Spirit of a Fighter1014 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 1014

7 min read November 5, 2026

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसने डिब्बी को छाती से लगाए हुए ही धीरे से कहा, «भैया, मेरे घुटने काँप रहे हैं।»

«मेरे भी।»

वो हँसा। «तो तूने इतनी हिम्मत से बात कैसे की?»

«मैंने सोचा, अगर घुटने काँप रहे हैं, तो कम से कम आवाज़ तो न काँपे।»

माँ पास आईं। उन्होंने मेरा माथा चूमा, और फिर टिंकू का। उन्होंने कुछ नहीं कहा — बस मेरे गाल पर हाथ रखा, जो पसीने से भीगा था, और फिर रसोई की तरफ़ चली गईं। जाते-जाते उन्होंने कहा, «चाय बनाती हूँ। आज सब पिएँगे।»

गुड़िया ने अपनी कॉपी खोली और उसमें कुछ लिखने लगी। कालू काका ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और आँगन के बीच में ही बैठ गए, जैसे उनके पैर अब जवाब दे चुके हों।

«कालू काका,» मैंने कहा और उनके पास बैठ गया। «तुम ठीक हो?»

«ठीक हूँ,» उन्होंने कहा, पर उनकी आवाज़ धीमी थी। «बस… बीस साल में पहली बार लाठी उठाई। पता नहीं, अच्छा किया या बुरा।»

«अच्छा किया।»

«हो सकता है आज रात वो लोग लौटकर आएँ।»

«नहीं आएँगे,» मैंने कहा।

«कैसे पता?»

«क्योंकि उन्हें लगता है कि काग़ज़ की तीन कॉपियाँ हैं, और उन्हें कभी पता नहीं चलेगा कि असली किसके पास है। जो आदमी सोच में पड़ जाए, वो लौटकर नहीं आता — वो पहले जाँच करता है, और जाँच में वक़्त लगता है। और वक़्त हमारे पास है।»

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो बात थी जो अब मैं पहचानने लगा था — वो बात जो वो मुझमें ढूँढते थे, शायद उस नौजवान के चेहरे में जिसे उन्होंने बीस साल पहले देखा था।

«तू अपने पापा जैसा बोलता है,» उन्होंने कहा। «भवानी भी ऐसे ही कहता था — 'वक़्त हमारे पास है।' और फिर…»

«और फिर वो मर गए,» मैंने कहा। «पर कालू काका, वो इसलिए मरे क्योंकि उनके पास गवाह नहीं थे। मेरे पास हैं।»

वो चुप हो गए।

मीरा उसी वक्त अंदर से बाहर आई। उसके हाथ में काग़ज़ था — वो काग़ज़ जो हरनाम ने हमें दिया था — और उसके किनारे अभी भी गीले थे, जैसे किसी ने अभी-अभी उसकी कॉपी बनाई हो।

«कब बनाई तूने?» मैंने पूछा।

«जब तुम उनसे बात कर रहे थे।» उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। «मैंने सोचा, अगर ये लोग ज़बरदस्ती लेने आएँ, तो कम से कम असली को बचा लूँ। पीछे के कमरे में रख दिया है, अलमारी के ऊपर, जिस खाँचे में गुड़िया की किताबें हैं।»

«तूने मुझे क्यों नहीं बताया?»

«क्योंकि तुम उस वक्त उनसे लड़ रहे थे, और मैं तुम्हें बीच में नहीं रोकना चाहती थी।» उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चमक थी जो मुझे रोज़ नई लगती थी। «वैसे भी, तुम्हारी बातें सुनने में मज़ा आ रहा था। वो वाली बात — 'तेरे पीछे ठाकुर है, और ठाकुर के पीछे कौन है।' तुमने उसका नाम क्यों नहीं लिया?»

«क्योंकि मुझे नहीं पता,» मैंने सच बोल दिया।

वो हँसी। «तो तूने झूठ बोला?»

«मैंने कहा कि मैं जानता हूँ। मैंने नाम नहीं लिया। बात सच होने और झूठ होने के बीच में कभी-कभी बस इतना ही फ़र्क़ होता है।»

«तुम नाटकीय हो, वीर सिंह।»

«तुम्हारी नकल कर रहा था।»

उसने मेरे कंधे पर हल्का-सा हाथ मारा। फिर उसकी नज़र फाटक की तरफ़ गई, और उसकी मुस्कान कुछ धीमी पड़ गई।

«वो चौथी परछाई,» उसने धीरे से कहा। «वो कौन था?»

«पता नहीं। पर उसके हाथ में पीली शीशी थी।»

«यानी वो हमें डराने नहीं, देखने आया था।»

«हाँ।»

«और जब उसने देखा कि उसके तीन आदमी डर गए, तो वो चुपचाप चला गया।»

«हाँ।»

मीरा ने अपनी कलाई पर हाथ रखा, जैसे वो कुछ सोच रही हो। फिर उसने कहा, «वो हमें परख रहा था। ये देख रहा था कि हम डरते हैं या नहीं। अगर हम डर जाते, तो वो शायद अंदर आ जाता। पर हम नहीं डरे।»

«मैं तो डरा था।»

«पर तुमने दिखाया नहीं। यही फ़र्क़ है।»

माँ चाय लेकर आईं। पाँच गिलास — मेरा, टिंकू का, मीरा का, कालू काका का, और गुड़िया का। और उनके अपने लिए एक और। पहली बार उन्होंने किसी के आने पर भी छह गिलास निकाले थे — जैसे उन्हें यक़ीन हो गया हो कि आज कोई नहीं जाएगा।

हम आँगन में बैठ गए। चाय में अदरक थी, और उसकी भाप में वो गंध थी जो बचपन से मेरे साथ थी।

«अगली सुनवाई कब है?» कालू काका ने पूछा।

«परसों,» मीरा ने कहा। «वकील मैडम कल सुबह आएँगी। उन्होंने कहा है कि इस बार हम गवाह पहले से तैयार रखेंगे। रामाधार को हमें खुद लाना होगा — पता है उसे ठाकुर ने छुपा दिया है।»

«रामाधार को मैं लाऊँगा,» टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो गंभीरता थी जो पहले नहीं थी। «वो हर रोज़ सुबह चार बजे गुड़-अदरक वाली चाय पीता है। मैंने सुना है वो ठाकुर की बगिया के पीछे वाले मकान में छुपा है। उसे चाय के लिए बाहर बुला लूँगा।»

मैंने उसकी तरफ़ देखा। «टिंकू, वो आदमी जली मिट्टी में बैठा है, और उसके पास ठाकुर के आदमी हैं।»

«मुझे पता है।» उसने चाय का घूँट लिया। «पर भैया, अब मैं भी उस काग़ज़ में हूँ। माँ ने लिखा है कि मैं भवानी का बेटा हूँ। यानी मेरे बाप के क़ातिल के खिलाफ़ मैं भी गवाह हूँ। अब मैं पीछे नहीं हटूँगा।»

कालू काका ने अपना गिलास नीचे रखा। «बेटा, तेरे बाप का क़ातिल ठाकुर नहीं है। ठाकुर तो बस… हाथ है। जैसे भैरव हाथ था। असली आदमी वो है जो इन सबके पीछे बैठा है। और वो…»

वो रुके।

«क्या?» मैंने कहा।

«वो मेरा बेटा नहीं है। पर वो मेरे सामने बड़ा हुआ है। मैंने उसे बचपन में देखा है, अखाड़े की मिट्टी में खेलते हुए। और मैं एक बात जानता हूँ जो किसी को नहीं पता।» उन्होंने अपना गिलास दोनों हाथों में पकड़ा, और उसके हाथ काँप रहे थे। «भवानी की मौत वाली रात मैंने अखाड़े में एक आदमी को देखा था। उसका चेहरा मैंने नहीं देखा — बस उसकी पीठ देखी और उसके हाथ में एक लालटेन थी। वो तहखाने की तरफ़ जा रहा था। और उसके पीछे-पीछे कोई और था, जो रुक-रुककर चल रहा था, जैसे… जैसे कोई ठीक से चल नहीं पा रहा हो।»

«कौन?»

«मुझे नहीं पता। पर आज इतने साल बाद, जब मैंने उस छोटे आदमी को तेरे आँगन में देखा, जिसका एक कान पर निशान है… मुझे वो चाल याद आ गई। वो रुक-रुककर चलने वाला आदमी वही था।»

मेरे हाथ से गिलास फिसलने लगा। मैंने उसे पकड़ा।

«यानी वो छोटा आदमी…»

«वो बीस साल पहले भी वहाँ था। और आज भी वो हमारे आँगन में आया। ये बात उसके ठाकुर के आदमी होने से बड़ी है। ये बात ये बताती है कि वो उस रात का एक हिस्सा है।»

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसका चेहरा पीला पड़ गया था।

«भैया,» उसने कहा, «अगर वो उस रात का हिस्सा है, तो वो… वो हमारे बाप की मौत का गवाह है।»

«या फिर…» मैंने धीरे से कहा, «वो मौत का हिस्सा है।»

चाय ठंडी हो रही थी। आँगन में बैठे सब चुप थे। दूर कहीं गाँव का कोई कुत्ता भौंका और फिर चुप हो गया।

मैंने गिलास नीचे रखा और खड़ा हो गया।

«कहाँ जा रहा है?» माँ ने पूछा।

«फाटक पर।»

«क्यों?»

«क्योंकि उन्होंने कुछ छोड़ा है। मैंने जब वो भाग रहे थे, तब मुझे काग़ज़ की गंध आई थी — पुराना काग़ज़, जिस पर स्याही की बू है। वो लोग खाली हाथ नहीं गए।»

मैं फाटक तक गया। मशालों की रोशनी जा चुकी थी, पर आँगन के बाहर की मिट्टी पर कुछ सफ़ेद पड़ा था। मैंने उसे उठाया।

एक चिट्ठी थी। मुड़ी हुई, और उस पर कोई नाम नहीं था। पर उसकी गंध… उसकी गंध में कपूर था, और हल्की-सी हल्दी, और उसके नीचे, बहुत गहरे, वो बू जो मैंने उस दिन गंगा देवी के काग़ज़ में पकड़ी थी — बादाम का तेल।

मैंने चिट्ठी खोली। मीरा पीछे आई और उसने मशाल जलाई, और उसकी रोशनी में हम दोनों ने वो लिखा हुआ पढ़ा।

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