Spirit of a Fighter – Chapter 1015
«अगली सुनवाई में जो भी गवाही देगा, उसका परिवार नहीं बचेगा।»
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
«कौन-सी स्याही है?» मैंने पूछा।
«नई नहीं है,» उसने कहा। «ये स्याही पुरानी है — दस-बारह साल पुरानी। इस पर वक़्त की परत जमी है।»
«यानी ये चिट्ठी आज नहीं लिखी गई।»
«नहीं। ये लिखी गई थी जब ठाकुर और भैरव का डर अपने सबसे ऊँचे मुकाम पर था। और आज इसे कोई… कोई फेंककर गया है।»
«कोई?» मैंने कहा। «या वो चौथी परछाई?»
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। «तुम क्या कह रहे हो?»
«मैं कह रहा हूँ कि वो हमें डराने नहीं आया था। वो हमें चेताने आया था। कोई उनके साथ खड़ा है, पर उनका नहीं है। कोई उनके बीच है, और उन्हीं से लड़ रहा है।»
«कौन?»
«यही तो सवाल है।» मैंने चिट्ठी मोड़ी और अपनी जेब में रखी। «और अगली सुनवाई से पहले मुझे इसका जवाब ढूँढना है। क्योंकि अगर ये चेतावनी सच है, तो कल का दिन हमारे लिए नहीं, उस गवाह के लिए आख़िरी हो सकता है जो अदालत में खड़ा होगा।»
टिंकू पीछे से आया। उसके हाथ में अब भी डिब्बी थी। «भैया, मैं रामाधार को खुद लाऊँगा। और मैं वादा करता हूँ, वो अदालत तक पहुँचेगा — ज़िंदा।»
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। «तू अकेला नहीं जाएगा।»
«तो कौन जाएगा?»
«हम सब जाएँगे। कल सुबह, पहली किरण से पहले।»
कालू काका उठे। उन्होंने अपनी लाठी उठाई और कहा, «मैं उस मकान को जानता हूँ। बीस साल पहले वहाँ भैरव की बुआ रहती थी। उसके पीछे एक तंग गली है जो सीधे बगिया की दीवार तक जाती है। हम वहाँ से जाएँगे।»
«और अगर वहाँ भी ठाकुर के आदमी हों?» मीरा ने पूछा।
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो चमक लौट आई थी जो पहले आँगन में आई थी।
«तो उन्हें फिर से मिठाई सूंघनी पड़ेगी,» उन्होंने कहा।
टिंकू ने अपनी डिब्बी की तरफ़ देखा, और फिर उसने कुछ सोचकर डिब्बी खोली। अंदर बर्फ़ी की परत के नीचे, सबसे नीचे, काग़ज़ की एक पतली नकल रखी थी — वो नकल जो हरनाम ने बनाई थी।
«मैं इसे अपने पास रखूँगा,» उसने कहा। «जो इसे लेने आएगा, उसे पहले मेरी मिठाई खानी पड़ेगी।»
«और अगर वो खा ले?» मैंने पूछा।
«तो वो मर जाएगा।» टिंकू ने सीधे मुँह कहा। «क्योंकि इन बर्फ़ियों में मैंने वो मिर्ची डाली है जो तेरे लिए लाई थी — तीखी वाली।»
मैं उसे देखता रह गया। और फिर हम सब हँसे — माँ, गुड़िया, कालू काका, मीरा, और मैं। आँगन में वो हँसी गूँजी, और उस हँसी में आज का पूरा डर घुल गया।
रात के तीसरे पहर में जब सब सो गए, मैं आँगन में अकेला बैठा था। चिट्ठी मेरी जेब में थी, और उसकी गंध मेरे हाथों से आ रही थी। कपूर, हल्दी, बादाम का तेल।
मुझे याद आया — उस दिन हवेली में, जब गंगा देवी ने पीतल की संदूक खोली थी। उस संदूक की मिट्टी में भी यही गंध थी। और उस दिन वीर ने सोचा था कि वो गंध गंगा देवी की है।
पर आज वो गंध उस चौथी परछाई के हाथ से आ रही थी।
«तो वो तुम हो,» मैंने धीरे से कहा, अंधेरे से। «तुम गंगा देवी नहीं हो। तुम कोई और हो। और तुम उनके बीच रहकर उन्हीं के खिलाफ़ खेल रही हो।»
कोई जवाब नहीं आया। पर दूर, नीम के पेड़ के पीछे से, किसी के चलने की आवाज़ आई — रुक-रुककर, धीमी, जैसे कोई ठीक से चल नहीं पा रहा हो।
और फिर वो आवाज़ भी मिट गई।
मैंने अपनी मुट्ठी भींची। कल सुबह रामाधार को लाना था, और उसके साथ वो राज़ भी लाना था जो बीस साल से इस गाँव की मिट्टी में दबा था।
अगली सुनवाई में सिर्फ़ काग़ज़ नहीं बोलने वाला था। कुछ और भी बोलने वाला था।
और उससे पहले, मुझे उस आवाज़ वाले को ढूँढना था — उससे पहले कि वो मुझे ढूँढ ले।
॥
नीम के पेड़ के पीछे से चलने की जो आवाज़ आई थी, वो मिट गई — पर उसके पीछे जो सन्नाटा आया, वो आवाज़ से भी ज़्यादा डरावना था। मैं आँगन में खड़ा रहा, कान तने हुए। पत्तों की सरसराहट भी नहीं। बस मेरी अपनी साँस, और दूर किसी कुत्ते के रोने की धीमी आवाज़।
मैंने चिट्ठी फिर खोली। चाँदनी में उसके अक्षर चमक रहे थे, जैसे किसी ने स्याही में राख मिलाकर लिखा हो। "तेरे पिता की कब्र पर आ जा। अकेला।" और नीचे, उसी हाथ से, एक छोटी लाइन — "वरना अगला काग़ज़ तेरी बहन की कॉपी का पन्ना होगा।"
मेरा हाथ काँपा। कॉपी का पन्ना। गुड़िया की कॉपी — जो मुझे नहर किनारे घास में मिली थी, जिस पर उसने लिखा था "भैया, मत आना।" यानी जो चिट्ठी लिख रहा है, वो जानता है कि मैंने वो कॉपी पढ़ी है। वो मेरे बहुत करीब है।
मैं अंधेरे में खड़ा सोच रहा था कि पीछे से पैरों की आहट आई। हल्की, धीमी, पर मुझे गंध बता चुकी थी — गीली मिट्टी और पुरानी लकड़ी की लाठी। कालू काका।
«सोया नहीं?» उन्होंने धीमे से पूछा।
«नींद कहाँ आएगी, काका।» मैंने चिट्ठी उनकी तरफ़ बढ़ाई। «पढ़ो।»
उन्होंने लालटेन जलाई। उस पीली रोशनी में उनका चेहरा और भी झुर्रीदार लग रहा था। वो चिट्ठी पढ़ते रहे, होंठ हिलते रहे, और फिर उन्होंने काग़ज़ मोड़कर मुझे लौटा दिया।
«ये लिखाई मैंने पहले देखी है,» उन्होंने कहा।
«कहाँ?»
«उस रात।» उनकी आवाज़ भारी हो गई। «जब भवानी सिंह की लाश अखाड़े के फाटक पर लेटी थी, उसकी जेब से एक काग़ज़ निकला था। पुलिस ने ज़ब्त कर लिया। पर उससे पहले मैंने एक नज़र डाली थी। उस पर भी यही लिखाई थी। वही घुमाव, वही झुकाव।»
«यानी ये वही आदमी है जिसने पापा की लाश के पास काग़ज़ छोड़ा था।»
«या वही औरत,» कालू काका ने कहा, और उन्होंने लालटेन नीचे कर दी।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। «तुम्हें क्या लगता है, काका?»
«मुझे लगता है कि गंगा देवी को बदनाम किया जा रहा है। जो भी ये लिख रहा है, वो चाहता है कि हम गंगा देवी को दुश्मन समझें। क्योंकि जब हम उन्हें देखते हैं, तो असली दुश्मन हमारी आँखों के सामने से गुज़र जाता है।»
उनकी बात सीधी दिल में लगी। मैंने चिट्ठी जेब में रखी और आँगन के फाटक की तरफ़ देखा। बाहर अंधेरा था, पर उस अंधेरे में एक आदमी की परछाई खड़ी थी — कोई बाहर से सब सुन रहा था।
«कौन है?» मैंने आवाज़ तेज़ की।
परछाई हिली। फाटक खुला, और एक आदमी अंदर आया — पतला, झुका हुआ, हाथ में एक फटा बस्ता। लालटेन की रोशनी में उसका चेहरा दिखा। हरनाम।
उसके कपड़े धूल से भरे थे, आँखें लाल, और होंठ सूखे फटे हुए। वो सीधे मेरे पास आया, और मेरे पैरों के पास बैठ गया।
«वीर,» उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो दम नहीं था जो अदालत में था। «मैं गवाही नहीं दे सकता।»
«क्यों?»
«क्योंकि मेरा गोलू है।» उसने अपना बस्ता खोला और उसमें से एक पीली चिट्ठी निकाली। «आज रात कोई मेरे घर की छत पर चढ़कर ये फेंक गया। गोलू सो रहा था। उसके सिरहाने ये पड़ी थी।»
मैंने लिया। उस पर बस एक लाइन थी — "गवाही देगा तो गोलू को वापस सिर्फ़ माँ का दूध पीने के लिए मिलेगा।"
मेरे पेट में ठंडा पत्थर सा गिरा। ये वही हाथ था। वही स्याही, वही राख की गंध।
«हरनाम भाई,» मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा, «अगर तुम आज नहीं बोले, तो कल कोई और गोलू होगा। किसी और का बेटा। वो इसी तरह धमकाएगा, और सब चुप रहेंगे। और भैरव फिर बीस साल राज करेगा।»
«मुझे अपने बेटे से मतलब है, वीर। मुझे दुनिया की परवाह नहीं।»
«और मुझे अपने पापा से मतलब है,» मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भारी हो गई। «जो इसी डर से मरे कि कोई नहीं बोलेगा। तुम्हारा गोलू ज़िंदा है, हरनाम भाई। मेरे पापा नहीं हैं। अगर तुम आज चुप रहे, तो कल गोलू को यही सिखाओगे — डर के आगे झुक जाना। तुम चाहते हो गोलू ऐसा आदमी बने?»
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