Spirit of a Fighter – Chapter 1024
कमला देवी ने पढ़ा, और उनकी आवाज़ में वो कंपन था जो अब तक नहीं था —
"कमला दीदी, आप भवानी की डायरी पढ़ रही हैं। अच्छा किया। पर एक बात याद रखिए — जो सच आप आज बोलेंगी, कल आपकी बहन का बेटा उसके लिए ज़िम्मेदार होगा। मैं बीस साल से इंतज़ार कर रहा हूँ। मुझे जल्दी नहीं है। आपको हो, तो बोलिए। — मोहन"
आँगन में जो सन्नाटा आया, वो बोलता हुआ सन्नाटा था। सुक्खी बुआ ने अपना पान का बीड़ा ज़मीन पर गिरा दिया और उसे उठाना भी नहीं याद रहा।
मीरा ने पहली बार कुछ ऐसा कहा जो मैंने उससे नहीं सुना था। उसकी आवाज़ में डर था, साफ़ डर।
"तो वो जानता है," वो बोली। "वो जानता है कि डायरी कहाँ है। वो जानता है कि हम क्या कर रहे हैं। वो हमें देख रहा है।"
"वो हमेशा से देख रहा है," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो थकान थी जो तीस साल के डर से आती है। "उसने मुझे देखना नहीं छोड़ा। बीस साल मैं जब भी अखाड़े की मिट्टी सींचता, मुझे लगता कि कोई दीवार के पीछे से देख रहा है। और अब पता चला — वो देख ही रहा था।"
मैंने अपनी जेब से वो जला पन्ना निकाला और उसे डायरी के आख़िरी पन्ने के साथ रख दिया। दोनों में एक ही स्याही थी — भवानी की स्याही, टेढ़ी-मेढ़ी, जल्दी में लिखी। मैंने उन दोनों को मिलाकर देखा और मुझे लगा जैसे मेरे पापा मेरे सामने बैठे हों, और मुझे कुछ बता रहे हों।
"एक बात समझ नहीं आ रही," मैंने कहा, और मैंने अपनी आवाज़ जितनी ठंडी रख सकी, रखी। "अगर मोहन ही सब कुछ चला रहा है, तो भैरव और ठाकुर क्या हैं? कठपुतली? या वो भी मोहन के डर में हैं?"
कमला देवी ने धीरे से सिर हिलाया। "यही सबसे बड़ा सवाल है। और इसका जवाब सिर्फ़ एक आदमी जानता है।"
"कौन?" मैंने पूछा।
"हरनाम।" उन्होंने कहा। "वो ठेकेदार जिसका बेटा गोलू भैरव के कब्ज़े में था। हरनाम बीस साल से अखाड़े का हिसाब रखता है। हर पैसे का हिसाब। हर शीशी का हिसाब। उसे मोहन से पैसे मिलते हैं। और हरनाम… हरनाम मोहन से डरता है। इसीलिए वो कभी सीधे नहीं बोलता। हर बात घुमाकर कहता है।"
टिंकू ने अपनी टोपी खींचकर आँखों पर डाल ली, जैसे वो सुनना ही नहीं चाहता। "भाई," वो बोला, "मैं तो अब तक सोच रहा था कि सबसे बड़ा विलेन भैरव है। अब पता चला — भैरव भी किसी के नीचे है? ये तो बिल्कुल ऐसा है जैसे मैंने सोचा कि मेरी दुकान का सबसे बड़ा बॉस मैं हूँ, और फिर पता चले कि माँ मेरी दुकान चला रही है!"
सुक्खी बुआ ने उसे घूरा। "तू चुप कर, टिंकू। तेरी माँ तो तेरे लड्डू भी नहीं खाती, कहती है ज़्यादा मीठे हैं!"
"तो इसका मतलब मैं अकेला सबसे ज़्यादा मीठा बनाता हूँ!" टिंकू ने गर्व से कहा।
"इसका मतलब तेरे लड्डू बिकते नहीं!" मीरा ने चुटकी ली, और उसकी आँखों में पहली बार उस दिन की हल्की हँसी आई।
आँगन में एक बार फिर हँसी फूटी, पर इस बार हल्की, थोड़ी देर की। क्योंकि सबको पता था — जो सामने खड़ा था, वो हँसी से नहीं टलने वाला था।
हँसी जब थमी तो मैंने अपनी आवाज़ उठाई।
"कल पंचायत में," मैंने कहा, "मैं ये डायरी, ये जला पन्ना, और कालू काका की गवाही सबके सामने रखूँगा। हरनाम को बुलाकर उसके सामने सीधा सवाल पूछूँगा — मोहन कौन है और कहाँ है। अगर वो बोलता है, तो सच खुलेगा। अगर नहीं बोलता, तो उसका चुप रहना ही सबसे बड़ा सबूत होगा।"
"और अगर मोहन कल पंचायत में आया तो?" मीरा ने पूछा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा सख़्त था, पर उसकी आँखों में वो चिंता थी जो सिर्फ़ अपने लिए होती है।
"तो जो होगा," मैंने कहा, "वो आज नहीं तो कल होगा। और मैं थका हुआ हूँ, मीरा। थका हुआ। मुझे डर से नहीं लड़ना। मुझे सच से लड़ना है।"
वो कुछ कहने को हुई, पर तभी आँगन के फाटक पर आवाज़ आई। किसी ने लोहे की कुंडी खटखटाई — तीन बार, जल्दी-जल्दी, जैसे कोई भागता हुआ आया हो।
सबकी नज़र फाटक पर गई।
एक सिपाही खड़ा था। वर्दी पसीने से भीगी थी, साँस फूल रही थी, जैसे वो दौड़कर आया हो। उसके हाथ में एक मुड़ा हुआ काग़ज़ था जिस पर सरकारी मुहर लगी थी।
"वीर सिंह कौन है?" उसने आँगन में देखते हुए पूछा।
"मैं," मैंने कहा, और खड़ा हो गया।
सिपाही ने काग़ज़ खोला और पढ़ने लगा, पर पढ़ने से पहले उसने एक बार गहरी साँस ली, जैसे वो खुद नहीं चाहता था कि ये खबर दे।
"ठाकुर महेंद्र सिंह ने जमानत के लिए अर्जी डाली है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो सिर्फ़ सरकारी काग़ज़ात लाते हैं। "और उसके वकील ने हाई कोर्ट में ये दावा किया है कि कमला देवी झूठी गवाह है। कहा है कि वो भवानी की बहन नहीं — बस एक नौकरानी थी जो अब पैसे के लिए कहानी बना रही है।"
कमला देवी की उँगलियाँ डायरी पर जम गईं। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया, और उनकी आँखों में वो चीज़ आई जो मैंने बीस साल के दबे हुए सच में देखी थी — अपमान। वो अपमान जो सिर्फ़ उन लोगों को मिलता है जो सच बोलते हैं और उनका सच झुठलाया जाता है।
"नौकरानी?" कमला देवी ने धीरे से दोहराया, और उनकी आवाज़ टूट गई। "मैं… मैं भवानी की बहन हूँ। मैंने तीस साल इस घर से दूर रहकर अपनी बहन के बेटे को बचाया है। और वो कहते हैं कि मैं नौकरानी हूँ?"
मैंने उस सिपाही की तरफ़ देखा। उसने अपनी नज़रें नीची कर लीं। वो भी इस खबर को लाने के लिए मजबूर था।
"और एक बात," सिपाही ने धीरे से कहा, जैसे वो सबसे बड़ी बात बचा रहा हो। "ठाकुर के वकील ने ये भी कहा है कि जो भी आदमी कमला देवी के पक्ष में गवाही देगा, उसके खिलाफ़ भी केस चलेगा। और ये काग़ज़…" उसने मुड़ा हुआ काग़ज़ ऊपर उठाया, "…ये कल सुबह नौ बजे अदालत में पेश होगा।"
मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी फिर खिसकी। मैंने कमला देवी की तरफ़ देखा — वो अपनी डायरी से चिपकी बैठी थीं, जैसे वोी उनकी आख़िरी पूँजी हो। मैंने माँ की तरफ़ देखा — उसके होंठ सिले हुए थे। मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा — उनके हाथ व्हीलचेयर के पहियों पर कस गए थे, और उनकी आँखों में वो आग थी जो बीस साल से सुलग रही थी।
और तभी, जब सब चुप थे, कालू काका उठे। एक हाथ से उन्होंने अपनी कमर पकड़ी और दूसरे हाथ से गुड़िया का हाथ थामा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो ज़िद थी जो मरे हुए आदमी में भी नहीं होती।
"तो कल सुबह नौ बजे," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कंपन नहीं था, सिर्फ़ एक अजीब सी शांति थी। "मैं तीस साल बाद पहली बार अपना मुँह खोलूँगा। और जो मैं बोलूँगा, वो कोई नहीं झुठला सकेगा। क्योंकि जो मैंने देखा है, वो मेरी आँखों में अब भी ज़िंदा है।"
वो मेरी तरफ़ मुड़े। उनकी आँखों में वो पानी था जो अब भी नहीं सूखा था, पर उस पानी के पीछे कुछ और भी था।
"वीर," उन्होंने कहा, "तेरे पापा ने लिखा था कि मिट्टी सिखा देगी। आज मुझे लगा कि वो मिट्टी मुझे भी सिखा रही है। कल तेरे साथ मैं भी खड़ा रहूँगा। अगर मेरी गवाही से तेरा रास्ता खुलता है, तो मैं पूरा सच बोलूँगा — चाहे उसमें मेरा गुनाह क्यों न हो।"
सिपाही ने एक बार हम सबको देखा। उसके चेहरे पर उस वक़्त कुछ बदल रहा था — वो वर्दी के नीचे का आदमी जो अब तक सिर्फ़ हुक्म मान रहा था। उसने काग़ज़ मोड़ा और अपनी जेब में रख लिया।
"मैं जाता हूँ," उसने कहा। फिर वो फाटक तक गया, और पलटकर बोला, "साहब… मैं आपके पापा को नहीं जानता था। पर आज जो मैंने सुना, उसके बाद मुझे लगता है कि कोई आदमी मरता नहीं। उसकी बातें ज़िंदा रहती हैं।"
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