Spirit of a Fighter – Chapter 1002
हम पीछे एक छोटे कमरे में पहुँचे। दरवाज़े पर लोहे का ताला था। टिंकू ने चाबी घुमाई, ताला खुला, और दरवाज़ा खुलते ही अंदर से काग़ज़ों की गंध आई — सीलन, स्याही, और कुछ जला हुआ।
कमरे में लकड़ी की दो अलमारियाँ थीं। पहली में फ़ाइलें — पुराने रजिस्टर, हाज़िरी के काग़ज़। दूसरी में… दूसरी में लिफ़ाफ़े थे। बड़े, सीलबंद, और उनमें से कुछ पर लाल मोहर लगी थी।
मीरा ने एक लिफ़ाफ़ा उठाया। उसकी उँगलियाँ मोहर पर रुकीं।
"तीन लाल मोहर," उसने कहा। "अदालत की मोहर।"
मेरा दिल धक्क से रह गया।
"अदालत की?" मैंने पूछा।
मीरा ने लिफ़ाफ़े पलटे। तीन लिफ़ाफ़े थे — एक मोटा, दो पतले। उसने पहले वाले को खोला और उसमें से काग़ज़ निकाले। उसकी आँखें तेज़ी से चलने लगीं।
वो पढ़ती रही, और उसका चेहरा धीरे-धीरे बदलने लगा। उसके होठ सख़्त हो गए।
"क्या है?" मैंने पूछा।
"ये ज़मीन का काग़ज़ है," उसने कहा, आवाज़ धीमी। "अखाड़े के पीछे वाली ज़मीन। जो काग़ज़ मुझे तहखाने की संदूक में मिला था — वो इसका ही हिस्सा है।"
उसने दूसरा लिफ़ाफ़ा खोला। इसमें पुरानी तस्वीरें थीं — कुछ मिट्टी में लिपटे पहलवानों की, और एक काग़ज़ जिस पर कई नाम लिखे थे।
"ये…" मीरा की आवाज़ अटक गई।
तभी बाहर आँगन में आवाज़ आई।
"कौन है वहाँ? टिंकू!"
वार्डन की आवाज़ थी। टिंकू का चेहरा सफ़ेद हो गया।
"मैडम!" वो बाहर भागा। "मैडम, मैं रसोई में आ रहा था, बस ये पानी का…"
उसकी आवाज़ दूर हो गई। मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"जल्दी," मैंने कहा। "क्या है इसमें?"
मीरा ने आख़िरी लिफ़ाफ़ा खोला। उसमें सिर्फ़ एक काग़ज़ था — साफ़, नया, मोटे काग़ज़ पर। उसने उसे पढ़ा और उसका चेहरा उतर गया।
मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"बोल, मीरा।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
"ये काग़ज़ तो जाली है," उसने धीरे से कहा, "और इसमें रणवीर सिंह के हस्ताक्षर हैं।"
मेरे कानों में सनसनी दौड़ गई।
"क्या?" मेरी आवाज़ फट गई। "मेरे पिता के?"
"यहाँ लिखा है," मीरा ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया, "कि अखाड़े की पूरी ज़मीन ठाकुर महेंद्र सिंह को सौंपी जाती है। और गवाह के तौर पर… रणवीर सिंह का हस्ताक्षर है। तारीख़ है — बीस साल पुरानी।"
मेरा दिमाग़ चकरा गया। बीस साल पहले। वही साल जब पापा मरे थे।
"ये झूठ है," मैंने कहा। "मेरे पिता ने ऐसा काग़ज़ कभी नहीं…"
"हस्ताक्षर मिलते हैं," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी। "मैंने पिता के बहुत काग़ज़ों पर ये हस्ताक्षर देखे हैं। ये उन्हीं का है।"
मैंने काग़ज़ अपने हाथ में लिया। काग़ज़ नया था — मोटा, चमकदार। बीस साल पुराना काग़ज़ ऐसा नहीं होता। बीस साल पुराना काग़ज़ पीला हो जाता है, किनारों से टूटता है।
"रुक," मैंने कहा। मैंने काग़ज़ को सूँघा। उसमें एक हल्की गंध थी — नई स्याही और… और चंदन।
"ये काग़ज़ नया है," मैंने कहा। "बीस साल पुराना नहीं। किसी ने इसे अभी बनाया है। और ये हस्ताक्षर…"
मैंने काग़ज़ को रोशनी में किया। स्याही की लकीरें एक जगह पर ज़रा गहरी थीं, जैसे किसी ने हाथ धीरे से रखा हो।
"ये हस्ताक्षर उनका नहीं है," मैंने कहा। "किसी ने उनकी लिखाई की नकल की है। पर नकल करने वाले ने एक गलती की।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"मेरे पिता हस्ताक्षर करते वक़्त हमेशा 'रण' के बाद एक छोटा सा घुमाव डालते थे," मैंने कहा। "जैसे कोई पहलवान मिट्टी में पैर का निशान छोड़ता है। यहाँ वो घुमाव नहीं है।"
मीरा ने काग़ज़ फिर देखा। उसकी आँखें चमकीं।
"तू सही है," उसने कहा। "ये जाली है।"
तभी बाहर से वार्डन की तेज़ आवाज़ आई।
"टिंकू! ये कमरे का दरवाज़ा क्यों खुला है?"
मैंने काग़ज़ जल्दी से अपनी जेब में डाला। मीरा ने बाकी लिफ़ाफ़े अपने बैग में रखे।
दरवाज़ा खुला और वार्डन अंदर आई। उसकी नज़र अलमारी पर पड़ी, फिर मेरे चेहरे पर।
"तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो?" उसकी आवाज़ सख़्त हो गई। "ये मेरा दफ़्तर है।"
मैंने अपनी आवाज़ शांत रखी।
"मैडम," मैंने कहा, "ये काग़ज़ किसने रखे? ये लिफ़ाफ़े किसके हैं?"
वार्डन का चेहरा बदला। उसने गले की चाबियाँ पकड़ लीं, जैसे कुछ छुपाना चाहती हो।
"ये… ये तो पुराने काग़ज़ हैं। स्कूल के। तुम्हें क्या?"
"मैडम," मैंने एक कदम आगे बढ़ा, "इनमें से एक काग़ज़ पर मेरे पिता के हस्ताक्षर हैं। मैं जानना चाहता हूँ — ये काग़ज़ किसने लाया?"
वार्डन का हाथ काँपा। उसकी आँखें दरवाज़े की तरफ़ गईं, जैसे कोई रास्ता ढूँढ रही हो।
"मैं… मैं नहीं जानती," उसने कहा। "ये… ये ठाकुर साहब ने रखवाए थे। कहा था — इन्हें सँभालकर रखना।"
"कब?" मीरा ने पूछा।
वार्डन ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
"तीन दिन पहले।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। तीन दिन पहले। यानी जब ठाकुर ने मुझे बगिया की हवेली में बुलाया था, तब वो ये काग़ज़ यहाँ रखवा चुका था। वो पहले से जानता था कि मैं स्कूल आऊँगा।
तभी बाहर आँगन में पैरों की आहट आई। कई पैरों की। और एक आवाज़ — मीठी, जानी-पहचानी।
"वीर सिंह, मैंने कहा था न — ठाकुर के साथ मत जाना।"
मैं पलटा। दरवाज़े पर ठाकुर खड़ा था, और उसके पीछे… गंगा देवी।
मेरे हाथ मुट्ठी में बंद हो गए।
"तुम?" मैंने कहा।
गंगा देवी ने अंदर कदम रखा। उसकी आँखें कमरे में घूमीं, अलमारी पर रुकीं, फिर मेरे चेहरे पर।
"मैंने तुझे बचाने की कोशिश की," उसने कहा। "पर तू अपने पिता की तरह ज़िद्दी है। वो भी कभी किसी की बात नहीं मानता था।"
"तू क्यों आई है?" मैंने पूछा। "अब क्या चाहिए?"
गंगा देवी ने अपनी साड़ी का पल्ला ठीक किया। उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी शांति थी।
"ठाकुर ने मुझे बताया कि तू यहाँ आया है। और मैंने सोचा — अगर मैं नहीं आई, तो तू ये काग़ज़ लेकर सीधे अदालत जाएगा और अपने पिता को बदनाम कर देगा।"
"मेरे पिता को?" मैंने आवाज़ ऊँची की। "ये काग़ज़ जाली है। इसमें उनके हस्ताक्षर नकली हैं।"
गंगा देवी रुकी। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ बदला।
"तूने… तूने पहचान लिया?"
"मैंने उनके हाथ से चक्की चलाई है," मैंने कहा। "उनकी लिखाई मैं अँगुलियों से पहचानता हूँ, आँखों से नहीं।"
गंगा देवी ने एक लंबी साँस ली। फिर उसने पलटकर ठाकुर की तरफ़ देखा।
"मैंने कहा था, ठाकुर," उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "ये लड़का आम नहीं है।"
ठाकुर ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई। उसका चेहरा शांत था, पर उसकी आँखों में गुस्सा था।
"तो क्या हुआ?" उसने कहा। "काग़ज़ जाली है, तो बनवा देंगे नया। असली हस्ताक्षर वाला।"
"तुम्हारे पास रणवीर के असली हस्ताक्षर कहाँ?" मीरा ने तेज़ी से कहा। "जब तक वो ज़िंदा हैं, वो कभी ऐसा काग़ज़ नहीं करेंगे।"
ठाकुर मुस्कुराया। वो मुस्कान मैंने पहले भी देखी थी — जब वो जेल में मिला था।
"बेटा," उसने कहा, "तुम्हारे पिता व्हीलचेयर पर हैं। उनके हाथ अब ठीक से नहीं चलते। और उनकी ज़ुबान… उनकी ज़ुबान तो तुमसे भी ज़्यादा थक गई है। उन्हें क्या पता कि वो क्या मान गए हैं?"
मेरा खून खौल गया। मैं एक कदम आगे बढ़ा, पर मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"रुक," उसने धीरे से कहा। "ये हमारा मैदान नहीं है।"
तभी बाहर से एक और आवाज़ आई — किसी बूढ़े आदमी की।
"ठाकुर साहब!"
सब पलटे। आँगन में कालू काका खड़े थे, हाँफते हुए, हाथ में लालटेन।
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