Spirit of a Fighter1019 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1019

6 min read November 5, 2026

मैंने ज़मीन पर पड़े काग़ज़ात उठाए। उनमें से एक पर मेरा नाम लिखा था। "वीर सिंह — गवाह।"

«ये आज की तारीख़ का काग़ज़ है,» मीरा ने कहा। «अदालत के काग़ज़ात में मेरा नाम है, तेरा नाम है। हमारी गवाही का वक़्त सुबह दस बजे है। और अभी…» उसने अपनी घड़ी देखी। «अभी नौ बजकर पच्चीस मिनट हुए हैं।»

«तो अदालत क्यों खुली है? पच्चीस मिनट पहले?»

उसी वक़्त पीछे से एक आवाज़ आई।

«क्योंकि मैंने खुलवाई है।»

हम दोनों पलटे।

दरवाज़े पर एक आदमी खड़ा था। लंबा, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में पीली शीशी। उम्र पचास से ऊपर। चेहरा ऐसा जैसे किसी ने पत्थर पर चमड़ी खींच दी हो। आँखें छोटी, पर उनमें वो सन्नाटा था जो क़त्ल के बाद आता है।

«तुम कौन हो?» मैंने पूछा।

«मैं वही हूँ,» उसने कहा, «जिसका नाम तुम्हारी भवानी देवी ने उस डायरी में नहीं लिखा।»

«मोहन?»

उसने मुस्कुराने की कोशिश की। «मोहन मेरा नाम नहीं है। मोहन मेरी परछाई है। मेरा नाम तुम्हारे पिता ने दिया था। भवानी ने दिया था। वो मुझे 'विक्रम' बुलाते थे।»

मेरे पैर के नीचे ज़मीन खिसक गई।

«विक्रम?» मीरा ने कहा। «विक्रम तो ठाकुर का बेटा था।»

«और ठाकुर का नाम क्या था? कभी सोचा?» उसने अपनी शीशी हिलाई। «ठाकुर का नाम मोहन था। मोहन सिंह। पिता और बेटा दोनों एक ही खेल खेल रहे थे — बस नाम बदल-बदलकर।»

«तो तुम ठाकुर के बेटे हो?» मैंने पूछा।

«मैं ठाकुर हूँ,» उसने कहा। «मेरा बाप मर चुका है। मैं उसका काम पूरा करने आया हूँ।»

कमरा चुप हो गया। मैंने अपनी मुट्ठी भींची। मेरी हथेली में पसीना आ गया था।

«तुमने मेरे पिता को मारा?» मेरी आवाज़ निकली।

«मैंने नहीं मारा,» उसने कहा। «मैंने उन्हें एक रास्ता दिया था। वो रास्ता चुनने से इनकार कर गए। बस।» उसने शीशी आगे की। «ये पानी तुम्हारे पिता ने खुद अपने पहलवानों को दिया था। पहले वो मज़बूत करता है। फिर तोड़ता है। भवानी को लगा था कि शीशी उनके हाथ में है, पर शीशी हमेशा मेरे हाथ में थी।»

मीरा आगे आई। «ये सब अदालत में साबित करो।»

«अदालत?» उसने हँसा। «ये अदालत मेरी है, बेटा। जज, वकील, मुंशी — सब मेरे। तुम डायरी लेकर आए हो, है ना? लाओ, देखूँ।»

कमला देवी पीछे दरवाज़े पर खड़ी थीं। उन्होंने डायरी अपनी छाती से लगाई हुई थी। उनकी आँखें विक्रम पर टिकी थीं।

«विक्रम,» उन्होंने कहा। «तेरे पिता ने मेरी बहन को मारा। तूने भवानी को मारा। अब तू अपने ही बेटे के सामने खड़ा है।»

वो हँसा। «बेटा? भवानी का बेटा मेरा बेटा नहीं। भवानी मेरा भाई था, मेरा दुश्मन नहीं।»

«भवानी तेरा भाई था?» मैंने कहा। मेरी आवाज़ काँप गई।

«सौतेला,» उसने कहा। «मेरे पिता ने भवानी की माँ से दूसरी शादी की थी। भवानी हमारे घर की शर्म था। वो मिट्टी में खेलता था, हमारे नाम पर धब्बा था। मैंने उसे साफ़ करने की कोशिश की। उसने मेरी शीशी नहीं मानी। तो मैंने उसे साफ़ कर दिया।»

«और तेरे पिता?» कमला देवी ने पूछा।

«पिता जी को मैंने नहीं मारा। वो खुद मर गए। शीशी का पानी उन्हें पीते देख लिया था। अपनी ही शराब में डूब गए।»

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी — डर नहीं, बस साफ़ दिमाग़।

«वीर,» उसने धीरे से कहा, «ये आदमी अकेला नहीं है। कोई और भी है। दरवाज़े के बाहर।»

मैंने पीछे देखा। अँधेरे में दो परछाइयाँ हिल रही थीं।

«तुम्हारे साथी?» मैंने विक्रम से पूछा।

«मेरे पहलवान,» उसने कहा। «वही जिन्हें तुम्हारे पिता ने शीशी से बनाया था। अब वो मेरे हैं।»

फिर उसने शीशी खोली और उसका ढक्कन हटाया। पीली भाप उठी। मेरे नाक में वो गंध भर गई। मेरा सिर घूमा।

«वीर!» मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।

मैंने अपने दाँत भींचे। मैंने अपनी जेब से गुड़िया की मिट्टी की थैली निकाली। मुट्ठी में भरी और मुट्ठी बंद कर ली।

«क्या कर रहा है?» विक्रम ने पूछा।

«मेरे पिता की मिट्टी,» मैंने कहा। «तुम्हारे पानी से ज़्यादा मज़बूत है।»

मैंने अपनी मुट्ठी खोली और मिट्टी हवा में उड़ा दी। मिट्टी उसकी आँखों में गई। वो चीखा और पीछे हटा। शीशी उसके हाथ से छूटी और ज़मीन पर गिरी। काँच टूटा, पीला पानी फर्श पर फैल गया।

उसी वक़्त कमला देवी ने अपनी लाठी ज़मीन पर मारी। ज़ोर से। आवाज़ इतनी बड़ी थी कि दरवाज़े पर खड़ी परछाइयाँ रुक गईं।

«भागो!» उन्होंने कहा। «अगर तुममें से किसी ने भी भवानी का नमक खाया है, तो भागो!»

परछाइयाँ हिलीं। एक आगे आई। उसका चेहरा अब रोशनी में था। वो लुट्टन था, वही पहलवान जिसे मैंने अखाड़े में देखा था। उसकी आँखें पीली थीं।

«लुट्टन,» मैंने कहा। «ये तुम्हें मार डालेगा। जैसे भवानी को मारा।»

वो रुका। उसकी आँखों में कुछ बदला।

«मैं… मैं नहीं जानता था,» वो बोला। «उसने कहा था… शीशी मुझे ताक़त देगी…»

«वो झूठ है,» मैंने कहा। «वो तुम्हें खोखला कर रहा है। मेरे पिता ने इसे रोकने की कोशिश की और इसने उन्हें मार दिया।»

लुट्टन के हाथ काँपने लगे।

पीछे से विक्रम उठा। उसकी आँखों में मिट्टी थी और गुस्सा।

«लुट्टन,» उसने कहा, «ये लड़का झूठ बोल रहा है। इसे पकड़ो।»

लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा। फिर विक्रम की तरफ़।

«मैंने तुम्हारे लिए एक आदमी को मारा था,» लुट्टन ने धीरे से कहा। «मुझे नहीं पता था। अब पता है।»

वो पलटा और दरवाज़े से बाहर चला गया। दूसरी परछाई भी उसके पीछे चली गई।

कमरा खाली हो गया। बस विक्रम बचा, ज़मीन पर घुटनों के बल, शीशी के टुकड़ों के बीच।

मीरा ने अपना फ़ोन निकाला। «पुलिस आ रही है। मैंने अंदर आने से पहले मैसेज कर दिया था।»

विक्रम हँसा। «पुलिस? मेरी पुलिस।»

«नहीं,» मीरा ने कहा। «अब तुम्हारी नहीं। क्योंकि अब तुम्हारे पास शीशी नहीं है। और बिना शीशी तुम एक बूढ़े आदमी हो जिसके हाथ में कुछ नहीं।»

वो उठा। उसकी आँखें मेरी तरफ़ थीं।

«तुम्हारे पिता ने भी ऐसा ही सोचा था,» उसने कहा। «वो भी जीत के करीब आकर हार गए।»

«मेरे पिता हारे नहीं,» मैंने कहा। «उन्होंने मुझे छोड़ा। वो हार नहीं है।»

कमला देवी आगे आईं। उन्होंने डायरी खोली। «विक्रम, तेरे पिता ने भवानी से एक वादा लिया था। भवानी ने उसे निभाया। तूने नहीं।»

वो कुछ कहने ही वाला था कि बाहर से सीटी बजी। पुलिस की। फिर जूतों की आवाज़।

वो भागने के लिए पलटा, पर कमला देवी ने अपनी लाठी उसके पैरों के बीच डाल दी। वो गिरा। मैं उसके ऊपर झुका और मेरी मुट्ठी उसकी कमीज़ पर जा लगी।

«तुम्हारा नाम मोहन है,» मैंने कहा। «याद रखना। यही नाम अदालत के काग़ज़ात में जाएगा। और तुम्हारे बेटे को भी यही नाम मिलेगा।»

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पहली बार डर था। सच्चा डर।

पुलिस अंदर आई। हथकड़ी लगी। वो उठाया गया।

मीरा मेरे पास आई। उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी हथेली ठंडी थी।

«तेरे हाथ काँप रहे हैं,» उसने कहा।

«पता है,» मैंने कहा। «पर अब पहले जैसे नहीं।»

हम बाहर आए। आँगन में माँ खड़ी थीं। गुड़िया उनकी साड़ी पकड़े हुई थी। टिंकू अपनी टोपी पहनकर फिर से खड़ा था। कालू काका ने अपनी लाठी उठाई और उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया।

«तेरे पिता की लाठी,» उन्होंने कहा। «अब तेरी।»

मैंने लाठी पकड़ी। वो भारी थी। हथेली में गरम लगी।

कमला देवी ने अपनी डायरी मेरी तरफ़ बढ़ाई।

«ये तेरी है,» उन्होंने कहा। «भवानी ने इसे किसी को नहीं दिया था। अब इसे तू रख।»

मैंने डायरी ली। उसका कवर पुराना था, कोना मुड़ा हुआ। मैंने उसे खोला। आख़िरी पन्ना। वही लिखाई।

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