Spirit of a Fighter – Chapter 100
"अगर मैं बोलूँगा," वो बोला, "तो मेरी भी हड्डियाँ निकल जाएँगी। तेरे पापा की तरह। मेरे बच्चों के सामने मेरा नाम लिखा जाएगा — ज़हर देने वाला। उनके स्कूल वाले क्या कहेंगे?"
मैंने उसकी तरफ़ झुककर देखा।
"और अगर तू चुप रहा," मैंने कहा, "तो भी तेरी हड्डियाँ निकलेंगी। उस दिन जब भैरव पकड़ा जाएगा, तब काग़ज़ उसकी अलमारी से निकलेंगे। तेरे हाथ के लिखे हुए। तेरे दस्तख़त के नीचे। फिर तू क्या कहेगा? कि मैंने सिर्फ़ हिसाब रखा था? कि मैंने खून नहीं किया, सिर्फ़ हिसाब लिखा?"
उसकी आँखों से पानी बह निकला। उसने चश्मा पहना, फिर उतारा, फिर पोंछा। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"फ़र्क सिर्फ़ इतना है," मैंने कहा, "कि चुप रहकर तू अकेला मरेगा। बोलकर तू अपने बच्चों को अपना नाम बचा सकता है। कम से कम उन्हें ये बता पाएगा कि तेरा बाप गलत था, तू सिर्फ़ कमज़ोर था।"
वो रोया। बैठे-बैठे, बच्चों की तरह रोया, दोनों हाथों में मुँह छिपाकर।
मैं चुप बैठा रहा। मुझे उस पर तरस नहीं आ रहा था। पर गुस्सा भी नहीं आ रहा था। बस एक अजीब-सी शांति थी। जैसे कोई पुराना घाव आख़िरकार सूखने लगा हो।
कुछ देर बाद वो रुका। आँखें पोंछीं। मेरी तरफ़ देखा।
"तू क्या चाहता है, वीर?"
"मुझे कॉपी चाहिए," मैंने कहा। "पंचायत में। सबके सामने। और मुझे तेरा बयान चाहिए — लिखा हुआ।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने कॉपी उठाई और उसे दराज़ में रख दिया। ताला लगाया। चाबी जेब में रखी।
"पंचायत में नहीं," उसने कहा। "अगर मैं पंचायत में खड़ा हुआ और बोला, तो भैरव का बाप मुझे उसी रात उठा ले जाएगा। मेरे बच्चों तक पहुँच जाएगा।"
"तो क्या तू चुप रहेगा?"
"नहीं।" उसकी आवाज़ अब साफ़ थी। "मैं तुझे कुछ और दूँगा।"
वो उठा। खिड़की तक गया। बाहर देखा। फिर वापस आकर धीरे से बोला, "तीन दिन बाद जब भैरव मैदान में उतरेगा — उस दिन तू अखाड़े के पीछे वाली अलमारी का ताला खुला पाएगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या मतलब?"
"अलमारी में सिर्फ़ पीला काग़ज़ नहीं है," उसने कहा। "उसके नीचे एक और परत है। उस परत में भैरव का असली रिकॉर्ड है। हर मौत का, हर पैसे का, हर गवाह का। मेरा बाप उसे अलमारी में रखवाता है, क्योंकि उसे लगता है वहाँ कोई नहीं पहुँचेगा।"
"और ताला?"
"ताला मैं खोल दूँगा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तीन दिन बाद। उसी रात। जब भैरव मैदान में होगा।"
"शर्त क्या है?"
वो एक पल रुका। फिर बोला, "मेरा नाम मत लेना। किसी के सामने। कभी नहीं। अगर किसी ने पूछा कि अलमारी का ताला कैसे खुला, तो कहना — ताला पहले से खुला था। मैं कहीं नहीं हूँ। मैं इस कहानी में नहीं हूँ।"
मैंने उसकी आँखों में देखा।
"तू अपना नाम नहीं चाहता," मैंने कहा, "पर तू चाहता है कि तेरे बच्चे अपना नाम रख सकें।"
उसने सिर हिलाया। उसके होंठ काँप रहे थे।
"हाँ," उसने कहा। "एक बाप अपना नाम खोकर भी बच्चों का नाम बचा सकता है।"
मैं उठा। कुर्सी पीछे सरकाई।
"हरनाम," मैंने कहा, "एक बात याद रख। आज तक तुझे लगता था कि तू कमज़ोर है। पर आज तूने जो किया, वो हिम्मत का काम है।"
वो मेरी तरफ़ देखता रहा। उसकी आँखों में कुछ बदला। जैसे कोई बंद दरवाज़ा अंदर से खुला हो।
"वीर," उसने धीरे से कहा, "तेरे पापा ने भी मुझसे यही कहा था। बीस साल पहले। उस रात। उसी दफ़्तर में। बोले थे — हरनाम, तू बुरा नहीं है। तू बस डरा हुआ है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"तू उस रात यहाँ था?"
"हाँ।" उसने नज़रें चुराईं। "मैं उस कमरे में था जहाँ रघुवीर को पानी दिया गया। मैंने… मैंने गिलास पकड़ा था। अपने हाथों से। भैरव ने दिया था, और मैंने रघुवीर के सामने रख दिया था।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। मैंने अपनी साँस रोक ली।
"और तूने उसे रोका नहीं?"
"मैं डर गया था," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "मैं बीस साल से उस गिलास को अपने हाथ में महसूस करता हूँ। हर रात।"
मैं उसकी तरफ़ देखता रहा। मेरे अंदर कुछ ऐसा उठा जो गुस्से और दया के बीच में था। मैंने अपनी मुट्ठी भींची। फिर ढीली की।
"तो अब उस गिलास का हिसाब चुका," मैंने कहा। "तीन दिन बाद। अलमारी का ताला खोलकर।"
वो सिर हिलाता रहा। आँसू उसके गालों पर सूख रहे थे।
दफ़्तार से निकला तो सूरज सिर पर था। हवा में गरमी थी, पर मेरे अंदर एक ठंडक थी। जैसे कोई लंबी बीमारी के बाद पहली बार गहरी साँस लेता है।
टिंकू बाहर बैठा था, दीवार से टिका। मुझे देखते ही उठा।
"क्या हुआ?"
"अलमारी का ताला खुलेगा," मैंने कहा। "तीन दिन बाद।"
"उसने मान लिया?"
"हाँ।"
टिंकू ने एक लंबी साँस छोड़ी। "भाई, तूने क्या किया अंदर? मैंने सुना — वो रो रहा था।"
"उसने रोया," मैंने कहा। "और उसने एक राज़ भी बताया। वो उस रात वहाँ था। जब मेरे पापा को ज़हर दिया गया।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसका चेहरा उतर गया।
"तो वो भी…"
"वो मरने वालों में नहीं है," मैंने कहा। "वो मारने वालों में है। पर आज उसने मारने वालों से मुँह मोड़ लिया।"
हम सड़क पर चल पड़े। कुछ दूर चलने के बाद मैंने कहा, "टिंकू, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"तूने कभी सोचा है — तेरे पापा को भी उसी पानी से मारा गया? भैरव के ज़हर से?"
टिंकू रुक गया। उसने मेरी तरफ़ देखा।
"मैंने सोचा है," उसने धीरे से कहा। "हर रात सोचता हूँ। पर मेरे पापा तो अखाड़े के पहलवान नहीं थे। वो तो रसोइया थे।"
"फिर वो क्यों मरे?"
"डॉक्टर ने कहा था — कमज़ोरी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "कमज़ोरी?"
"हाँ। वो कुछ दिन बीमार रहे, फिर एक सुबह उठे ही नहीं। माँ ने बहुत रोया। मैं उस वक़्त छोटा था।"
"और उस वक़्त भैरव अखाड़े का मैनेजर था?"
"हाँ।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"टिंकू, तेरे पापा भी उसी पानी से मरे होंगे। भैरव ने हर उस आदमी को मारा जो उसके राज़ के करीब आया। तेरे पापा रसोइया थे, पर वो अखाड़े के अंदर थे। वो कुछ देख सकते थे। कुछ सुन सकते थे।"
टिंकू की आँखें भर आईं। उसने मुँह फेर लिया। कुछ देर बाद बोला, "तो मैं भी उस दिन अलमारी के सामने खड़ा रहूँगा।"
"हाँ, तू खड़ा रहेगा।"
हम चलते रहे।
शाम को घर पहुँचा तो मीरा बैठी थी। आँगन में। माँ के पास। दोनों के बीच एक कटोरी थी जिसमें सोंठ और काली मिर्च थी। मीरा माँ के हाथ पर हल्की मालिश कर रही थी।
मैं दरवाज़े पर रुक गया।
ये दृश्य मैंने सपने में भी नहीं सोचा था — मेरी माँ और मीरा, एक आँगन में, एक-दूसरे के हाथ पकड़े।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा।
"कहाँ था?"
"दफ़्तार में," मैंने कहा। "हरनाम के पास।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "और?"
"अलमारी का ताला खुलेगा," मैंने कहा। "तीन दिन बाद।"
माँ ने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने माँ की तरफ़। फिर दोनों ने मेरी तरफ़।
"कैसे?" मीरा ने पूछा।
मैंने सब बताया। हरनाम का बाप। रघुवीर का गिलास। बीस साल का डर। अलमारी की परत। शर्त।
जब मैं ख़त्म हुआ तो मीरा ने कहा, "उस पर भरोसा क्यों?"
"क्योंकि उसने रोते वक़्त सच बोला था," मैंने कहा। "झूठ बोलने वाला चश्मा नहीं पोंछता।"
माँ ने धीरे से कहा, "कभी-कभी सबसे बड़ा सच वो आदमी बोलता है जिसने सबसे बड़ा झूठ जिया हो।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "और अगर वो धोखा दे?"
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