Spirit of a Fighter – Chapter 1027
उसने एक फ़ाइल खोली। उसका पहला पन्ना उसने जज साहब की तरफ़ बढ़ाया।
«ये साल उन्नीस सौ चौरानवे का हिसाब है। पहलवान रामदीन की मौत — अखाड़े के नाम चार बीघा ज़मीन ठाकुर के नाम। ये रसीद है।» उसने दूसरा पन्ना निकाला। «साल उन्नीस सौ सत्तानवे। पहलवान जगत सिंह की मौत — छह बीघा। साल दो हज़ार एक। पहलवान शेरू की मौत — तीन बीघा। साल दो हज़ार चार। पहलवान करमू — पाँच बीघा।» उसने फ़ाइल बंद की और उसे मेज़ पर रख दिया। «बीस साल में ग्यारह पहलवान मरे। हर मौत के बदले ठाकुर के नाम ज़मीन गई। और हर काग़ज़ पर दो हस्ताक्षर हैं — एक ठाकुर का, और दूसरा…»
वो रुका। उसने मेरी तरफ़ देखा।
«दूसरा भैरव सिंह का। जिसका असली नाम विक्रम है।»
ठाकुर का वकील उठा, पर जज साहब ने हथौड़ा मारा। «बैठिए। अभी आपकी बारी नहीं आई।»
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मेरे बगल में बैठी थी, और उसका हाथ मेरे हाथ पर था। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उसकी आँखें कमला देवी पर थीं, और उसके होंठ हिल रहे थे — जैसे वो कुछ गिन रही हो। शायद वो ग्यारह नाम गिन रही थी।
और तभी मुझे कुछ महसूस हुआ। मेरे हाथ पर उसका दबाव बढ़ा। मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखों में वो बात थी जो शब्दों में नहीं आती — «अब तेरी बारी।»
मैं उठा।
«जज साहब,» मैंने कहा, और मेरी आवाज़ पहले तो फँसी, फिर खुल गई, «मुझे कुछ कहना है।»
«आप कौन हैं?»
«वीर सिंह। भवानी सिंह का बेटा।»
कमरे में हलचल हुई। किसी ने कहा, «ये वही है जो अखाड़े में घुसा था।» किसी ने कहा, «मज़दूर है।» पर जज साहब ने सबको चुप कराया और मुझे बोलने दिया।
«मैंने वो पानी सूँघा है,» मैंने कहा। «तीन शीशियों में। एक खाली थी, दो भरी हुईं। उनमें कुछ मिला है — वो कुछ जो ताकत देता है, पर शरीर के अंदर की उम्र खा जाता है। मैं बता नहीं सकता कि क्या है, क्योंकि मैं वैद्य नहीं हूँ। पर मैं इतना बता सकता हूँ कि जिस पहलवान ने वो पानी पिया, उसके पसीने की गंध बदल गई। वो कड़वी हो गई। और मैंने उस गंध को ग्यारह लोगों में पहचाना। ग्यारह।»
मैंने रुककर साँस ली। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर मैंने उन्हें मुट्ठी में दबा लिया।
«और एक बात और है,» मैंने कहा, «जो मैं अभी तक किसी को नहीं बता सका। वो काग़ज़ जो ठाकुर के वकील ने अभी निकाला — उस पर भवानी सिंह के हस्ताक्षर नहीं हैं। वो किसी और के हाथ के हैं। मैंने उस स्याही को सूँघा है। उसमें वही गंध है जो उस काग़ज़ में थी जो मुझे अपनी धोती की जेब में मिला था — 'तेरी माँ झूठ बोल रही है।' दोनों एक ही हाथ से लिखे गए हैं। और वो हाथ भवानी सिंह का नहीं है।»
«किसका है?» जज साहब ने पूछा।
«मैं नहीं जानता,» मैंने कहा। «पर मैं जानता हूँ कि वो हाथ किसने चलाया।»
मैंने ठाकुर की तरफ़ देखा। वो अपने वकील के पीछे बैठे थे, सफ़ेद कुर्ते में, माथे पर चंदन का टीका, और उनकी आँखों में वो ठंडक थी जो कुएँ के पानी में होती है। वो मुस्कुराए नहीं। वो हिले नहीं। पर जब मैंने उनकी तरफ़ देखा, तो उनके हाथ की उँगली, जो कुर्सी की हत्थी पर थी, एक बार हिली। बस एक बार।
«जज साहब,» ठाकुर का वकील खड़ा हुआ, और उसकी आवाज़ में अब वो मिठास नहीं थी, «मेरा मुवक्किल इन सब बातों से इनकार नहीं करता, पर इनका कोई सबूत नहीं है। एक मज़दूर की नाक, एक बूढ़ी औरत की याददाश्त, और एक ठेकेदार की फ़ाइलें — ये अदालत में सबूत नहीं हैं।»
«सबूत?» सुधा देवी ने कहा, और वो उठीं, «सबूत चाहिए तो ये लीजिए।»
उन्होंने अपने बैग से एक लिफ़ाफ़ा निकाला। वो लिफ़ाफ़ा पुराना था, कोना फटा हुआ, ऊपर डाक का टिकट। उन्होंने जज साहब की तरफ़ बढ़ाया।
«ये लिफ़ाफ़ा मुझे कल रात मिला। किसी ने मेरे घर के दरवाज़े के नीचे से सरका दिया। इसमें एक काग़ज़ है और एक चिट्ठी।»
«किसने भेजा?»
«चिट्ठी पर नाम नहीं है। पर काग़ज़ पर ठाकुर महेंद्र सिंह के हस्ताक्षर हैं — असली वाले। और चिट्ठी में लिखा है — 'ये वो काग़ज़ हैं जो ठाकुर ने भैरव को दिए थे। इनमें हर मौत का हिसाब है। मैंने इन्हें बीस साल संभालकर रखा। अब मेरी जान का ख़तरा है, इसलिए भेज रहा हूँ।'»
कमरे में ऐसी चुप्पी छाई कि मैंने अपनी साँस सुनी। जज साहब ने लिफ़ाफ़ा खोला। काग़ज़ निकाले। उन्होंने एक पन्ना पढ़ा, दूसरा पढ़ा, और फिर उन्होंने चश्मा उतार दिया और अपनी आँखें मलीं।
«ये काग़ज़,» उन्होंने धीरे से कहा, «इनमें ज़मीन के सौदे हैं। ग्यारह मौतें। ग्यारह हस्ताक्षर। और नीचे लिखा है — 'मोहन के हाथ से।'»
«मोहन?» ठाकुर का वकील हँसा। «कौन मोहन? कोई काल्पनिक नाम है।»
«मोहन,» कमला देवी ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो अब तक नहीं थी, «मेरे भाई का सबसे पुराना दोस्त। जो बीस साल पहले गाँव से गायब हो गया। जिसने मेरे भाई को ज़हर दिया। और जो आज इस अदालत में बैठा है।»
वो पलटीं। उनकी उँगली उठी, और वो उँगली ठाकुर की तरफ़ नहीं, बल्कि उनके पीछे बैठे एक आदमी की तरफ़ गई — एक छोटा सा आदमी, सफ़ेद कुर्ते में, सफ़ेद टोपी में, जिसकी दाढ़ी कटी हुई थी, जो अब तक कोने में बैठा था और जिसे किसी ने नहीं देखा था।
वो आदमी उठा। उसने अपनी टोपी उतारी। उसके बाल सफ़ेद थे, और उसकी एक आँख में — बाईं आँख में — दूध की बूँद जैसा सफ़ेद निशान था।
कालू काका ने अपनी कुर्सी पकड़ ली। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
«दयाल,» कालू काका ने फुसफुसाया। «दयाल।»
वो आदमी — दयाल — मुस्कुराया। और वो मुस्कान ऐसी थी जैसे कुएँ में कोई पत्थर फेंका जाए।
«मैं मोहन हूँ,» उसने कहा, और उसकी आवाज़ सूखी थी, जैसे पुरानी लकड़ी चटके, «और मैंने बीस साल तक इन काग़ज़ों को संभाला। पर आज मैंने इन्हें भेज दिया, क्योंकि अब मेरी जान का ख़तरा है। क्योंकि जिस आदमी के लिए मैंने ये सब किया, वो मुझे मिटाने पर तुला है।»
«झूठ!» ठाकुर पहली बार बोले। उनकी आवाज़ अदालत में गूँजी, और उसमें वो गरज थी जो सिर्फ़ उस आदमी में होती है जिसने बीस साल तक सबको हुक्म दिया हो। «ये आदमी पागल है! मैं इसे नहीं जानता!»
«आप मुझे नहीं जानते?» दयाल ने कहा, और वो कटघरे की तरफ़ बढ़ा। «जब आपने भवानी को ज़हर देने के लिए मुझे बुलाया था, तब जानते थे। जब आपने रणवीर सिंह के पैरों की हड्डी कुचलने के लिए मुझे पचास हज़ार दिए थे, तब जानते थे। जब आपने कहा था कि अगर भवानी का बेटा ज़िंदा रहा तो हम सब जेल में मरेंगे — तब जानते थे।»
अदालत में सन्नाटा छा गया। माँ के हाथ से मेरा हाथ छूट गया और उन्होंने अपना मुँह दोनों हाथों से ढक लिया।
«आपने मेरे पिता के पैर…» मैंने धीरे से कहा, और मेरी आवाज़ मेरी अपनी नहीं लगी, «आपने मेरे पिता के पैर कुचलवाए?»
दयाल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी एक आँख साफ़ थी, दूसरी पर दूध की बूँद। और उस साफ़ आँख में कुछ नहीं था — न पछतावा, न डर। बस वो ठंडक जो पुराने खातों में होती है।
«मैंने तुम्हारे पिता के पैर नहीं कुचले,» उसने कहा। «मैंने बस वो पानी दिया। छोटी खुराक में। वो पानी जिसने उनके पैरों की हड्डी को अंदर से खोखला कर दिया। वो पानी जो भैरव हर पहलवान को देता था।»
«तो तुमने भैरव के लिए काम किया?»
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