Spirit of a Fighter – Chapter 1028
«मैंने भैरव के लिए नहीं,» दयाल ने कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में कुछ आया — शायद गुस्सा, शायद कुछ और, «मैंने ठाकुर के लिए काम किया। भैरव तो बस हाथ था। ठाकुर दिमाग़ था। और मैं… मैं वो आदमी था जो पानी बनाता था। जो ज़हर घोलता था। जो गवाहों को डराता था। बीस साल में मैंने ग्यारह पहलवानों को ज़हर दिया और ग्यारह बार ठाकुर के नाम ज़मीन गई।»
«और तुमने क्यों किया?» जज साहब ने पूछा।
दयाल ने अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला। वो काग़ज़ बहुत पुराना था, चारों तरफ़ से टूटा हुआ। उसने उसे जज साहब की तरफ़ बढ़ाया।
«क्योंकि मेरे पिता इसी अखाड़े के पहलवान थे,» उसने कहा, «और भवानी सिंह ने उन्हें अखाड़े से निकाल दिया था। क्योंकि मेरे पिता भूख से मरे। और मैं बीस साल तक सोचता रहा कि भवानी सिंह का अखाड़ा उजड़े।»
जज साहब ने काग़ज़ देखा। उनकी आँखें सिकुड़ीं।
«ये काग़ज़,» उन्होंने कहा, «इसमें लिखा है कि तुम्हारे पिता को अखाड़े से निकाला गया था — पर ये लिखाई भवानी सिंह की नहीं है। ये लिखाई…»
«किसकी है?» सुधा देवी ने पूछा।
«ये लिखाई,» जज साहब ने कहा, और उन्होंने काग़ज़ को रोशनी में उठाया, «ये लिखाई ठाकुर महेंद्र सिंह की है।»
कमरे में हवा रुक गई।
दयाल पलटा। उसने ठाकुर की तरफ़ देखा। और उसकी आँखों में पहली बार कुछ ऐसा आया जो दूध की बूँद से छुपा हुआ था — पहचान का झटका।
«तुमने…» उसने धीरे से कहा, «तुमने वो काग़ज़ खुद लिखा था? तुमने मुझे बीस साल झूठ बोला?»
ठाकुर नहीं हिले। उन्होंने अपनी मूँछों पर हाथ फेरा और कहा, «मैं कुछ नहीं जानता।»
«तुमने मेरे पिता को अखाड़े से निकलवाया,» दयाल ने कहा, और उसकी आवाज़ धीरे-धीरे ऊँची होने लगी, «तुमने मुझे भवानी का दुश्मन बनाया। तुमने मुझे बीस साल तक अपनी गोली बनाकर रखा। और अब… अब तुम मुझे मिटाना चाहते हो?»
«मैं कुछ नहीं जानता,» ठाकुर ने दोहराया, और उनकी आवाज़ में पहली बार एक झुर्री आई।
दयाल ने अपनी जेब से एक और काग़ज़ निकाला। इस बार वो काग़ज़ नया था, साफ़, स्याही चमकदार। उसने उसे हवा में उठाया।
«ये वो हुक्मनामा है जो कल रात मुझे मिला। ठाकुर के आदमी ने दिया। इसमें लिखा है — 'दयाल को रास्ते से हटा दो। जो जानता है, वो नहीं बचेगा।' और नीचे ठाकुर का असली हस्ताक्षर है।»
«झूठ!» ठाकुर चिल्लाए, और इस बार उनकी आवाज़ में गरज नहीं थी, दरार थी। «ये सब साज़िश है! ये मुझे फँसाने की चाल है!»
«जज साहब,» सुधा देवी ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो जीत की होती है, «मेरा निवेदन है कि ये सारे काग़ज़ ज़ब्त किए जाएँ और हस्ताक्षर की जाँच हो। और मेरा निवेदन है कि ठाकुर महेंद्र सिंह को हिरासत में लिया जाए।»
जज साहब ने हथौड़ा मारा। «ठाकुर महेंद्र सिंह को हिरासत में लिया जाए।»
सिपाही आगे बढ़े। ठाकुर उठे — धीरे-धीरे, भारी शरीर के साथ, जैसे कोई पुराना दरवाज़ा खुल रहा हो। उन्होंने अपने वकील को कोई इशारा नहीं किया। उन्होंने दयाल को नहीं देखा। उन्होंने सिर्फ़ एक बार मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी — हार नहीं, बल्कि कुछ और। जैसे कोई आदमी अपने ही बिछाए जाल में फँस गया हो और अब उसे काटने की ताकत न हो।
वो जाते-जाते रुके। उन्होंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा।
«रणवीर,» उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि सिर्फ़ आस-पास वाले सुन सके, «मैंने तो तुम्हें छोड़ दिया था।»
रणवीर सिंह उठे। सिपाही का सहारा उन्होंने छोड़ दिया। वो अपने पैरों पर खड़े हुए — काँपते हुए, पर खड़े। उन्होंने ठाकुर की तरफ़ देखा और धीरे से कहा, «तुमने मुझे नहीं छोड़ा था। तुमने मुझे मारना चाहा था, पर मेरी मिट्टी ने मुझे बचा लिया।» उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। «और आज वही मिट्टी तुम्हें पकड़ रही है।»
ठाकुर को सिपाही ले गए। दरवाज़े की तरफ़ जाते वक़्त उनका कंधा दीवार से टकराया, और उनका चंदन का टीका माथे से फिसलकर ज़मीन पर गिर गया। कोई उसे उठाने नहीं गया।
कमला देवी ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनके होंठ हिले — मुस्कुराए नहीं, बस हिले। पर उनकी आँखों में पानी था, और वो पानी अब रुक नहीं रहा था। वो बैठ गईं, और मैंने देखा कि उनके घुटने काँप रहे थे। उनके बूढ़े हाथों ने लाठी को इतनी ज़ोर से पकड़ा था कि नाखून सफ़ेद हो गए थे।
मैं दौड़कर उनके पास गया। मैंने उनका हाथ पकड़ा और वो मेरी तरफ़ झुकीं। उनका सिर मेरे कंधे पर आ गया, और उनका शरीर हल्का था — इतना हल्का जैसे अंदर से खाली हो गया हो।
«मैंने कर दिया,» उन्होंने फुसफुसाया। «मैंने बीस साल बाद बोल दिया।»
«आपने कर दिया,» मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भी काँप रही थी।
और तभी मीरा मेरे पास आई। उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा, और मैंने महसूस किया कि उसकी उँगलियाँ भी काँप रही थीं।
हम तीनों वहीं खड़े रहे — अदालत के बीच में, बेंच और कटघरे के बीच, जहाँ हवा में अभी भी चंदन और पुरानी स्याही की गंध थी।
«वीर सिंह,» जज साहब ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो गंभीरता थी जो फैसले से पहले आती है, «आपने अदालत को बहुत कुछ दिया है। पर एक बात अभी भी साफ़ नहीं है।»
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
«वो काग़ज़,» उन्होंने कहा, «जो आपकी धोती की जेब में मिला था — 'तेरी माँ झूठ बोल रही है।' आपने कहा कि वो उसी हाथ से लिखा है जिसने ये झूठे काग़ज़ लिखे। पर ये काग़ज़ ठाकुर के आदमी ने लिखा, और वो आदमी अब पकड़ा जा चुका है। तो माँ के बारे में वो काग़ज़ किसने लिखा?»
कमरा फिर चुप हो गया।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो अभी भी अपने मुँह को हाथों से ढके बैठी थीं। पर जब मैंने उन्हें देखा, तो उन्होंने अपने हाथ नीचे किए। उनकी आँखें लाल थीं, पर सूखी। और उनके होंठ हिले।
वो उठीं। धीरे-धीरे, कुर्सी की पीठ पकड़कर। पूरा कोर्ट उनकी तरफ़ देख रहा था — वकील, मुंशी, पीछे बैठे वो लोग जो रोज़ आते थे मुक़दमे सुनने। माँ ने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, जैसे कोई अखाड़े में उतरने से पहले अपनी कमर कसता हो।
«वो काग़ज़ मैंने नहीं लिखा,» उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। «पर वो बात सच है जो उसमें लिखी थी। मैंने तुमसे झूठ बोला था, बेटा। बीस साल पहले।»
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
«तेरे पिता की मौत के बाद,» माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो काँप था जो अब तक छिपा हुआ था, «ठाकुर मेरे पास आया था। रात को। अकेला। उसने कहा — तेरे तीन बेटे हैं। बड़ा पढ़ रहा है, छोटे दो अभी बच्चे हैं। अगर तूने किसी को कुछ बताया, तो तीनों का वही हाल होगा जो दयाल का हुआ।»
कमला देवी ने लाठी ज़ोर से फर्श पर मारी। एक आवाज़, जैसे तड़कती लकड़ी।
«इसलिए मैंने आँखें मूँद लीं,» माँ ने कहा। «मैंने अपने ही बेटे से कहा कि तेरे पिता दुर्घटना में मरे। मैंने हर रात अपने पति को ज़मीन में हिलते देखा और कुछ नहीं कहा। ताकि तुम तीनों ज़िंदा रहो।»
वीर ने अपना सिर नीचे कर लिया। उसके कंधे हिल रहे थे। मीरा ने उसका हाथ दबाया, और इस बार उसने भी उसका हाथ छोड़ा नहीं।
«माँ,» वीर ने फुसफुसाया। बस इतना। और माँ ने उसकी तरफ़ देखा — पहली बार सीधे, बिना किसी डर के।
«अब कोई धमकी नहीं,» उन्होंने कहा। «अब सब बोलेंगे।»
जज साहब ने कुछ देर माँ को देखा। फिर उन्होंने काग़ज़ की तरफ़ देखा, फिर अपने मुंशी की तरफ़। कमरे में कोई हिलता नहीं था।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno