Spirit of a Fighter102 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 102

7 min read November 5, 2026

हरनाम ने चश्मा उतारा। उसने उसे अपनी कमीज़ से पोंछा — धीरे-धीरे, जैसे कोई बहुत थका हुआ आदमी हाथ पोंछता है। और जब उसने चश्मा वापस लगाया, तो उसकी आँखें भरी हुई थीं, लाल।

"मेरे भी बच्चे हैं, वीर," उसने कहा। आवाज़ इतनी धीमी कि मुझे झुककर सुनना पड़ा। "दो। एक लड़का, एक लड़की। भैरव के दफ़्तर में नौकरी करने से पहले मैं सिर्फ़ एक मास्टर था। गणित पढ़ाता था। मेरी बेटी को डॉक्टर बनाना था। भैरव ने पहले महीने में ही मेरी तनख़्वाह दुगनी कर दी थी — और मैंने पूछा नहीं कि पैसा कहाँ से आता है। यही मेरा जुर्म है।

॥

"मैंने दिया।"

वो आवाज़ पीछे से आई थी। मैंने पलटकर देखा। दरवाज़े पर भैरव सिंह खड़ा था, कंधे से कंधा मिलाए, हाथ पीठ के पीछे बाँधे। उसके पीछे दो आदमी थे — काले कुर्ते में, मुँह पर कुछ नहीं, पर आँखें वैसी जैसी सूखे कुएँ में दिखती हैं।

मीरा का हाथ ठंडा पड़ गया। रणवीर सिंह की मुट्ठी ने उसकी उँगली कसकर पकड़ ली, इतनी कसकर कि हड्डी चटकने जैसी आवाज़ आई। वो व्हीलचेयर में बैठे थे, और उनके सामने उनका बीस साल पुराना दुश्मन खड़ा था, और वो कुछ नहीं बोल सकते थे।

"अंदर आ जा, भैरव," रणवीर सिंह ने कहा। आवाज़ सूखी थी, पर टूटी नहीं।

भैरव अंदर आया। उसने कुर्सी खींची और बैठ गया, जैसे ये उसका घर हो। उसने अपनी धोती ठीक की, फिर अपनी सोने की चेन को उँगली से घुमाया।

"मैं सुन रहा था," वो बोला। "बाहर खिड़की के नीचे। तुम लोग रिपोर्ट पढ़ रहे थे।" उसने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा। "बीस साल बाद भी तेरी आवाज़ में वो गरज है, सर। मुझे अच्छा लगा।"

"तू मेरे घर में आकर मेरी तारीफ़ कर रहा है?" रणवीर सिंह ने कहा।

"मैं तेरे घर में आकर सच बताने आया हूँ।" भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। "बेटी, तूने जो रिपोर्ट पढ़ी, वो सही है। पानी में ज़हर है। और हाँ — मैंने ही तेरे पापा को दिया था।"

कमरे में हवा रुक गई।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर रंग नहीं था, पर आँखें सीधी भैरव पर टिकी थीं। उसने कोई आवाज़ नहीं की।

"पर एक बात सुन ले," भैरव ने आगे कहा। "मैंने ज़हर नहीं दिया था। मैंने ताकत दी थी। तेरे पापा उस वक़्त अखाड़े के सबसे बड़े पहलवान थे। शहर से लोग आते थे उन्हें देखने। एक दिन उन्होंने मुझसे कहा — भैरव, मैं थक गया हूँ। मेरी कमर में दर्द रहता है। कोई चीज़ दे जो मुझे दस साल और चला दे।" भैरव ने दोनों हाथ फैलाए। "मैंने दे दी। एक घूँट। बस। वो खुद माँग रहे थे।"

मीरा की मुट्ठी काँपने लगी। मैंने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ाया, पर वो खुद बोल पड़ी।

"झूठ," उसने कहा। आवाज़ धीमी थी पर साफ़। "मेरे पापा ने कभी किसी से कुछ माँगा नहीं। वो तुम्हारी नौकरी में थे — तुम उनके मालिक नहीं, मैनेजर थे। और मैनेजर मालिक को ज़हर नहीं देता।"

"तेरे पापा तेरे पापा हैं," भैरव ने कहा। "तू उन्हें सबसे अच्छा जानती है। पर मैं उन्हें उस रात जानता हूँ जब वो मेरे कमरे में आए थे, हाथ जोड़े, और कहा था — भैरव, मुझे बचा ले। मुझे अखाड़ा नहीं छोड़ना।"

रणवीर सिंह की साँस तेज़ हो गई। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर अपने पैरों की तरफ़, फिर अपने हाथों की तरफ़।

"हाँ," वो धीरे से बोले। "मैंने कहा था। पर तूने उस वक़्त क्या कहा था, भैरव? बता इसे। तूने कहा था — पहले मेरे पैर चूम, फिर पानी मिलेगा।"

कमरा एकदम खाली हो गया। भैरव की मुस्कान जैसे किसी ने पकड़कर उतार दी हो।

वो उठ खड़ा हुआ। उसकी कुर्सी पीछे सरकी और फ़र्श पर खरोंच का निशान छोड़ गई।

"बीस साल पुरानी बात है," वो बोला।

"बीस साल पुरानी बात नहीं है," रणवीर सिंह ने कहा। "मेरे पैर आज भी सुन्न हैं। हर सुबह मैं उठता हूँ और सोचता हूँ — आज शायद थोड़ा महसूस होगा। बीस साल से मैं यही सोच रहा हूँ।" उन्होंने अपने पैरों की तरफ़ देखा। "तूने मेरी ताकत नहीं ली, भैरव। तूने मेरी सुबह ले ली।"

भैरव ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, पर रणवीर सिंह ने हाथ उठाकर रोक दिया। और फिर जो हुआ, वो मैंने अपनी आँखों से देखा और आज तक भूल नहीं पाया।

रणवीर सिंह ने अपने हाथ व्हीलचेयर की बाँहों पर रखे। उनकी बाँहों की नसें उभर आईं। उनका चेहरा लाल हुआ, दाँत भिंचे। वो उठने की कोशिश कर रहे थे।

"पापा, नहीं!" मीरा दौड़कर पास गई।

"हट," उन्होंने कहा। बस इतना — एक शब्द।

और फिर वो खड़े हुए। पूरे नहीं — आधे झुके, हाथ बाँहों पर टिकाए, पैर काँपते हुए। पर वो खड़े थे। दो सेकंड। तीन।

भैरव एक कदम पीछे हटा।

"बीस साल तुमने मेरी मिट्टी में ज़हर घोला," रणवीर सिंह ने कहा। हर शब्द के बीच में साँस लेते हुए। "अब ये मिट्टी तुम्हें कभी माफ़ नहीं करेगी। मैं इन पैरों पर चलूँ या न चलूँ — मेरी बेटी चलेगी। और मेरा दामाद चलेगा।"

फिर वो वापस व्हीलचेयर में गिर पड़े। मीरा ने उन्हें सहारा दिया, पर उन्होंने अपना हाथ उसके हाथ पर रखकर रोक दिया — इसका मतलब था, मैं ठीक हूँ।

भैरव ने अपना चेहरा संभाला। फिर वो हँसा। अजीब सी हँसी — जैसे गला सूखा हो।

"अच्छा है," वो बोला। "बीस साल में पहली बार तुझे खड़े देखा।" उसने अपनी धोती ठीक की। "तीन दिन बाद मैदान में मिल। वहाँ तेरी मिट्टी और मेरी मिट्टी में फ़ैसला होगा।" वो दरवाज़े की तरफ़ मुड़ा, फिर रुका। "और हाँ — मेरी अलमारी की चाबी। तू तीन दिन बाद लेने आना। मैदान में। सबके सामने।"

वो चला गया। उसके दोनों आदमी भी पीछे-पीछे चले गए। दरवाज़ा खुला रह गया, और बाहर की गली से एक कुत्ते के रोने की आवाज़ आई।

मीरा ने अपने पापा का सिर अपनी गोद में रखा। रणवीर सिंह की आँखों से पानी बह रहा था — चुपचाप, बिना आवाज़। वो अपने पैरों की तरफ़ देख रहे थे, जैसे पहली बार देख रहे हों।

"मैंने इसे पीते वक़्त जाना था," वो बोले। आवाज़ टूट रही थी। "पहली बार जब पिया, तो अगली सुबह मेरी कमर का दर्द गया। मैं खुश हो गया। दूसरी बार जब पिया, तो हाथ तेज़ हो गए। तीसरी बार…" उन्होंने रुककर साँस ली। "तीसरी बार मैंने खुद भैरव से माँगा। और उसने कहा — पहले मेरे पैर चूम।"

मीरा ने अपना सिर उनके पैरों पर रख दिया। वो रोई — पहली बार मैंने उसे इतना रोते देखा। उसके कंधे उछल-उछल कर हिल रहे थे, और वो कोई आवाज़ नहीं कर रही थी। बस आँसू।

मैं कमरे के बाहर आ गया। मुझे अंदर रुकने का हक़ नहीं लगा। बाहर आँगन में खड़े होकर मैंने आसमान देखा। शाम हो रही थी और आसमान में बादल थे।

मुझे अपने पापा याद आए। रघुवीर। जिन्हें मैंने कभी अपनी आँखों से जीते हुए नहीं देखा। जिनकी सिर्फ़ एक धोती बची थी, और एक नाम — कुएँ के नीचे से आती आवाज़ में।

मैंने अपनी आँखें बंद कीं।

तभी मीरा बाहर आई। उसने अपनी आँखें पोंछ ली थीं, पर नाक लाल थी और होंठ सूजे हुए। वो मेरे पास आई और मेरे सामने खड़ी हो गई।

"तू जानता है," उसने कहा, "अगर मेरे पापा ने इस बार भी झूठ बोला, तो मैं उन्हें कभी माफ़ नहीं करूंगी।"

"उन्होंने झूठ नहीं बोला," मैंने कहा।

"तुझे कैसे पता?"

"क्योंकि जब भैरव ने कहा कि उन्होंने खुद माँगा था, तब तेरे पापा की साँस रुक गई थी।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "झूठ बोलने वाले की साँस नहीं रुकती। शर्म से आदमी की साँस रुकती है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक फ़ाइल निकाली — भूरे रंग का, कोने मुड़े हुए।

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