Spirit of a Fighter1023 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1023

7 min read November 5, 2026

"ये डायरी भवानी ने मरने से तीन दिन पहले मुझे दी थी," कमला देवी ने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी पर आँगन में हर कोने तक पहुँच रही थी। "उसने कहा था — 'दीदी, अगर मुझे कुछ हो जाए, तो ये तू अपने पास रखना। मेरे बेटे को मत देना जब तक वो खुद लड़ने लायक न हो जाए।' और मैंने वो किया। तीस साल इस डायरी को संदूक में छुपाए रखा, अपनी बहन के बेटे से दूर। क्योंकि मुझे डर था कि जिस दिन ये डायरी खुलेगी, उस दिन कोई मरेगा।"

"आज खुल रही है," रणवीर सिंह ने कहा। वो व्हीलचेयर पर थे पर उनकी आवाज़ में वो गरज थी जो पहलवानों के कानों में आज भी गूंजती है। "पढ़ो, कमला। जो लिखा है, सबके सामने पढ़ो।"

कमला देवी ने डायरी खोली। पन्ने पुराने थे, स्याही फीकी, कुछ जगह उँगली की छाप थी। उन्होंने गला साफ़ किया और पढ़ना शुरू किया —

"आज मैंने उस आदमी को अखाड़े के पीछे देखा। वो शीशी किसी को दे रहा था। मैंने पूछा तो वो हँसा और बोला — 'भवानी सिंह, तुम बड़े पहलवान हो, पर तुम नहीं समझोगे। ये पानी तुम्हारी ताक़त नहीं बढ़ाता, ये तुम्हारी मौत का हिसाब लिखता है।' मैंने कहा — 'तो क्यों देते हो?' वो बोला — 'क्योंकि अखाड़े के पैसे का हिसाब किसी को रखना होता है, और मैं… मैं सिर्फ़ हिसाब रखता हूँ।'"

आँगन में सन्नाटा छा गया। सुक्खी बुआ ने अपना पान का बीड़ा थूकने के लिए मुँह खोला पर थूका नहीं, बस मुँह खुला रह गया।

"मैंने उसका नाम पूछा," कमला देवी ने पढ़ा, "तो उसने अपनी आँख दिखाई — एक में दूध की बूँद जमी हुई — और बोला, 'मोहन। बस मोहन काफ़ी है।'"

मेरे हाथ से चाय का गिलास छूट गया। काँच मिट्टी पर गिरा और टुकड़े-टुकड़े हो गया। मैंने उसे उठाया नहीं। मेरी आँखों के सामने तहखाने की वो स्लेट घूम गई — जिस पर टेढ़ी-मेढ़ी लिखाई में 'मोहन' लिखा था, और उसके नीचे कोई तारीख़, और उसके नीचे उँगली से खरोंचा हुआ कोई नाम जो मिट गया था।

"मोहन," मैंने धीरे से कहा, और मेरी आवाज़ भी अपनी नहीं लगी। "मैंने ये नाम तहखाने की स्लेट पर देखा था। तीन महीने पहले। मुझे लगा कोई पुराना मज़दूर होगा जो कभी वहाँ रहता था।"

टिंकू ने अपनी मिठाई की डिब्बी — जो वो हमेशा अपने साथ रखता था, जैसे कोई अपनी जान — मेज़ पर रख दी और दोनों हाथ ऊपर करके बोला, "अरे, तो मोहन कोई भूत नहीं, असली आदमी है! मैं तो सोच रहा था रातों को तहखाने में कोई रोता है तो वो पुराने ज़माने का सिपाही होगा जिसे नींद नहीं आती!"

वो अपनी मिठाई की डिब्बी की तरफ़ देखकर बोला, "यानी मैं इतने दिनों से जिसे भूत समझकर लड्डू चढ़ा रहा था, वो आदमी है? भाई, मेरे लड्डू वापस!"

आँगन में हँसी फूट पड़ी। सुक्खी बुआ की हँसी सबसे ऊँची थी, और गुड़िया हँसते-हँसते मेरी तरफ़ गिर पड़ी। यहाँ तक कि रणवीर सिंह के होंठ भी हिले, जो शायद बरसों में पहली बार था। मैंने देखा कि माँ ने अपनी आँखों का पानी पोंछने के बहाने साड़ी का कोना ऊपर किया, पर उसके होंठ हँस रहे थे।

पर कमला देवी की आँखें नहीं हँसीं। उन्होंने डिब्बी की तरफ़ देखा और फिर धीमे से बोलीं, "बेटा, तेरे लड्डू वो नहीं खाता। वो सिर्फ़ पानी पीता है। अपनी शीशी का।"

टिंकू की हँसी गले में अटक गई। उसने डिब्बी अपनी छाती से लगा ली, जैसे कोई बच्चा खिलौना बचा रहा हो।

मीरा आगे आई। उसके हाथ में अब भी वो हरी शीशी थी जो उसने सुरंग में निकाली थी — अदरक-तुलसी वाली। उसने उसे कमर पर बाँधा और सीधा कमला देवी से पूछा, "मोहन अब कहाँ है?"

कमला देवी ने डायरी बंद कर दी। उन्होंने आँगन में बैठे हर आदमी की तरफ़ देखा, एक-एक करके, जैसे तौल रही हों कि किस पर भरोसा किया जा सकता है।

"वो उस रात गायब हो गया," उन्होंने कहा। "जिस रात भवानी मरा। मैं उस रात यहाँ आई थी — अपनी बहन के घर। मैंने भवानी को ज़मीन पर पड़ा देखा, और उसके पास खड़ा था एक आदमी — लंबा, काला, और उसके हाथ में पीली शीशी। मैंने चीखने की कोशिश की पर आवाज़ नहीं निकली। वो मेरी तरफ़ मुड़ा, मुझे देखा, और मुस्कुराया। फिर पलटकर दरवाज़े से बाहर चला गया, और मैं… मैं ज़मीन पर बैठ गई और रोती रही। सुबह तक।"

"तो वो ज़िंदा है?" माँ ने पूछा। उनकी आवाज़ सूखी थी पर उसमें एक चीज़ थी जो मैंने पहले नहीं सुनी थी — बदले की भूख। "वो आदमी जिसने मेरे पति को शीशी दी, वो आज भी इस दुनिया में साँस ले रहा है?"

कमला देवी ने माँ की तरफ़ देखा और उनकी आवाज़ नरम पड़ गई। "बहन, मैं जानती हूँ ये सवाल तेरे दिल में क्या कर रहा है। पर मैंने तीस साल उसे ढूँढा। हर मेले में, हर अखाड़े में, हर शहर में जहाँ पहलवानों की भीड़ हो। कुछ नहीं मिला। जैसे वो आदमी धरती ने निगल लिया हो।"

कालू काका जो अब तक चुप बैठे थे, धीरे से बोले। उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि लोगों को सुनने के लिए आगे झुकना पड़ा।

"मैंने उसे एक बार देखा था। उस रात के बाद। दो महीने बाद। रात थी, बारिश हो रही थी। मैं अखाड़े की मिट्टी ढकने गया था। और वहाँ कुएँ के पास एक आदमी खड़ा था, शीशी हाथ में। मैंने उसे पुकारा। वो पलटा — और उसकी एक आँख में वो दूध की बूँद थी। मैं वहीं जम गया। वो मेरे पास आया, मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोला — 'कालू, तू चुप रह, तो तेरा बेटा ज़िंदा रहेगा।' और मैं… मैं चुप रहा।"

कालू काका के हाथ फिर काँपने लगे। गुड़िया उठी और उनके पास जाकर बैठ गई। उसने अपनी छोटी सी उँगली काका की उँगली में फँसा दी, और काका ने उसे थाम लिया, जैसे कोई डूबता आदमी रस्सी थामता है।

कमला देवी ने डायरी का आख़िरी पन्ना खोला। उनका हाथ काँप रहा था। उन्होंने एक बार आँखें बंद कीं, फिर खोलीं, और पढ़ा —

"आज मैंने अपनी डायरी में आख़िरी बात लिख रहा हूँ। कल मुझे लगता है कुछ होने वाला है। भैरव ने आज मुझे अखाड़े में नहीं आने दिया, कहा आराम करो। पर मैं जानता हूँ — वो डरता है। डरता है कि मैं सच बोल दूँगा। मैं नहीं बोलूँगा। क्योंकि मैंने एक बात तय की है — मुझसे ज़्यादा मेरा बेटा ज़रूरी है। पर अगर मैं मरूँ, तो मेरा बेटा मेरी मिट्टी से बदला लेगा। मैं उसे कुछ नहीं सिखा पाया, पर ये मिट्टी सिखा देगी। वो मिट्टी में पैदा हुआ है, मिट्टी में खेला है, और मिट्टी उसे कभी धोखा नहीं देगी। मेरा बेटा, अगर तू ये पढ़े, तो याद रख — पहलवान बनना, बदला लेने वाला नहीं। क्योंकि बदला लेने वाला भी मरता है। पहलवान ज़िंदा रहता है।"

कमला देवी रुक गईं। उनका गला भर आया था।

मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने उन्हें अपनी जाँघों पर रखने की कोशिश की पर वो नहीं रुके। मेरी आँखों के सामने वो सब घूम गया — माँ का चक्की पर झुकना, गुड़िया का मिट्टी की थैली देना, कालू काका का मुझे अखाड़े की मिट्टी थमाना, और मेरे पापा का ये आख़िरी लिखा हुआ। जो आदमी मरते वक़्त भी अपने बेटे को बदले से रोक रहा था।

"पापा," मैंने धीरे से कहा, और मेरी आवाज़ टूट गई। "आपने मुझे कभी नहीं देखा। पर आपने मुझे सब सिखा दिया।"

माँ मेरे पास आई। उसने मेरा सिर अपने दोनों हाथों में पकड़ा और अपने माथे से लगाया। उसका माथा गरम था, हल्दी के टीके की गंध आ रही थी। उसने कुछ नहीं कहा। बस मेरा सिर पकड़े रही, जैसे मैं अभी भी चार साल का होऊँ और रात को डर के मारे उसकी चारपाई पर आ जाता था।

"पढ़ो," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ भारी थी। "आगे भी कुछ लिखा है?"

कमला देवी ने पन्ना पलटा। उनकी आँखें सिकुड़ीं।

"ये भवानी की लिखाई नहीं है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में एक नई चीज़ आई — डर। "ये नीचे जोड़ा गया है। किसी और ने लिखा है। स्याही नई है।"

"क्या लिखा है?" मीरा ने पूछा।

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