Spirit of a Fighter – Chapter 1016
हरनाम की आँखों में पानी आया। उसने अपनी हथेली से चेहरा ढका और रोया। मैंने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। रोने दिया। कुछ आँसू सिर्फ़ इसलिए बहते हैं ताकि उनके बाद आदमी साफ़ होकर खड़ा हो सके।
तभी आँगन की मिट्टी पर हल्की चप्पलों की आहट आई। मीरा आई, बाल बिखरे, कंधे पर शॉल। उसने हरनाम को देखा, फिर मुझे। बिना कुछ पूछे वो मेरे पास आई, चिट्ठियाँ पढ़ीं, और उसका चेहरा कठोर हो गया।
«तो वो हमारे डर का इंतज़ार कर रहा है।» उसने चिट्ठी मेज़ पर रखी। «वो चाहता है कि हम गवाही वापस ले लें, या गवाही देने से पहले ही डर जाएँ।»
«और अगर हम न डरें?» मैंने पूछा।
«तो हमें डर का रास्ता बदलना होगा।» मीरा ने कहा।
वो मेरे सामने बैठ गई, और मैंने देखा कि उसकी आँखों में वो चमक थी जो अदालत में होती थी — जब वो कोई योजना बना रही होती थी।
«वो हमें डराकर अदालत से दूर रखना चाहता है,» मीरा ने कहा। «तो हम गवाही छुपकर नहीं देंगे। खुलेआम देंगे। इतने खुले कि पूरा रामपुर देखे।»
«कैसे?»
«कल सुबह अदालत में सिर्फ़ हम नहीं होंगे। पूरा गाँव होगा। अदालत के बाहर, दरवाज़े से लेकर सड़क तक, खड़ा होगा। अगर ठाकुर या उसका कोई आदमी गवाह को छूने की कोशिश करेगा, तो पूरा गाँव देखेगा। और वो इतने लोगों के सामने कुछ नहीं कर सकता।»
«पर गाँव डरेगा,» हरनाम ने कहा, आवाज़ सूखी।
«गाँव आज भी डरा हुआ है,» मीरा ने कहा। «फर्क बस ये है कि आज वो अकेला डर रहा है। कल वो सब साथ डरेगा — और जब सब साथ डरते हैं, तो डर आधा हो जाता है।»
कालू काका ने अपनी लाठी ज़मीन पर टेक दी। «मैं चलूँगा। घर-घर। सुबह होने से पहले।»
«अकेले क्यों?» पीछे से आवाज़ आई।
हम सब पलटे। सुक्खी बुआ फाटक पर खड़ी थीं, चमकीली साड़ी में, हाथ में पान का बीड़ा। उनके पीछे गुड़िया खड़ी थी, आँखें सूजी हुईं, पर चेहरे पर वो ज़िद थी जो माँ के चेहरे पर होती है।
«मैंने सब सुना,» सुक्खी बुआ ने कहा, और अंदर आकर बीच में खड़ी हो गईं। «और मैं एक बात कहूँ? मैं बीस साल से इस गाँव की हर बात पहले जानती हूँ, हर बात बढ़ा-चढ़ाकर बताती हूँ। आज पहली बार मुझे कुछ बढ़ा-चढ़ाकर बताने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। क्योंकि आज सच खुद इतना बड़ा है कि उसे बढ़ाना नहीं पड़ेगा।»
«बुआ, तुम्हें पता है कि इससे तुम्हारी जान को ख़तरा है?» मैंने पूछा।
«अरे मैंने तो सुना है कि वीर अदालत में ठाकुर को नीचा दिखाएगा!» वो ज़ोर से बोलीं, और फिर धीमे से हँसकर कहा, «और जब सुक्खी बुआ कुछ सुन लेती हैं, तो पूरा रामपुर सुन लेता है। सुबह होते-होते हर आँगन में यही बात होगी — कि वीर सिंह आज अदालत में ठाकुर की सारी करतूत खोलेगा। और जो आदमी ये सुनकर भी घर में न बैठे, वो खुद को गाँव का नहीं कह सकता।»
मैंने उनकी तरफ़ देखा और मेरे अंदर कुछ हिला। ये वही औरत थी जिसे मैं हमेशा हँसी का ज़रिया समझता था। आज वो सबसे ठोस दीवार बनकर खड़ी थी।
«ठीक है,» मैंने कहा। «तो तय हुआ। सुबह होते ही हम सब निकलेंगे। कालू काका रास्ता जानते हैं, सुक्खी बुआ गाँव जगाएँगी, टिंकू रामाधार को लाएगा, और मैं…»
«और तू?» मीरा ने पूछा।
«मैं तहखाने जाऊँगा।»
सब चुप हो गए।
«अभी? रात के इस वक़्त?» हरनाम ने कहा।
«हाँ। उस चिट्ठी ने मुझे याद दिलाया कि मैं सिर्फ़ काग़ज़ों पर नहीं लड़ रहा। मैं उस मिट्टी का बेटा हूँ। और मुझे उससे हिम्मत माँगनी है।»
«मैं साथ चलूँगी,» मीरा ने कहा।
«नहीं।» मैंने उसकी तरफ़ देखा। «तुम यहाँ रहो। अगर मैं सुबह तक न लौटूँ, तो कालू काका को सब बता देना। और अदालत मत छोड़ना।»
उसकी आँखों में गुस्सा आया, फिर वो नरम पड़ गई। «तू ऐसा क्यों करता है, वीर? हर बार अकेले।»
«क्योंकि ये मेरे पापा की मिट्टी है,» मैंने कहा। «और कोई बेटा अपने पापा से मिलने किसी को साथ नहीं ले जाता।»
वो कुछ नहीं बोली, बस मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने अपनी शॉल खोली और मेरे कंधों पर डाल दी।
«ठंड है,» उसने कहा, और आवाज़ में वो नरमी थी जो वो कभी-कभार ही दिखाती थी। «जल्दी लौट।»
मैंने सिर हिलाया और निकल पड़ा।
अखाड़े तक का रास्ता मुझे पता था — पर आज रास्ता अलग लग रहा था। नीम के पेड़ों की परछाइयाँ ज़मीन पर ऐसे फैली थीं जैसे किसी ने काला कपड़ा बिछा दिया हो। मैं चलता रहा, और मेरे कदमों की आवाज़ मेरे साथ चलती रही।
अखाड़े का पिछला हिस्सा। कुआँ। वो पत्थर जिसे कालू काका ने सरकाया था, अब भी हिला हुआ था। मैंने उसे और सरकाया और सीढ़ियों से नीचे उतरने लगा।
नीचे अंधेरा था, पर मेरी नाक को रास्ता दिखाने की ज़रूरत नहीं थी। मुझे तहखाने की मिट्टी की गंध याद थी — गीली, ठंडी, और उसमें एक हल्की सी मिठास, जैसे बरसात के बाद की मिट्टी।
मैं नीचे पहुँचा। लालटेन जलाई। रोशनी दीवारों पर फैली, और मैंने वो दीवार देखी जिस पर पापा का मिटाया हुआ नाम था। मैंने हाथ बढ़ाया और उस जगह को छुआ।
«पापा,» मैंने धीरे से कहा। मेरी आवाज़ तहखाने में गूँजी और लौटकर मुझे सुनाई दी।
मैं घुटनों के बल बैठ गया। मिट्टी ठंडी थी। मैंने उसे अपनी हथेली में उठाया और माथे पर लगाया।
«कल मैं तुम्हारे लिए लड़ूँगा। पर मुझे डर लग रहा है। वो आदमी जो चिट्ठी लिख रहा है — वो हमारे बीच है। मुझे पता नहीं कौन है। और मुझे ये भी डर है कि कहीं मैं हार गया तो…»
मेरी आवाज़ रुक गई। मैंने मिट्टी को मुट्ठी में भींचा।
«तुमने जो किया, पापा — मेरी जान बचाने के लिए खुद ज़हर पिया। मैं वो कर्ज़ कभी नहीं चुका सकता। पर मैं वादा करता हूँ, तुम्हारा अखाड़ा किसी की जागीर नहीं बनेगा।»
और तभी मुझे पीछे सीढ़ियों पर पैरों की आहट सुनाई दी।
मैं उठा, हाथ में लालटेन। सीढ़ियों से कोई उतर रहा था — धीरे-धीरे, एक-एक कदम।
«कौन?» मैंने कहा, और मेरी आवाज़ तेज़ थी।
कोई जवाब नहीं। कदम रुके। और फिर रोशनी में एक चेहरा आया।
माँ।
उनके हाथ में एक छोटा दीया था। उनके बाल खुले थे, माथे पर हल्दी का टीका था, और आँखों में वो चमक थी जो मैंने बचपन में देखी थी — जब वो रात को मेरे सिरहाने बैठकर मेरी बीमारी में जागती रहती थीं।
«माँ?» मैंने कहा। «तुम यहाँ कैसे?»
वो नीचे उतरीं और मेरे पास आकर खड़ी हो गईं। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरे सिर पर हाथ रखा।
उनका हाथ ठंडा था, और उसमें चक्की की गंध थी — आटे की, मेहनत की।
«मुझे पता था तू यहाँ आएगा,» उन्होंने कहा। «तू अपने पापा जैसा है। वो भी हर बड़ी लड़ाई से पहले इसी मिट्टी में आकर बैठता था।»
«माँ, तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए। कोई देख लेगा तो…»
«कोई नहीं देखेगा,» उन्होंने कहा। «और अगर देख भी ले, तो क्या? मैं अपने बेटे के पास आई हूँ। उसके लिए दुआ माँगने।»
उन्होंने मेरे दोनों कंधे पकड़े और मेरी आँखों में देखा। उनका हाथ काँप रहा था — पर उनकी आवाज़ नहीं।
«भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा।» उन्होंने कहा। «और तेरे पापा की दुआ आज भी उसी मिट्टी में दबी है। उसे बाहर लाने का वक़्त आ गया।»
मेरी आँखें भर आईं। मैंने उनके हाथ चूमे। उनकी हथेली पर चक्की के छाले थे, और उन छालों की गर्मी मेरे होंठों पर लगी।
«डर लग रहा है, माँ,» मैंने कहा, और अपनी आवाज़ छोटी लगी — जैसे बचपन में, जब रात को बुखार में उन्हें जगाता था।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno