहब — मैं ये भी बताऊँगा कि वो काग़ज़ अब उसके पास नहीं है। वो मेरे पास है। असली काग़ज़। जिसमें ठाकुर के हस्ताक्षर और भैरव के अंगूठे का निशान है — बीस साल पहले का।»
उसने अपनी झोली में हाथ डाला। मेरा दिल धक-धक कर रहा था। कालू काका मेरे पास बैठे थे, और वो अब भी काँप रहे थे।
«जज साहब,» मोहन ने कहा, «एक बात और। जो डायरी कमला देवी ने पढ़ी — उसके आख़िरी पन्ने पर मेरा नाम था। वो किसी और ने नहीं जोड़ा। मैंने जोड़ा था। मैंने वो डायरी चोरी से भवानी के संदूक से निकाली थी और बाद में लौटा दी, पर उसमें अपना नाम लिख गया — ताकि जिस दिन सच खुले, उस दिन मेरा नाम भी सबके सामने हो।»
«क्यों?» जज ने पूछा।
«क्योंकि, जज साहब, उस दिन जब भवानी ने ज़हर पिया, मैं वहाँ था। मैंने उसे रोका। पर वो नहीं रुका। उसने मुझसे कहा — 'मोहन, तू ज़िंदा रह। तेरे ज़िंदा रहने से ही मेरा बदला पूरा होगा।' और मैं उस दिन से ज़िंदा हूँ। जला हुआ, टूटा हुआ, पर ज़िंदा।»
अदालत में कोई नहीं हिला। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो अपने पिता का हाथ पकड़े खड़ी थी, और उसके चेहरे पर वो भावना थी जो मैंने कभी नहीं देखी — जैसे किसी ने उसके सामने से एक पर्दा हटा दिया हो।
वकील सुधा देवी खड़ी हुईं, पर जज ने उन्हें हाथ से रोक दिया।
«अदालत,» जज़ ने कहा, «इस गवाह को सुरक्षा देती है। और रामाधार उर्फ़ मोहन को पूरी गवाही के लिए तैयार रहने का आदेश देती है।»
उन्होंने हथौड़ा मारा। «केस अगली सुनवाई तक स्थगित।»
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