Spirit of a Fighter – Chapter 101
"तो मैं अकेला लड़ूँगा।"
"नहीं," मीरा ने कहा। "तुम अकेले नहीं लड़ोगे।"
रात को मैं आँगन में बैठा था। कॉपी सीने से लिपटी थी। चाँद आसमान पर था, आधा छिपा हुआ, जैसे खुद भी कुछ छुपा रहा हो।
माँ आईं। वो मेरे पास बैठीं। कुछ देर चुप रहीं।
"वीर," उन्होंने कहा, "कल पंचायत है।"
"हाँ।"
"तू क्या बोलेगा?"
"सच," मैंने कहा।
"सच बोलने के लिए सबूत चाहिए। सबूत के लिए हिम्मत चाहिए। हिम्मत के लिए…"
"क्या?"
"हिम्मत के लिए भूख चाहिए, बेटा। वो भूख जो तेरे पापा की आँखों में थी।"
उन्होंने मेरा सिर सहलाया।
"तेरे पापा ने भी एक बार पंचायत में खड़े होकर सबके सामने सच बोला था। बीस साल पहले। रघुवीर ने कहा था — भैरव, तू ज़हर देता है। उस दिन गाँव ने उन्हें सुना। पर उस दिन गाँव डर गया था। भैरव के पास पैसा था, और पैसे के पास पुलिस थी।"
"तो गाँव ने पापा को अकेला छोड़ दिया?"
"हाँ।" माँ की आवाज़ सपाट थी। "और इस बार गाँव डरेगा नहीं। क्योंकि इस बार पंचायत में खड़ा आदमी रघुवीर का बेटा होगा। और रघुवीर का बेटा अकेला नहीं होगा।"
"क्यों नहीं होगा?"
माँ ने मेरी कलाई पकड़ी। उनकी पकड़ मज़बूत थी, उम्र के बावजूद।
"क्योंकि इस बार औरतें भी पंचायत में आएँगी," उन्होंने कहा। "मैं पंचायत में बैठूँगी। गुड़िया खड़ी होगी। सुक्खी बुआ बोलेगी। मीरा सबूत रखेगी। तेरा टिंकू तेरे पीछे खड़ा होगा। कालू काका गवाही देंगे। चंदन गवाही देगा।"
वो रुकीं। फिर बोलीं, "और उस दिन, जब पंचायत ख़त्म होगी, तो भैरव को पता चलेगा कि उसने सिर्फ़ एक आदमी से नहीं, पूरे रामपुर से लड़ाई ली थी।"
मैंने उनके हाथ को अपने हाथ में लिया।
"माँ," मैंने कहा, "कल मुझे पापा की धोती पहननी है।"
"हाँ," उन्होंने कहा। "मैंने धोकर रख दी है।"
सुबह जल्दी उठा।
गुड़िया पहले से उठी थी। उसने मेरे लिए चाय बनाई थी — मेरी चाय, जिसमें गुड़ और अदरक था। वो अपने छोटे हाथों से कप लेकर आई और बोली, "भैया, आज मैं पंचायत में बोलूँगी।"
"क्या बोलेगी?"
"जो मैंने कॉपी में पढ़ा। हर नाम। हर तारीख़। हर हिसाब।" उसने जेब से एक छोटी कॉपी निकाली। "मैंने सब लिख लिया है। रात में। ताकि अगर वो बड़ी कॉपी छिन जाए, तो मेरी कॉपी रहे।"
मैंने उसकी कॉपी पलटी। बारह साल की बच्ची ने रात भर में हर पन्ने की नकल की थी। हर नाम। हर हिसाब।
मेरी आँखें भर आईं। मैंने उसे गले लगाया।
"गुड़िया, तू तो… तू तो हमारी सबसे बड़ी गवाह है।"
वो हँसी। उसकी आँखों में नींद की कमी थी, पर चमक पूरी थी।
"भैया, मैंने कहा था न — अब नहीं डरूँगी।"
पंचायत का चबूतरा गाँव के बीच में था, पीपल के नीचे। जब मैं पहुँचा तो वहाँ पहले से भीड़ थी।
सुक्खी बुआ सबसे आगे बैठी थीं, हाथ में पान का बीड़ा। मुझे देखकर बोलीं, "अरे वीर, तेरे पीछे गुड़िया भी आई है? ये तो अच्छा है। आज ये गाँव देखेगा — बारह साल की बच्ची बड़े-बड़ों को जवाब देगी।"
मैंने सुक्खी बुआ की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में चुगली नहीं, चिंता थी।
चबूतरे पर भैरव पहले से बैठा था। उसके दोनों तरफ़ उसके दो आदमी खड़े थे, हाथ बँधे हुए, जैसे दुकान पर तराज़ू के दोनों पलड़े। मुझे देखकर उसने मुस्कुराने की कोशिश की।
"अरे वीर आ गया," उसने कहा, आवाज़ में वो नरमी डालकर जो वो सिर्फ़ भीड़ के सामने डालता था। "बैठ, बेटा। पंचायत में सबकी बात होगी। तेरे पापा का नाम भी आएगा।"
"मेरे पापा का नाम आएगा तो सीधा आएगा," मैंने कहा। "झुककर नहीं।"
भीड़ में से कोई फुफकारा। भैरव का मुँह सख़्त हुआ, पर वो चुप रहा।
पंच बैठे। पुराने लोग, सफ़ेद कुर्ते, हाथ में बहीखाते। सबसे बुज़ुर्ग पंच ने चश्मा सरका कर कहा, "कालू, तूने पंचायत बुलाई है। बोल।"
कालू काका उठे। उनकी लाठी काँप रही थी, पर आवाज़ नहीं।
"मैंने ये पंचायत इसलिए बुलाई है," उन्होंने कहा, "कि इस गाँव में बीस साल से एक ज़हर बिक रहा है। और इस ज़हर से इस गाँव के बेटे मर रहे हैं। मरे नहीं — मरवाए जा रहे हैं।"
भैरव हँसा। "कालू, तू बूढ़ा हो गया। पंचायत में सपने देखता है।"
"सपने नहीं, हिसाब देखता हूँ," कालू काका ने कहा, और मेरी तरफ़ देखा।
मैं उठा। मेरे हाथ में कॉपी थी, और पापा की धोती मेरे पैरों को छू रही थी — धोती जो माँ ने धोकर, सुखाकर, तह करके रखी थी, जैसे कोई हथियार रखा जाता है।
"ये कॉपी," मैंने कहा, और आवाज़ पहले तो फटी, फिर सँभली, "इसमें तीस साल का हिसाब है। हर पहलवान जो अखाड़े से गया, हर नाम, हर तारीख़, हर शीशी।"
मैंने पन्ना पलटा। भीड़ आगे खिसकी।
"नाम एक-एक करके मैं पढ़ूँगा," मैंने कहा। "और जिस-जिस के घर का नाम आएगा, उससे मैं यही पूछूँगा — तेरा बेटा कैसे गया?"
पहला नाम पढ़ा। भीड़ में एक बूढ़ी औरत खड़ी हो गई। उसने अपना आँचल मुँह पर रख लिया।
दूसरा नाम पढ़ा। एक आदमी ने सिर झुका लिया।
तीसरा नाम पढ़ा। चौथा।
जब मैंने ग्यारहवाँ नाम पढ़ा, भीड़ में जो सन्नाटा था, वो चीख जैसा लगा। मुझे अपनी आवाज़ दूर से आती महसूस हुई, जैसे कोई और बोल रहा हो और मैं सुन रहा हूँ।
भैरव खड़ा हुआ।
"बस!" उसकी आवाज़ चबूतरे पर गूँजी। "ये बच्चा है। इसके पापा पागल थे, और ये भी—"
"मेरे पापा पागल नहीं थे," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी। "वो सिर्फ़ अकेले थे। आज वो अकेले नहीं हैं।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। माँ पंचों के बीच बैठी थीं, पीठ सीधी, आँखें सूखी। गुड़िया मेरे ठीक पीछे खड़ी थी, अपनी छोटी कॉपी सीने से लगाए। मीरा एक कोने में खड़ी थी, हाथ में वो शीशी जो उसने कहीं से खोद निकाली थी।
भैरव ने भीड़ को देखा। उसने देखा कि भीड़ अब उसकी तरफ़ नहीं देख रही। भीड़ मेरी तरफ़ देख रही थी, और उन आँखों में डर नहीं था।
वो फिर बैठ गया। बैठते वक़्त उसका हाथ उसके आदमी की बाँह पर टिका, जैसे किसी ने उसे धक्का दिया हो।
पंचों ने सिर हिलाए। सबसे बुज़ुर्ग ने कहा, "भैरव, तुझे जवाब देना होगा।"
"मुझे तीन दिन दो," भैरव ने कहा। "तीन दिन बाद मैदान में अखाड़ा है। मैं खुद उतरूँगा। जो मुझे हराए, वो ये काग़ज़ ले। जो हारे, वो गाँव छोड़े।"
भीड़ में फुसफुसाहट उठी। सुक्खी बुआ ने पान थूका और बोलीं, "अपनी शर्तें अपने पास रख, भैरव। पर ये बात सही है — मैदान में सच निकलता है।"
पंचों ने मंज़ूरी दे दी।
पंचायत उठ गई। लोग धीरे-धीरे जाने लगे, पर जाते-जाते हर कोई मेरे पास से गुज़रा, और किसी ने कुछ नहीं कहा — बस कंधे पर हाथ रखा, या आँखों से इशारा किया। वो चुप्पी किसी भाषण से बड़ी थी।
मैं चबूतरे पर अकेला बैठा रह गया।
तभी साया पड़ा।
हरनाम था। चश्मा, बस्ता, वही झुकी हुई चाल।
मैं झटके से खड़ा हुआ। "तू यहाँ?"
"मैं पीछे खड़ा था," उसने धीरे से कहा। "सब सुना।" वो मेरे पास आया, और फिर वो हुआ जो मैंने सोचा भी नहीं था — उसने अपनी जेब से एक पुरानी पर्ची निकाली और मेरे हाथ में रख दी। "ये रघुवीर की लिखाई है। मैंने बीस साल रखी। आज इसका हक़दार मिल गया।"
मैंने पर्ची खोली। पापा की लिखाई। एक ही लाइन — "हरनाम झूठा नहीं है, वो डरा हुआ है। जो डरा हुआ है, उसे बचा लेना।"
मेरा गला भर आया। "पापा ने तुझे बचाने को कहा था?"
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