Billionaire Empire System – Chapter 98
चुप्पी। लंबी चुप्पी। इतनी लंबी कि रवि को लगा कि सब बेकार है, और वो चारपाई पर गिरकर सो जाएगा।
तभी —
"छन्।"
घड़ी की सुइयाँ घूमीं। एक छोटी, चटपटी आवाज़ आई — वो पुरानी, जानी-पहचानी आवाज़। सिस्टम की।
"मिशन उपलब्ध है।"
रवि एक झटके से उठ बैठा।
"बोलो," उसने कहा। "क्या मिशन?"
घड़ी के शीशे पर धुँधले अक्षर उभरे, फिर उजले, फिर एक लाइन बन गई।
"इरा ख़ान को रोको। आज शाम वो स्टूडियो में सबूत दिखाएगी। मिशन: उसे सच बताओ। इनाम: तीन हज़ार पॉइंट।"
रवि बैठा रह गया।
"सच बताओ?" उसने अपने ही कानों पर शक किया। "घड़ी, वो सबूत झूठा है, तूने खुद कहा था। स्याही नई है। तो फिर सच बताना क्यों ज़रूरी है?"
घड़ी की सुई रुकी। फिर फिर घूमी।
"सोच।"
एक शब्द। बस।
रवि ने सिर दोनों हाथों में पकड़ लिया। सोच, सोच…
अगर इरा स्टूडियो में काग़ज़ दिखाएगी — वो काग़ज़ जो झूठे हैं — और उन्हें बलवंत के ख़िलाफ़ सबूत बताएगी… तो बलवंत को पता है कि वो झूठे हैं। मतलब वो पहले से जानता है कि इरा क्या दिखाएगी। मतलब… मतलब वो उसका इंतज़ार कर रहा है।
रवि की साँस रुक गई।
बलवंत उसे स्टूडियो में घेर लेगा। अकेली। कोई गवाह नहीं, कोई साथी नहीं। और काग़ज़ झूठे हैं — तो इरा के पास बचाव भी नहीं होगा। वो बेनक़ाब हो जाएगी, और बलवंत उसे वहीं… उसे वहीं…
रवि ने घड़ी उठाई, जेब में रखी, और चप्पल पहनने लगा। फिर रुका। माँ की तरफ़ देखा।
माँ की आँखें खुली थीं। वो उसे देख रही थीं।
"कहाँ?" बस इतना पूछा उन्होंने।
"माँ, इरा…"
"जा।" माँ ने कह दिया। आवाज़ में कुछ नरमी थी, जैसे वो जानती हों कुछ ऐसा जो रवि नहीं जानता। "उसे अकेले मत छोड़।"
रवि दौड़ा।
सुबह की हल्की धूप में गलियाँ खाली थीं। रवि भाग रहा था — साँस फूल रही थी, चप्पल कीचड़ में चिपक रही थी, पर वो रुका नहीं। ख़ान साहब की मस्जिद का चौक पार किया, और इरा का चैनल — "सच की आवाज़" — का छोटा दफ़्तर आ गया। तीन मंज़िला पुरानी बिल्डिंग, पहली मंज़िल पर दो कमरे।
रवि सीढ़ियाँ चढ़ा। दफ़्तर का दरवाज़ा खुला था। अंदर चारों तरफ़ काग़ज़ बिखरे थे, कुर्सियाँ बेढंगी पड़ी थीं। एक परदे के पीछे से किसी के हँसने की आवाज़ आ रही थी — टीवी पर कोई पुराना कार्यक्रम चल रहा था।
डेस्क पर कोमल बैठी थी। च्युइंग गम चबा रही थी, मोबाइल हाथ में, और आँखें लाल थीं — जैसे रात भर सोई न हो।
"इरा कहाँ है?" रवि ने हाँफते हुए पूछा।
कोमल ने ऊपर देखा और उसका चेहरा पल भर में बदल गया।
"तुम… तुम यहाँ क्यों आए हो?" उसने मोबाइल मेज़ पर रखा। "रवि, तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।"
"कोमल, इरा कहाँ है?"
कोमल ने नीचे देखा। च्युइंग गम चबाना बंद कर दिया। फिर धीरे से बोली, "मैडम काग़ज़ों का बंडल लेकर बंसल सर के केबिन में गई है। बीस मिनट हो गए।"
रवि का खून ठंडा हो गया। "अकेली?"
"मैंने रोका था," कोमल की आवाज़ फट गई। "मैंने कहा था — मैडम, प्लीज, आज मत जाइए। पर वो नहीं मानी। उन्होंने कहा कि अगर ये सबूत सच है तो पूरे शहर को पता होना चाहिए। और मैं… मैं कुछ नहीं कर पाई।"
रवि ने एक गहरी साँस ली। हाथ मुट्ठी में बाँधे। फिर बंसल के केबिन की तरफ़ बढ़ा — दफ़्तर के आख़िरी कोने में, जिसका दरवाज़ा भारी लकड़ी का था और ऊपर लिखा था "अध्यक्ष"।
दरवाज़े के ठीक सामने, गमले के पास, एक लड़का खड़ा था।
रघु।
उसकी आँखें बड़ी थीं, चेहरा पीला, दोनों हाथ कमर पर टिके थे। वो कुछ कहने के लिए मुँह खोलता, फिर बंद कर देता। फटी चप्पल का एक हिस्सा ज़मीन पर टिका था। वो ऐसे खड़ा था जैसे कोई अनजानी चीज़ उसे जकड़ रखी हो।
"रघु?" रवि ने कहा। "तू यहाँ क्या कर रहा है?"
रघु ने पीछे, दरवाज़े की तरफ़ देखा। फिर रवि के पास आया, और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि रवि को झुककर सुनना पड़ा।
"भैया…" रघु का गला भर आया। "आज मत जाओ। प्लीज।"
रवि ने उसका चेहरा देखा। वो काँप रहा था। बस डर से नहीं — कुछ और था। कुछ ऐसा जो रघु कह नहीं पा रहा था।
"क्यों? अंदर कौन है?"
रघु ने होंठ कसे। पानी उसकी आँखों में तैर रहा था।
"भैया, अंदर…" उसने रुककर कहा, "अंदर कोई और भी है। बंसल सर के अलावा। मैंने… मैंने दरवाज़े से आवाज़ सुनी। वो — वो आदमी भीतर है।"
"कौन सा आदमी, रघु?" रवि ने पूछा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई थी। पता था वो अंदर ही जाएगा, पर रघु की आँखों में जो डर था, उसे तोड़ना ज़रूरी था।
"वही… वही जिसके डिब्बे गोदाम में थे," रघु ने फुसफुसाया। "जिसकी मोहर उन काग़ज़ों पर थी। भैया, मैंने उसे सीढ़ी से चढ़ते देखा। वो मुस्कुरा रहा था। मुस्कुरा रहा था, भैया। जैसे… जैसे उसे पता हो कि मैं यहाँ हूँ और वो चाहता है कि मैं भाग जाऊँ।"
रवि ने रघु का कंधा पकड़ा। और उस पल — उस पल रवि को रघु की आँखों में अपनी खुद की कहानी दिखी। न उम्र, न हिम्मत — बस एक डरा हुआ लड़का जो किसी की मदद करने आया था और अब खुद फँस गया था।
"रघु," रवि ने धीरे से कहा, "अंदर मत आ।"
रघु ने उसकी तरफ़ देखा।
"तेरे घर पर तेरी बहन है ना?" रवि ने पूछा। "वो छोटी वाली — जो स्कूल जाती है, तेरे साथ बस में?"
रघु की आँखें भर आईं। उसने होंठ काट लिए, पर आँसू नहीं रुके। वो रोने की आवाज़ रोकने के लिए मुँह दबाकर हँसा — एक टूटी हुई हँसी।
"हाँ भैया," वो फुसफुसाया। "बहन है। छोटी है। मुझे हर रोज़ बस स्टॉप तक छोड़ती है।"
"तो तू नीचे जा। सीढ़ियों पर खड़ा रह। अगर मैं दस मिनट में न आऊँ, तो भाग जाना। पुलिस को फ़ोन करना। और अपनी बहन को सीधे घर छोड़ आना। समझा?"
रघु ने सिर हिलाया।
रवि दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। कदम भारी थे, पर पीछे नहीं हट रहे थे। हाथ बढ़ाया। हैंडल पकड़ा।
"भैया…" रघु ने पीछे से कहा। "अगर… अगर तुम न आओ तो…"
रवि पलटा नहीं। सिर्फ़ कहा, "घड़ी मेरे पास है। मैं आऊँगा।"
दरवाज़ा खोला।
अंदर हवा भारी थी — सिगार का धुआँ, बंद कमरे की गरमी, और किसी महँगे इत्र की तेज़ गंध। दीवार पर लकड़ी की बड़ी घड़ी टिक-टिक कर रही थी, जो बंसल की उम्र से भी ज़्यादा पुरानी लग रही थी।
बंसल अपनी चमड़े की कुर्सी पर बैठा था। सिगार होंठों के पास। मुँह पर वो कड़वी मुस्कान, जिससे रवि को बचपन से चिढ़ थी — जैसे दुनिया का हर आदमी उसके लिए एक काग़ज़ का टुकड़ा हो, जिसे वो कभी भी फाड़ सकता है।
इरा उसके डेस्क के सामने खड़ी थी। उसके हाथ में काग़ज़ों का बंडल — वही पीले पन्ने जो उसने रवि को दिखाए थे।
पर कुछ गड़बड़ था।
इरा के चेहरे पर वो उत्साह नहीं था। न वो जिद। उसका चेहरा… रवि के लिए यह चेहरा नया था। वो सफ़ेद पड़ा था। आँखें बड़ी। हाथ धीरे-धीरे काँप रहे थे। काग़ज़ उसकी उँगलियों से छूटकर नीचे गिरे — फिसलते हुए, ज़मीन पर फैलते हुए।
और उस मेज़ के पीछे, कुर्सी पर, बंसल की कुर्सी के ठीक पीछे — जहाँ छाया थी वहाँ से एक आवाज़ आई, धीरे से।
"आओ बेटा।"
रवि का पूरा शरीर जम गया।
आवाज़ वो थी। वही धीमी, हर शब्द पत्थर की तरह गिराने वाली आवाज़।
"तुम्हारी ही बात हो रही थी।"
बलवंत राय कुर्सी से उठा। उसका सफ़ेद कुर्ता, सोने की चेन, और उँगली पर लिपटा हुआ — पिंकी का सफ़ेद फ़ीता। उसने फ़ीते को धीरे से खींचा, फिर छोड़ दिया, और वो हवा में लहराया।
रवि ने अपने हाथ मुट्ठी में बाँधे। आँखें बलवंत पर, पर कान इरा की तरफ़ — जो अभी भी खड़ी थी, काँपती हुई, काग़ज़ों के ऊपर झुकी हुई।
"मैडम," बलवंत ने इरा की तरफ़ देखा, "आप बैठिए। प्लीज। चाय आएगी। और बेटा —" उसने रवि की तरफ़ देखा, "— तुम भी। देखो, आज इत्तेफ़ाक़ देखो। मैं यहाँ सिर्फ़ काग़ज़ों के एक हिसाब के लिए आया था, और तुम दोनों यहीं मिल गए।"
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