Spirit of a Fighter – Chapter 103
"ये लैब रिपोर्ट की कॉपी है," उसने कहा। "असली वाली मेरे पास है। ये तेरे लिए।"
मैंने फ़ाइल ली। मेरे हाथ भारी हो गए, जैसे किसी ने मेरी हथेली में पत्थर रख दिया हो।
"मीरा," मैंने कहा। "ये काग़ज़ अगर किसी और के हाथ लग गया…"
"तो मेरा नाम सबसे पहले जाएगा," उसने कहा। "पता है मुझे।"
"तो फिर तूने मुझे क्यों दी?"
वो मुस्कुराई। पहली बार ऐसी मुस्कान — थकी हुई, पर असली।
"क्योंकि तू अब अकेला नहीं है," उसने कहा। "और मैं भी नहीं।"
मैंने फ़ाइल अपनी बनियान के अंदर खोंस ली। काग़ज़ मेरी छाती से चिपक गया, और मुझे लगा जैसे मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई है।
"तीन दिन बाद मैदान में," मैंने कहा। "उसने कहा — अगर मैं जीता तो अलमारी की चाबी।"
"और अगर हारा तो?" मीरा ने पूछा।
"तो गाँव छोड़ना है।"
मीरा ने अपनी बाँहें बाँध लीं। "ये जाल है, वीर। भैरव ने आज खुद आकर कबूल किया कि उसने ज़हर दिया — ऐसा आदमी अपनी अलमारी का ताला खुद क्यों खोलेगा? वो तुझे मैदान में बुला रहा है क्योंकि उसने वहाँ कुछ बिछाया है।"
"मुझे पता है।"
"तो फिर?"
मैंने उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखें भूरी थीं, और उनमें वो बात थी जो रणवीर सिंह की आँखों में आज देखी थी — डर नहीं, हिसाब।
"जाल हो या सच," मैंने कहा, "मैं देखकर आऊँगा।"
"अकेले?"
"तेरे पापा ने बीस साल अकेले झेला। मैं तीन दिन नहीं झेल पाऊँगा?"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत।
"तू अकेला नहीं है," उसने कहा। "मैंने एक बार कहा था, और अब दोबारा कह रही हूँ।"
मैंने उसका हाथ नहीं छोड़ा। हम दोनों आँगन में खड़े रहे, और हवा में मिट्टी की गंध थी, और मुझे लगा जैसे कुछ देर के लिए दुनिया रुक गई है।
फिर अंदर से रणवीर सिंह की आवाज़ आई।
"मीरा!"
हम दोनों अंदर गए। रणवीर सिंह व्हीलचेयर में सीधे बैठे थे। उनके हाथ में वो पुरानी पर्ची थी जो माँ ने मीरा को दी थी — भैरव के नाम वाली।
"ये पर्ची कहाँ से आई?" उन्होंने पूछा।
"माँ के पास थी," मीरा ने कहा। "रघुवीर की लिखाई है।"
रणवीर सिंह ने पर्ची को करीब लाकर देखा। उनकी उँगली काग़ज़ पर चली, अक्षरों पर रुकी।
"ये रघुवीर का हाथ है," वो बोले। "मैं इसे पहचानता हूँ।" उन्होंने पर्ची पलटी। पीछे कुछ लिखा था, बहुत छोटे अक्षरों में। "ये देख।"
मैंने झुककर देखा। पीछे लिखा था — "जो मेरे बेटे को अखाड़े में उतारे, वो पहले उसकी नाक की क़ीमत जान ले।"
मेरा दिल धक् से रह गया।
"मेरे पापा जानते थे," मैंने धीरे से कहा। "मेरी नाक के बारे में।"
"सब जानते थे," रणवीर सिंह ने कहा। "रघुवीर, जगदीश, हरिया — तीनों जानते थे। और तीनों ने इसे छुपाया, क्योंकि अगर भैरव को पता चलता…" वो रुके। "भैरव को पता है, बेटा। आज उसने खुद कहा था — 'मैं तुझे तोड़ने आऊँगा।' वो तेरी नाक तोड़ेगा। मैदान में।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा। और उस एक पल में, मुझे पता चला कि अब हम दोनों एक ही रस्सी पर बँधे हैं।
उस रात मैं घर नहीं गया। रणवीर सिंह ने कहा कि आज यहीं रुक जा। मीरा ने बरामदे में चारपाई बिछा दी, और मैं लेट गया।
नींद नहीं आई।
मैंने आसमान देखा। तारे दिख रहे थे, और हवा में मीरा के हाथों की गंध थी — वो सोंठ और काली मिर्च वाली पुड़िया, जो उसने मुझे दी थी, मेरी जेब में रखी थी और उसकी महक मेरे सीने तक आ रही थी।
मैंने सोचा — तीन दिन। तीन दिन में क्या-क्या होगा। भैरव मैदान में क्या बिछाएगा। माँ क्या करेगी। गुड़िया क्या करेगी। टिंकू क्या करेगा। और कालू काका — जिनकी ज़ंजीर आज टूटी थी, जिनका भाई चंदन आज बाहर खड़ा था।
और मेरे पापा — जो कुएँ में बंद हैं, बीस साल से। जिन्होंने मुझे नाम नहीं बताया। जिन्होंने कहा था, "वीर सिंह, मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूँ।"
मैं करवट बदलकर लेटा। चारपाई चरमराई।
तभी मुझे पैरों की आहट सुनाई दी। हल्की, चप्पल की।
मीरा आई। वो चारपाई के पास खड़ी हो गई। अंधेरे में उसका चेहरा ठीक से नहीं दिख रहा था, सिर्फ़ उसकी आँखें चमक रही थीं।
"सो गया?" उसने धीरे से पूछा।
"नहीं।"
वो बैठ गई। फ़र्श पर, चारपाई के किनारे, घुटने मोड़कर।
"मैंने आज पापा से एक और बात पूछी," उसने कहा। "जब तू बाहर गया था। मैंने पूछा — पापा, अगर तुम्हें पता था कि पानी में ज़हर है, तो तुमने पुलिस को क्यों नहीं बताया?"
"उन्होंने क्या कहा?"
मीरा ने रुककर साँस ली। "उन्होंने कहा — मैंने बताया था। एक बार।" वो मेरी तरफ़ मुड़ी। "पर उस थानेदार का बेटा भैरव के अखाड़े में कुश्ती लड़ता था। मेरे पापा ने शिकायत दी, और अगले ही हफ़्ते उनके दोनों पैर सुन्न हो गए।"
मैं उठकर बैठ गया।
"तो तेरे पापा को पता था कि पुलिस में भैरव के आदमी हैं।"
"हाँ। और उन्होंने मुझे बीस साल ये बात नहीं बताई, क्योंकि वो मुझे डराना नहीं चाहते थे।" मीरा की आवाज़ काँपी। "आज उन्होंने कहा — अब बता रहा हूँ, क्योंकि अब तू अकेली नहीं है।"
मैं कुछ नहीं बोला। शब्द नहीं मिल रहे थे।
मीरा ने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया। उसने मेरी उँगली पकड़ी, और फिर उसने मेरी मुट्ठी खोलकर उसमें कुछ रख दिया।
मैंने महसूस किया — ठंडा, गोल, धातु।
"ये क्या है?"
"मेरे पापा की अँगूठी," उसने कहा। "वो जिसे उन्होंने अपनी आख़िरी जीत के बाद पहना था। उन्होंने कहा — इसे उस लड़के को दे देना, जो मिट्टी को अपना घर मानता है।"
मैंने अँगूठी मुट्ठी में कस ली। वो मेरी हथेली में गरम होने लगी।
"मीरा," मैंने कहा। आवाज़ मेरी अपनी नहीं लगी। "अगर मैं मैदान में हार गया, तो…"
"तो क्या?"
"तो तेरे पापा का क्या होगा? भैरव ने कहा था — जो हारे, गाँव छोड़े।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। अंधेरे में उसका चेहरा आधा छिपा था, पर उसकी आवाज़ साफ़ थी।
"जो हारे, वो गाँव छोड़े," उसने धीरे से दोहराया। "पर तू हारेगा नहीं।" वो उठी। "क्योंकि अगर तू हारा, तो मेरे पापा को गाँव छोड़ना पड़ेगा, और मुझे भी। और मैं ये गाँव छोड़कर कहीं नहीं जाने वाली।"
वो चली गई। उसकी चप्पल की आवाज़ दूर होती गई। मैं अँगूठी को अपनी उँगली में पहनने की कोशिश करने लगा। वो मेरी उँगली में ढीली थी — रणवीर सिंह की उँगली बड़ी रही होगी।
मैंने उसे जेब में रख लिया, और तारों को देखता रहा।
सुबह मैं जल्दी उठा। आँगन में रणवीर सिंह पहले से जाग रहे थे। उनके हाथ में एक कटोरी थी — दूध में भीगी रोटी।
"बैठ," उन्होंने कहा।
मैं उनके पास बैठ गया।
"आज तू अखाड़े नहीं जाएगा," वो बोले।
"पर मैदान में…"
"मैदान तीन दिन बाद है। तीन दिन में तुझे तीन चीज़ें सीखनी हैं।" उन्होंने कटोरी रख दी। "पहली — मिट्टी को पहचानना, जो कालू ने शुरू कर दिया है। दूसरी — अपनी नाक को संभालना। ज़्यादा सूंघेगा तो सिर फटेगा, नाक से खून आएगा, और मैदान में तू अंधा लड़ेगा।"
"और तीसरी?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो गरज लौट आई थी जो कल भैरव के सामने आई थी।
"तीसरी — भैरव से नफ़रत करना छोड़ दे," उन्होंने कहा। "नफ़रत तुझे भैरव जैसा बना देगी। तू उससे लड़ेगा, पर उसके जैसा नहीं बनेगा। समझा?"
मैंने सिर हिलाया।
"बोल," उन्होंने कहा। "समझा?"
"समझा," मैंने कहा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno