Spirit of a Fighter – Chapter 1029
«अदालत इस बात को दर्ज करती है,» जज साहब ने धीरे से कहा, «कि गवाह ने अपनी गवाही वापस नहीं ली, बल्कि पूरी की है।»
और तभी ठाकुर के वकील खड़े हुए।
«जज साहब,» उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो हारे हुए आदमी के पास आख़िरी हथियार होती है, «मेरा एक आख़िरी दस्तावेज़ है। ये ज़मीन का बैनामा है। तारीख़ देखिए — ये वही दिन है जब दयाल की मौत हुई थी। और इसमें रणवीर सिंह के हस्ताक्षर हैं, जिनमें उन्होंने खुद ये ज़मीन ठाकुर महेंद्र सिंह को बेची है।»
पूरा कोर्ट सन्न रह गया।
रणवीर सिंह उठे। सिपाही का सहारा नहीं लिया। उन्होंने काग़ज़ की तरफ़ देखा, फिर उस काग़ज़ को हाथ में लिया, और उनके हाथ काँपने लगे — बुढ़ापे से नहीं, गुस्से से।
«ये मेरे हस्ताक्षर नहीं हैं!» वो चिल्लाए, और उनकी आवाज़ अदालत की दीवारों से टकराकर लौटी। «मैंने कोई ज़मीन नहीं बेची! ये हस्ताक्षर जाली हैं!»
उन्होंने काग़ज़ ऊपर उठाया और जज साहब की तरफ़ बढ़ा दिया। उनके हाथ अब भी काँप रहे थे, पर आवाज़ साफ़ थी।
«जज साहब, मेरे बेटे की मौत के दिन मैंने कलम नहीं उठाई थी। मैं उस दिन अपने बेटे का मुँह देख रहा था, जो खून से भरा था। जिसने ये काग़ज़ बनाया है, वो मेरे दुख का इस्तेमाल करके मुझे लुटना चाहता है।»
कमला देवी ने अपनी लाठी फिर ज़मीन पर मारी। और इस बार वो हँसीं — छोटी, खुरदरी हँसी, जैसे सूखी मिट्टी फूट रही हो।
«अब तो वो काटने को भी हाथ नहीं बचा जिससे आईने में अपना चेहरा देख सके,» उन्होंने कहा।
जज साहब ने हथौड़ा उठाया, पर मारने से पहले रुके। उन्होंने उस जाली काग़ज़ को अपने सामने रखा और मुंशी की तरफ़ देखा। «दस्तावेज़ जाँच के लिए भेजा जाए। और ठाकुर महेंद्र सिंह पर जालसाज़ी का नया मुक़दमा दर्ज हो।»
वकील का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने कुछ कहना चाहा, पर जज साहब ने उसे देखा और वो चुप हो गया।
बाहर, अदालत के बरामदे में, सूरज ढल रहा था। वीर बाहर निकला और दीवार से टेक लगाकर खड़ा हो गया। उसके हाथ अब भी काँप रहे थे। मीरा उसके पास आई और बिना कुछ कहे उसके बगल में खड़ी हो गई।
«जिसने भी वो हस्ताक्षर बनाए,» वीर ने धीरे से कहा, «वो अभी भी बाहर है।»
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा। «और वो जानता है कि हम जान गए हैं।
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«और वो जानता है कि हम जान गए हैं।»
मीरा की बात हवा में लटक गई। मैंने अपनी जेब में हाथ डाला — भवानी की डायरी वहीं थी, काग़ज़ की गठरी वहीं थी। पर उँगलियों को सुकून नहीं मिल रहा था।
«मतलब अब वो हमला करेगा,» मैंने कहा। «या फिर कुछ और।»
«या फिर वो हमसे पहले उस आदमी तक पहुँचेगा जो उसके खिलाफ़ गवाही दे सकता है।»
मैं मीरा की तरफ़ मुड़ा। उसके माथे पर पसीना था और आँखों में वो ज़िद थी जो मैंने अदालत के अंदर देखी थी — जज से बहस करती हुई, ठाकुर के वकील को चुप कराती हुई।
«रामाधार,» मैंने कहा। «वो नाम अब दो बार आया है। एक बार तुमने कहा था कि जाली काग़ज़ात वाला गवाह। दूसरी बार मुंशीजी के भाई के तौर पर।»
«और दोनों बार वो गायब।»
हम बरामदे से नीचे उतरे। सीढ़ियों पर मेरी चप्पल की आवाज़ सुनकर सुक्खी बुआ दौड़कर आईं — चमकीली साड़ी में, पान का बीड़ा हाथ में।
«अरे वीर,» उन्होंने हाँफते हुए कहा, «मैं अंदर गई थी तेरे पीछे-पीछे। जब वो वकील बोल रहा था, मैंने देखा — बाहर गलियारे में एक आदमी दबे पाँव निकला। छोटा सा, चश्मा, फ़ाइल दबाए। मैंने पूछा कौन हो, तो वो भाग गया।»
मेरे पेट में एक ठंडी सी लहर दौड़ी।
«किधर गया?»
«पीछे के रास्ते से। जहाँ कचहरी की दीवार खत्म होती है, वहाँ से। और वहाँ एक घोड़ा-गाड़ी खड़ी थी।»
«और तुमने उसे पहचाना नहीं?»
सुक्खी बुआ ने पान चबाया, फिर बोलीं, «अरे पहचाना क्यों नहीं। वो वही है जो अदालत के बाहर तेरे साथ खड़ा था — दयाल। पर उसने कपड़े बदल लिए थे। वो दयाल नहीं था।»
मैं जम गया। «मतलब?»
«मतलब ये कि वो अपनी शक्ल बदलकर घूम रहा है। मैंने उसकी चाल पहचानी। वो दयाल ही था, पर उसने अपनी दाढ़ी उतार दी थी और चश्मा लगा लिया था।»
मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी। «रामाधार दयाल है।»
«या दयाल रामाधार है,» मैंने कहा। «पर जो भी है — वो अभी भागा है, और वो भागा नहीं। वो बुलाया गया है। जज ने उसे बुलाया, और वो भाग गया।»
मीरा ने तुरंत कहा, «इसका मतलब जज को ये बात पहुँचानी होगी। अभी।»
अंदर से हथौड़े की आवाज़ आई दो बार। अदालत फिर बैठी थी।
हम पाँच मिनट बाद ही फिर अंदर थे। जज साहब ने काग़ज़ की तरफ़ देखा और रणवीर सिंह की तरफ़।
«रणवीर सिंह,» जज ने कहा, «ये काग़ज़ तुम्हारे सामने है। इस पर तुम्हारे हस्ताक्षर हैं। क्या तुम इसे मानते हो?»
कमरे में हवा भी रुक गई।
रणवीर सिंह ने एक हाथ से व्हीलचेयर की पकड़ पकड़ी और… खड़े हो गए।
मेरा दिल धक्क से रह गया। सिपाही आगे बढ़ा, पर रणवीर सिंह ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
«मैं अपने पैरों पर खड़ा हूँ,» उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। «मुझे सहारा नहीं चाहिए। बस — अदालत को देखने दो।»
उनके होठ काँप रहे थे। पैर — मैंने देखा — पैर भी हल्के काँप रहे थे। दस साल से ज़्यादा हो गए थे उन्हें इन पैरों पर खड़े हुए। पसीना उनके माथे से नीचे आँखों तक आ रहा था, और वो उसे पोंछने के लिए हाथ नहीं उठा रहे थे। गर्व नहीं थी वो — डर नहीं था — वो बस खड़े थे, दोनों हाथ मेज़ पर टिकाए, और मेज़ उन्हें सहारा दे रही थी।
«मेरे हाथ में आज भी मिट्टी की गंध है,» उन्होंने कहा। उनकी उँगलियाँ मेज़ पर फैली थीं, और उन्होंने उन्हें उठाकर दिखाया — मैली, झुर्रीदार, नाखूनों में काली लकीरें। «ये हाथ काग़ज़ पर कलम नहीं चलाते। ये हाथ मिट्टी में चलते हैं। मैं बीस साल से अपनी मिट्टी में सो रहा हूँ, जज साहब। जिस आदमी ने ये हस्ताक्षर बनाए हैं, वो मेरी मिट्टी को नहीं जानता। वो सिर्फ़ मेरे दुख को जानता है — और मेरे दुख का इस्तेमाल करके मुझे लुटना चाहता है।»
जज साहब कुछ देर उन्हें देखते रहे। फिर हल्के से बोले, «बैठ जाइए, रणवीर सिंह। अदालत ने सुन लिया।»
«नहीं,» रणवीर सिंह ने कहा। आवाज़ में वो ज़िद आ गई जो मैंने पहली बार सुनी थी। «मैं बीस साल से इस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ, जज साहब। मैं खड़ा ही रहूँगा।»
मीरा दौड़कर आगे गई। उसने अपने पिता का हाथ पकड़ लिया — दोनों हाथों से — और उनके बगल में खड़ी हो गई। उसकी आँखों में पानी था, पर वो रोई नहीं। उसने बस उनका हाथ दबाया और सीधी जज साहब की तरफ़ देखने लगी।
«अदालत,» मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में सिर्फ़ तथ्य था, कोई भावना नहीं, «मैं इस काग़ज़ की जाँच करना चाहती हूँ।»
जज ने सिर हिलाया।
मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से एक पुरानी तह की हुई पर्ची निकाली। «ये मेरे पिता के हस्ताक्षर हैं — पुराना काग़ज़, अखाड़े के ज़मीन का, जो मेरे दादा जी ने लिखा था।»
उसने दोनों काग़ज़ मेज़ पर रखे। मैं आगे झुका।
«देखिए,» मीरा ने कहा। «जो हस्ताक्षर असली में है, उसके आख़िर में कलम उठते वक़्त ज़रा सी घुमाव है — 'र' की पूँछ ऊपर की तरफ़ मुड़ी है। और यहाँ, इस नए काग़ज़ में — बिलकुल सीधी लकीर। कोई घुमाव नहीं। स्याही भी नई है। असली काग़ज़ की स्याही हल्की पड़ गई है — बीस साल पुरानी है। इसकी स्याही अभी भी चमक रही है।»
उसने उँगली से इशारा किया। जज साहब ने काग़ज़ उठाकर रोशनी में देखा।
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