Spirit of a Fighter – Chapter 1009
"भाई, जब तुमने मुझे बताया कि मैं तुम्हारा भाई हूँ… उस रात मैं सो नहीं पाया।" उसने अपनी गर्दन के पीछे हाथ रखा। "मैं सोचता रहा कि मैं किसका बेटा हूँ। माँ ने मुझे छोड़ दिया, तो क्या मैं किसी का बेटा नहीं हूँ? फिर मैंने सोचा — अगर तुम मेरे भाई हो, तो मैं किसी का तो हूँ। और वो काफ़ी है।"
मेरा गला भर आया। मैंने उसे गले लगा लिया, स्टेशन के बाहर, सबके सामने, बिना कुछ सोचे। वो पहले ठिठका, फिर उसने भी मुझे पकड़ लिया, और उसकी पकड़ में वो ताकत थी जो मैंने पहले कभी नहीं महसूस की थी।
"तू मेरा भाई है," मैंने उसके कान में कहा। "माँ ने तुझे छोड़ा, पर उसने तुझे भुलाया नहीं। उसकी आँखों में आज भी तेरे लिए जगह है।"
टिंकू ने मेरी पीठ पर हाथ मारा और हँसा — इस बार असली हँसी। "चल, अब घर। माँ को बताना है कि कल अदालत है। और मैंने सुना है अदालत में सबको नए कपड़े पहनने पड़ते हैं। मेरे पास एक ही अच्छी कमीज़ है, वो भी पीली।"
रात को घर पहुँचकर मैंने माँ को सब बताया। वो चक्की के पास बैठी थीं, और मेरी बात सुनकर उन्होंने चक्की चलाना बंद नहीं किया। आटा गिरता रहा, और उनके हाथ चलते रहे।
"तो कल अदालत है," उन्होंने कहा, बिना रुके।
"हाँ, माँ। वकील मैडम ने कहा है कि आपको भी आना है।"
चक्की रुकी। माँ ने अपने हाथ आटे से झाड़े और मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर था जो मैंने कभी-कभी रातों में देखा था, जब वो सोचती थीं कि कोई नहीं देख रहा।
"वीर," उन्होंने कहा, "अगर अदालत में उन्होंने मुझसे पूछा कि मैंने शीशी क्यों बनाई… तो मैं क्या कहूँ?"
मैं उनके पास बैठ गया। मेरे घुटने उनके घुटनों से टकरा रहे थे। आटे की गंध, हल्दी की गंध, और माँ के शरीर की वो पुरानी गंध जो बचपन से मेरे साथ थी।
"आप सच बोल देना, माँ। जो सच है। कि आपने वो शीशी अपने लिए बनाई थी। कि आप उससे डरती थीं। और पापा ने थाली बदलकर खुद पी लिया।"
माँ की आँखें भर आईं। उन्होंने अपना हाथ मेरे सिर पर रखा, और उनकी हथेली में आटा लगा था, जो मेरे बालों में बैठ गया।
"तेरे पापा बहुत अच्छे आदमी थे," उन्होंने धीरे से कहा। "मैंने उन्हें कभी नहीं बताया कि मैं उनसे कितना प्यार करती थी। मैं सोचती थी वक़्त है। वक़्त हमेशा रहेगा।" उनका गला रुंध गया। "वो नहीं रहा।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। "माँ, कल अदालत में मैं आपके साथ खड़ा रहूँगा। और जब वो लोग आपसे सवाल पूछेंगे, तो आप मेरी तरफ़ देख लेना। बस।"
उन्होंने सिर हिलाया। फिर वो उठीं और चूल्हे की तरफ़ गईं। "चल, खाना खा ले। कल लड़ाई है, तो आज पेट भरना ज़रूरी है।"
गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी सब सुन रही थी। जब मैं बाहर आया तो उसने मेरा हाथ खींचा।
"भैया," उसने कहा, "कल मैं भी चलूँगी?"
"चलेगी," मैंने कहा।
"और अगर वो बदमाश आए तो?"
"तो मैं उससे निपट लूँगा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चमक थी जो बच्चों में होती है — जो जानती है कि बड़ा भाई झूठ बोल रहा है, पर झूठ प्यारा है।
"भैया," उसने कहा, "तुम्हें पता है, मैंने सपना देखा था। कि तुम जीत गए, और सब मिठाई खा रहे हैं। और मैं सबसे ज़्यादा खा रही हूँ।"
मैं हँसा। बहुत दिनों बाद। "तो कल के बाद सपना सच करेंगे।"
अगली सुबह हम सब अदालत पहुँचे। माँ ने सफ़ेद साड़ी पहनी थी — वो साड़ी जो उन्होंने अपनी शादी में पहनी थी, और जो अब भी संदूक में रखी थी। गुड़िया ने स्कूल की वर्दी पहनी थी, और उसके बालों में तेल लगा था। टिंकू ने अपनी पीली कमीज़ पहनी थी और कान के पीछे पेंसिल रखी थी — "अगर कुछ लिखना पड़े तो," उसने कहा।
वकील मैडम हमें सीढ़ियों पर मिलीं। उन्होंने सबको देखा, और माँ के पास रुककर उन्होंने उनका हाथ थामा।
"सरस्वती जी," उन्होंने कहा, "आज आपको सिर्फ़ सच बोलना है। बाकी मेरा काम है।"
माँ ने सिर हिलाया। उनके होंठ काँप रहे थे, पर उनकी आँखें साफ़ थीं।
अदालत के अंदर पंखे धीरे-धीरे घूम रहे थे। दीवारों पर पुराने रंग चढ़े थे, और हवा में काग़ज़ और स्याही की गंध थी। मैंने पीछे की बेंच पर बैठे लोगों को देखा — गाँव वाले आए थे। सुक्खी बुआ सबसे आगे बैठी थी, हाथ में पान का बीड़ा, और उनकी आँखें हर चीज़ नाप रही थीं। कालू काका कोने में बैठे थे, और उनकी सफ़ेद दाढ़ी हिल रही थी जैसे वो चुपचाप कुछ बुदबुदा रहे हों।
जज साहब आए। बड़े, भारी शरीर, सफ़ेद बाल, चश्मा। उन्होंने कुर्सी संभाली और फ़ाइल खोली। और फिर, केस शुरू होने से पहले, उन्होंने एक बार नज़र उठाकर हॉल में देखा।
और वो नज़र ठाकुर पर पड़ी।
ठाकुर सामने की बेंच पर बैठा था। साफ़ सफ़ेद कुर्ता, चमकती मूँछें, गले में पतली सोने की चेन। वो उठा और उसने जज साहब को हाथ जोड़कर प्रणाम किया। और जज साहब ने — मैंने अपनी आँखों से देखा — उन्होंने हल्का सा सिर हिलाया और मुस्कुरा दिए।
मेरे पेट में आग जल उठी।
"ये जज भी उसका आदमी है," मैंने वकील मैडम के कान में फुसफुसाया।
"नहीं," उन्होंने बिना होंठ हिलाए कहा। "ये सिर्फ़ पुराना जान-पहचान है। जजों के भी दोस्त होते हैं, वीर। पर अदालत में दोस्ती नहीं चलती। बस सबूत चलते हैं। और हमारे पास सबूत है।"
केस शुरू हुआ। वकील मैडम ने उठकर याचिका पढ़ी — अखाड़े की ज़मीन, ठाकुर के नाम पर बने जाली काग़ज़, रणवीर सिंह के नकली हस्ताक्षर, और बीस साल के धोखे का पूरा हिसाब। उन्होंने काग़ज़ात पेश किए। उन्होंने रणवीर सिंह के असली हस्ताक्षर वाली पुरानी फ़ाइल दिखाई।
जज साहब ने चश्मे से ऊपर देखा और काग़ज़ात अपने सामने रखे। "ठाकुर महेंद्र सिंह की तरफ़ से कोई वकील?" उन्होंने पूछा।
ठाकुर खुद उठा। "जज साहब, मैं अपना केस खुद रखूँगा।"
वो आगे आया और मेज़ के पास खड़ा हो गया। उसकी आवाज़ में वो मिठास थी जो गुड़ में होती है, और उसकी आँखों में वो ठंडक जो कुएँ में होती है।
"जज साहब," उसने कहा, "ये सारा मामला एक गलतफ़हमी है। मैंने ये ज़मीन कानूनी तरीके से खरीदी थी। रणवीर सिंह मेरे दोस्त थे, और उन्होंने खुद ये काग़ज़ात पर हस्ताक्षर किए थे।" उसने काग़ज़ दिखाया। "अब अगर किसी को याद नहीं कि उसने बीस साल पहले क्या किया, तो इसमें मेरा क्या कसूर?"
उसकी नज़र मेरी तरफ़ घूमी। और वो मुस्कुराया। वो मुस्कान कह रही थी — "देखा, मैंने कहा था ना?"
जज साहब ने काग़ज़ पलटे। उन्होंने वकील मैडम की तरफ़ देखा। "सुधा देवी, आपके पास इस जालसाज़ी के पक्के सबूत हैं?"
"जज साहब," वकील मैडम ने कहा, "मेरे पास एक गवाह है जिसने ये काग़ज़ अपनी आँखों से बनते देखा। उसका नाम रामाधार है। वो मुंशीजी का भाई है, जो अखाड़े का हिसाब रखते थे।"
हॉल में सन्नाटा छा गया। मैंने पीछे देखा। रामाधार वहाँ नहीं था।
वकील मैडम ने चारों तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर पहली बार घबराहट आई।
"जज साहब, गवाह को समन भेजा गया था। शायद वो रास्ते में—"
"तो फिर हम इंतज़ार करेंगे," जज साहब ने कहा, और उन्होंने फ़ाइल बंद कर दी। "अगली तारीख़ तक केस स्थगित।"
ठाकुर ने जीत की मुस्कान के साथ अपनी मूँछों को ठीक किया। वो पलटा और हमारी बेंच के पास से गुज़रा। और जब वो मेरे पास से गुज़र रहा था, तो उसने रुककर मेरी तरफ़ देखा।
"वीर सिंह," उसने धीरे से कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ, "मैंने कुछ गलत नहीं किया। मैंने सिर्फ़ कारोबार किया। तुम्हारे पापा भी कारोबारी थे — बस वो हार गए।"
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