Spirit of a Fighter – Chapter 1013
«तीन आदमी,» मैंने धीरे से कहा, और अपनी मुट्ठी भींची। «टिंकू, माँ को अंदर ले जा।»
«नहीं,» टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कंपन था जो डर से नहीं, गुस्से से आता है। «आज मैं पीछे नहीं हटूँगा।»
मशालों की रोशनी में मैंने उन तीनों के चेहरे देखे। और तभी मेरी नज़र फाटक के पीछे पड़ी — वहाँ एक चौथी परछाई खड़ी थी। लंबी, सीधी, और उसके हाथ में कुछ था जो मशाल की रोशनी में चमका।
एक पीली शीशी।
«तो वीर सिंह,» बीच वाले आदमी ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ढाढ़स था जो सिर्फ़ उस आदमी को होता है जिसने बाज़ी पहले ही जीत ली हो, «तू सच को अदालत तक ले जाने की सोच रहा है? अदालत तक तो काग़ज़ पहुँचेगा… पर तू पहुँचेगा या नहीं, ये अभी तय नहीं।
॥
«पर तू पहुँचेगा या नहीं, ये अभी तय नहीं।»
उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो मुझे अखाड़े की मिट्टी में भी कभी नहीं मिली। मैंने अपने पैर ज़मीन पर जमाए और सामने देखा। तीन मशालें, तीन चेहरे, और उनके पीछे फाटक के बाहर वो चौथी परछाई खड़ी थी, पीली शीशी हाथ में लिए।
टिंकू ने मिठाई की डिब्बी को अपनी छाती से लगा लिया। उसकी उँगलियाँ डिब्बी के ढक्कन पर सफ़ेद पड़ गई थीं।
«भैया,» उसने धीरे से कहा, «ये लोग डिब्बी के लिए आए हैं।»
«तू पीछे रह,» मैंने कहा।
«नहीं।»
माँ दरवाज़े की चौखट पर खड़ी थीं, और उनके हाथ में वो लोहे का ढक्कन था जो उन्होंने उस रात ढाल की तरह पकड़ा था। गुड़िया माँ की कमर से चिपकी थी, और उसकी आँखें डिब्बी पर टिकी थीं, जैसे उसे पता हो कि आज कुछ बड़ा होने वाला है।
बीच वाला आदमी एक कदम आगे बढ़ा। उसकी चप्पल आँगन की मिट्टी पर चरमराई। उसके पीछे वाला दुबला आदमी मशाल को हवा में हिला रहा था, और तीसरा — जो सबसे छोटा था और जिसके एक कान पर पुराना निशान था — चुपचाप खड़ा था, आँखें नीची किए।
और उसी वक्त मेरी नाक में एक गंध आई।
सस्ता साबुन। नीम का तेल। और उसके ऊपर, बहुत हल्का, स्कूल की स्याही की बू — वो स्याही जो बच्चों की कॉपी में लगती है, जो सस्ते डिब्बे में आती है और जिसकी बू हफ़्तों कपड़े में रह जाती है।
मैंने उस छोटे आदमी को गौर से देखा। उसका कान। वो निशान। और उसकी जेब से एक कोना बाहर निकला हुआ था — लाल रंग का, जिस पर सफ़ेद धागे से कुछ सिला था।
मुझे याद आया। स्कूल के गेट पर, उस दिन, जब हम गोलू को ढूँढने गए थे — एक आदमी गोलू के कंधे पर हाथ रखकर कुछ कह रहा था। मैंने उसे तब पूरा नहीं देखा था, पर उसकी जेब से वही लाल कोना झाँक रहा था। और उसके शरीर से वही सस्ता साबुन और नीम के तेल की गंध आई थी।
मैंने उसकी तरफ़ उँगली उठाई।
«तू,» मैंने कहा।
सब रुक गए। मशाल की लौ भी जैसे एक पल के लिए थम गई।
«तू वही है ना? जो स्कूल के गेट पर गोलू से बात कर रहा था? जिसने उसे डराया था कि अगर वो कुछ बोलेगा तो उसके बाप का क्या होगा?»
छोटे आदमी का चेहरा बदल गया। उसने मशाल वाले की तरफ़ देखा, फिर बीच वाले की तरफ़, जैसे कोई रास्ता माँग रहा हो।
«तू… तू क्या बक रहा है?» उसकी आवाज़ काँपी।
«तेरे कपड़ों में स्कूल की स्याही की बू है। उस दिन तूने गोलू की कॉपी हाथ में ली थी ना? उसका हाथ पकड़कर कहा था कि 'चुप रह, तो तेरा बाप सही-सलामत घर पहुँच जाएगा'?»
वो पीछे हटा। उसका पैर आँगन के उस गड्ढे में पड़ा जो बारिश से बना था, और वो लड़खड़ाया।
«तू… तू कैसे…»
«मुझे गंध पता बता देती है,» मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अब धीमी हो चली थी। «हर आदमी की एक बू होती है। तेरी बू वो है जो मुझे उस दिन स्कूल के गेट पर मिली थी।»
बीच वाला आदमी — जो मोटा था और जिसके हाथ में लोहे की छड़ थी — गुर्राया।
«बकवास बंद कर,» उसने कहा। «हमें काग़ज़ चाहिए। जो काग़ज़ तेरे पास है, वो दे दे। तो तेरा भला, नहीं तो…»
«नहीं तो क्या?» मैंने कहा। «तू मुझे मारेगा? यहाँ? मेरे आँगन में? मेरी माँ के सामने?»
«हम किसी के आँगन से नहीं डरते।»
«तो तू एक बात सुन ले।» मैंने एक कदम आगे बढ़ा, और मेरी आवाज़ में वो बात आई जो मुझे खुद भी नई लगी। «तेरे पीछे ठाकुर है। ठाकुर के पीछे भैरव है। और भैरव के पीछे… भैरव के पीछे वो आदमी है जिसने बीस साल पहले इस गाँव की हवा तक खरीद ली थी। और मैं उसका नाम जानता हूँ।»
ये झूठ था। पूरा झूठ।
पर जब आदमी डरता है, तो उसे सच और झूठ में फ़र्क़ नहीं दिखता। बीच वाले मोटे आदमी के हाथ से लोहे की छड़ ढीली पड़ी। उसने एक बार पीछे देखा — फाटक के बाहर वाली परछाई की तरफ़ — और उस परछाई ने कोई हरकत नहीं की।
«तू झूठ बोल रहा है,» मोटे ने कहा, पर उसकी आवाज़ में अब वो ढाढ़स नहीं था।
«अगर झूठ बोल रहा हूँ,» मैंने कहा, «तो मशाल नीचे रख और आगे आ।»
वो नहीं आया।
और उसी वक्त कालू काका सामने आए। उन्होंने अपनी लाठी उठाई — वो लाठी जिससे वो रोज़ अखाड़े की मिट्टी को हाथ से सींचते थे — और आँगन के बीच आकर खड़े हो गए। उनकी कमर झुकी थी, पर उनकी आवाज़ सीधी थी।
«मैंने तीन आदमी देखे हैं जो मशाल लेकर किसी के आँगन में आए,» उन्होंने धीरे से कहा। «एक बीस साल पहले आया था। उसका नाम भूल गया, पर उसके हाथ में जो लाठी थी, वो मुझे अब भी याद है। तुम तीनों उसके आगे कुछ भी नहीं हो।»
और तभी टिंकू ने वो किया जो मैंने उससे उम्मीद नहीं किया था।
वो डर रहा था। उसके हाथ काँप रहे थे, उसकी आँखों में पानी था, उसके घुटने जैसे अंदर से मुड़ रहे थे। पर उसने डिब्बी को अपनी छाती से और कसकर लगाया और ज़ोर से चिल्लाया —
«ये मेरी मिठाई है! इसे कोई नहीं छुएगा!»
आँगन में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया।
और फिर गुड़िया हँसी।
वो स्कूल की कॉपी अपने सीने से लगाए, माँ की कमर से चिपकी हुई थी, और एकदम से उसकी हँसी फूट पड़ी — वो हँसी जो बच्चों की होती है जब बड़ों की बातें उन्हें बेतुकी लगती हैं। और उस हँसी में वो सब कुछ था जो हमारे घर में बीस साल से नहीं था।
कालू काका के चेहरे पर मुस्कान आई। माँ ने अपना हाथ मुँह पर रखा, पर उनकी आँखें हँस रही थीं।
और मैं हँस पड़ा। उस मशाल की रोशनी में, उन तीन मशालों के सामने जो हमें डराने आए थे, मैं हँसा। टिंकू ने हैरानी से मेरी तरफ़ देखा, और फिर वो भी हँसने लगा, और उसकी हँसी में डर अब भी था, पर उसके ऊपर हँसी भी थी।
तीनों आदमी एक-दूसरे को देख रहे थे। मोटे ने अपनी छड़ उठाई, पर उसकी आवाज़ में अब वो दम नहीं था।
«तू… तू हँस मत…» वो बोला।
«क्यों नहीं हँसूँ?» मैंने कहा। «तुम तीन आदमी हो, मशालें लिए, हमें डराने आए हो। और जो डरने वाला था, वो तुम्हारी छड़ से नहीं, इसकी मिठाई से डर रहा है।»
वो उलझन में पड़ गया। उसने फिर पीछे देखा, पर फाटक के बाहर वाली परछाई अब वहाँ नहीं थी।
वो जा चुकी थी।
और इसी वजह से मोटे का हौसला टूट गया। वो एक कदम पीछे हटा, फिर दूसरा।
«हम… हम बाद में आएँगे,» उसने कहा।
«नहीं,» मैंने कहा। «तुम अभी जाओगे। और जाकर अपने ठाकुर से ये कहना — काग़ज़ की एक कॉपी अदालत तक पहुँच चुकी है। ये दूसरी है। और तीसरी… तीसरी वहाँ है जहाँ तुम्हारे ठाकुर के हाथ नहीं पहुँचते।»
ये भी झूठ था। पर उस वक्त मुझे पता था कि झूठ भी हथियार होता है, अगर सच की तरह बोला जाए।
तीनों आदमी फाटक की तरफ़ बढ़े। मशालों की रोशनी दीवारों पर डगमगाई, फिर फाटक की और झुकी, और फिर तीनों बाहर निकल गए। उनकी चप्पलों की आवाज़ तेज़ी से दूर गई — जैसे कोई भाग रहा हो।
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