Spirit of a Fighter – Chapter 1026
«रणवीर सिंह जी,» उन्होंने कहा, और आवाज़ में गुड़ जैसी मिठास घोली, «हस्ताक्षर आपके ही हैं। मैं समझता हूँ, ऐसे वक़्त पर याद न आना बहाना है। पर काग़ज़ तो काग़ज़ है, है ना?»
वो काग़ज़ उसने मेज़ पर रखा। दो पन्ने, पीले पड़े, कोने मुड़े हुए, नीली स्याही में लिखे। मैं उस मेज़ से दूर था — गवाह के लिए बने बेंच पर, माँ के बगल में — पर मेरी नाक को दूर का हिसाब नहीं आता। मुझे उस काग़ज़ से एक गंध आई। सीलन की। पुरानी अलमारी में बंद काग़ज़ की। और उसके पीछे, बहुत हल्की, चंदन की।
वही चंदन जो ठाकुर महेंद्र सिंह के माथे पर लगा था, जब उन्होंने मुझे बगिया की हवेली में बुलाया था।
«जज साहब,» वकील सुधा देवी खड़ी हुईं। उनकी आवाज़ सुबह की तरह साफ़ थी। «मेरा निवेदन है कि वो काग़ज़ मुझे दिखाया जाए। और मेरा मुवक्किल उसे अपने हाथ में लेकर देख सके।»
«ये क्या नाटक है?» ठाकुर का वकील हँसा। «अदालत में हस्ताक्षर की जाँच होती है, सूंघने की नहीं।»
पर जज साहब ने चश्मा ठीक किया और कहा, «काग़ज़ दे दीजिए।»
मैं उठा। मेरी धोती की जेब में भवानी सिंह का काग़ज़ था, और उसका कोना मेरी जाँघ से चुभ रहा था। मैंने उस मेज़ तक चलकर वो काग़ज़ उठाया। कमरा चुप हो गया। पीछे बैठी भीड़ में कोई खाँसा, किसी ने पंखा झलना बंद कर दिया। मैंने काग़ज़ को अपनी नाक के पास लाया।
सीलन। पुरानी अलमारी। और फिर — चंदन। मैंने आँखें बंद कर लीं।
«ये काग़ज़ ठाकुर महेंद्र सिंह की अलमारी में रखा रहा है,» मैंने कहा। «मेरे पास कोई सबूत नहीं है, पर मेरी नाक कभी झूठ नहीं बोलती। इसमें उनके माथे के चंदन की गंध है। और सीलन इतनी गहरी है कि ये उसी कमरे से आया है जहाँ उन्होंने मुझे बुलाया था।»
«बकवास,» ठाकुर का वकील बोला। «ये अदालत है, कोई हवेली नहीं जहाँ नाक से इंसाफ़ होता है।»
«तो फिर हस्ताक्षर की जाँच हो जाए,» सुधा देवी ने कहा। «और मैं ये भी चाहूँगी कि जज साहब उस काग़ज़ के नीचे लगी तारीख़ देखें।»
जज साहब ने काग़ज़ पलटा। उनकी उँगली नीचे सरकी और रुक गई।
«तारीख़,» उन्होंने धीरे से पढ़ी, «बारह अगस्त।»
«जी,» सुधा देवी ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा आया जो जीत की तरफ़ जाता था, «और रणवीर सिंह के पैर उस साल जून की सत्ताईस तारीख़ से पहले ही सून्न हो गए थे। जून में वो अखाड़े में आख़िरी बार खड़े हुए थे — पूरा गाँव गवाह है। तो बारह अगस्त को उन्होंने काग़ज़ पर हस्ताक्षर कैसे किए? कलम पकड़ने के लिए उठना पड़ता है, जज साहब। उठना।»
अदालत में हलचल मच गई। कोई हँसा, कोई बोला, पर मैंने सुना — रणवीर सिंह की साँस। फूलती हुई, रुकती हुई। वो उस सिपाही के कंधे पर झुके और उन्होंने इतनी धीरे से कहा कि सिर्फ़ मैं सुन सका, «बेटा, ये अब मेरे नाम की लड़ाई नहीं रही। ये भवानी की लड़ाई है।»
और तभी, बेंच के पीछे से, किसी ने खड़े होकर आवाज़ दी।
«जज साहब, मुझे गवाही देनी है।»
सब पलटे। कमला देवी खड़ी थीं — उनकी सफ़ेद साड़ी में, बालों में सफ़ेदी, हाथ में लाठी। वो लाठी किसी बूढ़ी औरत की लाठी नहीं थी। वो उस आदमी की लाठी थी जिसने उम्र के पचास साल अखाड़े की मिट्टी में काटे हैं। उनके कंधे झुके हुए थे, पर उनकी गर्दन सीधी थी।
«आप कौन हैं?» जज साहब ने पूछा।
«कमला देवी। भवानी सिंह की बहन। और ये अखाड़े की पहली औरत पहलवान, जिसे लोग भूल गए।»
ठाकुर का वकील तुरंत उठा। «जज साहब, ये महिला पहले ही झूठी गवाह साबित हो चुकी है। इनकी याददाश्त—»
«मेरी याददाश्त ठीक है,» कमला देवी ने कहा, और उन्होंने लाठी ज़ोर से फर्श पर मारी। आवाज़ ऐसी गूँजी कि जज साहब की मेज़ पर रखी कलम हिल गई। «और मैं बूढ़ी नहीं हूँ। मैं पहलवान हूँ। और पहलवान झूठ नहीं बोलता।»
कमरे में पहले सन्नाटा आया, फिर हँसी। पीछे बैठी सुक्खी बुआ की आवाज़ सबसे ऊँची थी — «अरे वाह, बुढ़िया को देखो!» — और उसके साथ पूरा रामपुर हँसा। जज साहब ने हथौड़ा मारा, पर उनके होंठों पर भी एक हल्की सी मुस्कान आ गई थी, जो उन्होंने तुरंत छुपाई।
«गवाह के कटघरे में आइए,» उन्होंने कहा।
कमला देवी लाठी टेकती हुई आगे बढ़ीं। रास्ते में उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनका हाथ हल्का था, पर उसमें वो वज़न था जो बीस साल की चुप्पी का होता है।
«डर मत,» उन्होंने फुसफुसाया। «आज मिट्टी बोलेगी।»
वो कटघरे में खड़ी हुईं। सुधा देवी ने उनके सामने काग़ज़ों का बंडल रखा।
«कमला देवी,» सुधा देवी ने कहा, «आपने कल मुझे एक डायरी दी थी। बताइए, वो किसकी है?»
«मेरे भाई भवानी सिंह की।»
«और उसमें क्या लिखा है?»
कमला देवी ने काग़ज़ उठाया। उनके हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ नहीं। उन्होंने पढ़ना शुरू किया।
«आज फिर मोहन आया। कहता है अखाड़े की ज़मीन के काग़ज़ ठाकुर के नाम लिख दो, तो तेरे बेटे को अखाड़े का मालिक बना देंगे। मैंने मना किया। उसने कहा, भवानी, तू पत्थर की लाठी है, पर पत्थर भी टूटता है।»
अदालत में कोई हिला नहीं। कमला देवी ने पन्ना पलटा।
«अगला पन्ना। आज ठाकुर ने बुलाया। कहा, भवानी, तू मेरे अखाड़े का नाम है। तेरे नाम से लड़के आते हैं। पर अब बुढ़ापा आ गया। तू मिट्टी में नहीं उतरता। मैंने कहा, मैं तब तक उतरूँगा जब तक मेरी साँस है। उसने हँसकर कहा, तो फिर तेरी साँस का इंतज़ाम करना पड़ेगा।»
मेरी माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत।
«और आख़िरी पन्ना,» कमला देवी ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार टूटी, «जो मैंने तीन दिन पहले लिखा। भाई, तू जानता है कि तेरा दिन आ गया है। मैं जानता हूँ कि पानी में क्या घोला जाता है। मैंने उसे पीने से मना किया, पर तू कहता है कि अगर मैं नहीं पीऊँगा तो वो किसी और को पिलाएगा। तो मैं पीऊँगा। पर एक बात याद रखना — मेरे बाद इस अखाड़े में कोई और नहीं मरेगा। मैं वो काग़ज़ लिखकर रख रहा हूँ जो सब खोल देगा।»
कमला देवी ने काग़ज़ बंद किया। उन्होंने जज साहब की तरफ़ देखा।
«मेरे भाई ने अपनी जान इसलिए दी,» उन्होंने कहा, और अब उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो सिर्फ़ उस औरत की होती है जिसने अपने भाई की लाश उठाई हो, «ताकि ये अखाड़ा ज़िंदा रहे। और तुम लोग उसे बेचने पर तुले हो। तुम्हारे ठाकुर ने उसकी मौत के बदले ज़मीन ली। तुम्हारे ठाकुर ने उसकी हड्डियाँ तक बेच दीं।»
«आपत्ति!» ठाकुर का वकील चिल्लाया। «ये अदालत है, श्मशान नहीं!»
«आपत्ति मंज़ूर,» जज साहब ने कहा। «गवाह, आप सिर्फ़ तथ्य बताइए।»
«तथ्य यही है,» कमला देवी ने कहा, और उन्होंने अपनी लाठी उठाई, «कि ये लाठी मेरे भाई की है। और जब भी कोई इस अखाड़े को बेचने की बात करता है, ये लाठी बोलती है। जज साहब, मैंने ये लाठी उस रात उठाई थी जब मेरे भाई की लाश आँगन में पड़ी थी। और आज मैं इसे यहाँ लेकर आई हूँ। अब आप बताइए — क्या ये लाठी झूठ बोलती है?»
अदालत में सन्नाटा छा गया। वो सन्नाटा जो हँसी के बाद आता है।
और फिर हरनाम उठा।
वो अपनी कुर्सी से उठा, अपनी फ़ाइलें उठाईं, और कटघरे तक आया। उसके चश्मे का शीशा दीवार की रोशनी में चमका। उसके हाथ काँप रहे थे, पर वो रुका नहीं।
«जज साहब,» उसने कहा, «मैं अखाड़े का हिसाब रखता हूँ। बीस साल से। मैंने ये काग़ज़ नहीं बनाए, पर मैंने इन्हें छुपाया। मेरा बेटा गोलू उनके कब्ज़े में था। अब वो सुरक्षित है, मेरे गाँव में। तो अब मैं बोलूँगा।»
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