Spirit of a Fighter – Chapter 1004
भैरव ने अपनी धोती की दूसरी जेब से एक छोटी-सी पोटली निकाली। लाल कपड़े में बंधी। उसने उसे खोला — उसमें एक चिट्ठी थी, मुड़ी हुई, और एक टूटा हुआ पीतल का कड़ा।
"तेरे पिता भवानी ने मरने से तीन दिन पहले ये मुझे दिया था," भैरव ने कहा। "और कहा था — 'अगर मैं मरूँ, तो ये मेरे बेटे को देना, पर उस वक़्त देना जब वो सच जानने लायक हो जाए।'"
मैंने चिट्ठी की तरफ़ हाथ बढ़ाया, पर भैरव ने पीछे खींच लिया।
"पहले बता," उसने कहा, "तू मेरे साथ पंचायत चलेगा?"
आँगन में सन्नाटा छा गया। दूर कहीं स्कूल की घंटी बजी। मीरा ने मेरा हाथ कसकर दबाया।
"नहीं," मैंने कहा।
भैरव की आँखें सिकुड़ीं।
"तू समझ नहीं रहा—"
"मैं समझ रहा हूँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी। "तू मुझे मेरे पिता की चिट्ठी का लालच दे रहा है, ताकि मैं अपनी माँ के खिलाफ़ गवाही दूँ। और तूने ये चिट्ठी मुझे इसलिए नहीं दी कि तुझे मेरे पिता की क़सम का ख्याल है। तूने ये चिट्ठी इसलिए निकाली कि तेरे पास कोई और रास्ता नहीं बचा।"
भैरव का चेहरा बदला। वो मुस्कान गायब हो गई। उसकी जगह वो ठंडक आई जो मैं बचपन से जानता था।
"तो तू नहीं चलेगा।" उसने चिट्ठी को जेब में वापस डाल दिया।
"मैं चलूँगा," मैंने कहा। "पर अपनी शर्त पर। तेरे साथ नहीं, उस पंचायत के सामने जहाँ सारा गाँव होगा। और वहाँ मैं ये काग़ज़ भी दिखाऊँगा और तेरे बीस साल के हिसाब की फ़ाइल भी।"
भैरव ने एक कदम आगे बढ़ाया। उसका भारी शरीर मेरे सामने पहाड़ जैसा लगा।
"तू मुझे धमका रहा है, वीर?"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं तुझे बता रहा हूँ कि तेरा वक़्त ख़त्म हो गया।"
इंस्पेक्टर शर्मा ने बीच में आकर हाथ बढ़ाया। "भैरव सिंह, आप यहाँ मेरी हिरासत में हैं। आपने कहा था कि आप सिर्फ़ बात करेंगे।"
भैरव ने उनकी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो हिकारत थी जो वो हर उस आदमी के लिए रखता था जिसे वो खरीद नहीं सका।
"इंस्पेक्टर," उसने कहा, "तुम्हारा बेटा अभी भी उसी स्कूल में पढ़ता है, है ना? वो वार्डन कमला देवी तुम्हारी बीवी की मौसेरी बहन है।"
इंस्पेक्टर का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर भैरव की तरफ़, और फिर अपनी आँखें नीची कर लीं।
"मैं… मैं तुमसे बाद में बात करूँगा, वीर," वो बोले और रस्सी से बँधी भैरव की कलाई पकड़कर उसे खींचने लगे।
भैरव मुड़ा। जाते-जाते उसने मेरी तरफ़ देखा।
"वो चिट्ठी तेरे पास पहुँचेगी, वीर," उसने कहा। "पर जब पहुँचेगी, तब तक तुझे पता चल जाएगा कि तेरा बाप तुझे कितना कम जानता था।"
वो सिपाहियों के साथ फाटक की तरफ़ बढ़ गया। मैं वहीं खड़ा रह गया, और मेरे हाथ की मुट्ठी में वो जाली काग़ज़ था जो मुझे अब भी जलता हुआ लग रहा था।
मीरा ने मेरा हाथ खोला। उसने काग़ज़ को ध्यान से देखा, उसकी स्याही पर उँगली फेरी।
"वीर," उसने कहा, "ये हस्ताक्षर देख। इसमें 'रण' का घुमाव कम है। तेरे पिता जी हर अक्षर में ज़्यादा घुमाव डालते हैं। ये किसी और का हाथ है।"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "पर मुझे ये भी जानना है कि ये हाथ किसका है।"
मैंने काग़ज़ को मोड़कर अपनी धोती की जेब में रखा। फिर मैं रसोई की तरफ़ मुड़ा।
बूढ़ा अभी भी वहीं बैठा था। उसने हमारी बातचीत सुनी थी, ये उसके चेहरे से साफ़ झलक रहा था। उसके हाथ काँप रहे थे और वो कटोरी को कसकर पकड़े था।
"तू मेरे पास बैठ," मैंने कहा।
वो उठा। उसकी कमर झुकी हुई थी और वो मेरे पीछे चलकर आँगन के कोने में बनी पत्थर की बेंच पर बैठ गया। मीरा और टिंकू पास खड़े हो गए।
बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था।
"मेरा नाम रामाधार है," उसने कहा। "मुंशीजी मेरा बड़ा भाई था। वो अखाड़े का हिसाब रखता था, और मैं… मैं उसका हाथ था। जब काग़ज़ लिखना होता, वो मुझसे लिखवाता।"
"तो ये काग़ज़ तूने लिखा?" मैंने पूछा।
"नहीं," उसने सिर हिलाया। "मैंने सिर्फ़ उस काग़ज़ को नक़ल किया जो भैरव ने मुझे दिया था। असली काग़ज़ भैरव के पास था — रणवीर सिंह के असली हस्ताक्षर वाला। भैरव ने कहा था कि उसे बदलना है, क्योंकि असली पर टैक्स की मोहर सही नहीं थी। और मैंने… मैंने बदल दिया।"
मेरा दिल भारी हो गया। "तूने ऐसा क्यों किया?"
रामाधार ने अपने हाथों को देखा। उनकी उँगलियों पर स्याही के धब्बे थे, पुराने, जो कभी नहीं छूटे थे।
"क्योंकि मेरा भाई मर रहा था," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "उसे दवा चाहिए थी, और भैरव ने कहा कि अगर मैं ये काग़ज़ बना दूँ, तो वो दवा का इंतज़ाम करेगा। मैंने सोचा कि एक काग़ज़ से किसी की जान नहीं जाएगी।"
"पर जान गई," मैंने कहा। "मेरे पिता की।"
रामाधार ने सिर उठाया। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
"मुझे पता है," उसने कहा। "और इसीलिए मैं बीस साल से ये काग़ज़ ढूँढ रहा हूँ। ताकि मैं इसे जला सकूँ और अपने भाई की आत्मा को शांत कर सकूँ।"
"तेरा भाई?" मीरा ने पूछा। "मुंशीजी?"
रामाधार ने उसकी तरफ़ देखा। "मेरा भाई मुंशीजी तीन साल पहले मर गया। पर उसने मरने से पहले मुझे बताया था कि असली काग़ज़ भैरव ने ठाकुर को दे दिया था। और ठाकुर उसे अदालत में लगाने वाला है।"
मैंने अपनी जेब से वो जाली काग़ज़ निकाला और उसे रामाधार के सामने रख दिया।
"तो ये काग़ज़ झूठा है?"
"हाँ," उसने कहा। "पर अदालत में ये असली की तरह लगेगा। और अगर ठाकुर के पास असली काग़ज़ भी है, तो… तो रणवीर सिंह का अखाड़ा चला जाएगा।"
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरे पैरों में एक अजीब-सी ऊर्जा दौड़ गई।
"मुझे रणवीर सिंह से मिलना है," मैंने कहा।
हम स्कूल से निकले। बाहर सड़क पर धूल उड़ रही थी और दूर बाज़ार की तरफ़ से किसी की आवाज़ आ रही थी। टिंकू ने अपनी साइकिल उठाई और मीरा ने अपना बैग संभाला।
"मैं साथ चलूँगी," मीरा ने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "तू गाँव जा। माँ और गुड़िया अकेली हैं। भैरव ने कहा था कि वो चिट्ठी मुझे पहुँचेगी — इसका मतलब है कि वो किसी को भेजेगा। तुझे उनके पास रहना है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो मैं जानता था।
"ठीक है," उसने कहा। "पर तू अकेला नहीं जाएगा। टिंकू तेरे साथ जाएगा।"
टिंकू ने सीना फुलाया। "मैं तो पहले से तैयार था।"
मैं मुस्कुराया। पहली बार उस दिन कुछ हल्का लगा।
हम तीनों अलग हुए — मीरा गाँव की तरफ़, और मैं टिंकू के साथ अखाड़े की तरफ़।
रास्ते में टिंकू ने कुछ नहीं कहा। वो बस मेरे पीछे-पीछे चलता रहा, और उसकी साइकिल की घंटी कभी-कभी बजती रही। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा गंभीर था — ऐसा मैंने उसे कभी नहीं देखा था।
"टिंकू," मैंने कहा, "तू डर रहा है?"
उसने एक पल सोचा। "हाँ," उसने कहा। "पर डर के साथ चलना भी ज़रूरी है, ना? वरना तू अकेला हो जाएगा।"
मेरा गला भर आया। मैंने उसका कंधा थपथपाया। "तू मेरा भाई है," मैंने कहा। "माँ ने सही कहा था।"
टिंकू हँसा। "अब ये बात मत दोहराना, वरना मैं रोने लगूँगा और मेरी मिठाई खराब हो जाएगी।"
हम अखाड़े पहुँचे तो सूरज सिर पर था। अखाड़े के गेट पर कालू काका बैठे थे, हाथ में लोटा लिए। उन्होंने हमें देखा और उठ खड़े हुए।
"रणवीर सिंह अंदर हैं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में चिंता थी। "वो सुबह से कुछ बोल नहीं रहे। बस अपनी तस्वीर देख रहे हैं।"
मैं अंदर गया। अखाड़े की लाल मिट्टी पर मेरे पैरों के निशान पड़े। दूर बरामदे में रणवीर सिंह की व्हीलचेयर थी, और उसके सामने दीवार पर उनकी पुरानी तस्वीर टँगी थी — जवानी की, मिट्टी में लिपटे, मूँछें काली।
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