Billionaire Empire System97 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 97

7 min read November 7, 2026

"लुट्टन, सुन।" रवि की आवाज़ फिर वही ठंडी हो गई। "दुकान पर ताला लगा है ना? तू वापस मत जा। सीधे मेरे घर जा। माँ को अकेले मत छोड़।"

"मैं तो जा रहा हूँ, पर सुन…"

"और पिंकी है ना घर में?"

"होगी…" लुट्टन का गला सूख गया। "रवि, दोपहर के दो बजे हैं। पिंकी स्कूल से लौट चुकी होगी।"

रवि ने आँखें बंद कर लीं।

"जा, लुट्टन," उसने कहा। "और अगर वो गली में मिले… तो उनसे बात मत करना। सीधे घर पहुँचना।"

"और तू?"

"मैं पंद्रह मिनट में पहुँचता हूँ।"

फ़ोन कट गया।

रवि ने घड़ी को जेब में रखा, पर क़ासिम भाई ने हाथ बढ़ा दिया। रवि ने रुककर देखा। उनका चेहरा अब पहले जैसा नहीं था — खाली नहीं, बल्कि किसी पुराने डर से भरा हुआ।

"बेटा," उन्होंने धीरे कहा, "ये घड़ी तेरे पापा का दिल है। बहुत संभालकर रख। मुझे नहीं पता कि कौन इस पर नज़र रखे है… पर अगर इसे कोई छीन ले, तो तेरे पापा का आख़िरी हिस्सा भी चला जाएगा।"

रवि ने घड़ी को जेब में रखा और उस पर हाथ रख दिया। जैसे कोई बच्चा अपने सीने पर हाथ रखकर अपने ही दिल को थाम लेता है।

क़ासिम भाई बोले, "जा। माँ के पास जा।"

रवि जाने को पलटा ही था कि…

"छन्…"

घड़ी उसकी जेब में हिल उठी। रवि रुक गया। क़ासिम भाई भी रुक गए — उन्होंने भी वो आवाज़ सुनी।

रवि ने घड़ी निकाली। हथेली पर रखी। शीशा ठंडा नहीं था — गरम था।

"क्या है?" उसने फुसफुसाकर पूछा। "कौन?"

घड़ी की सुइयाँ घूमने लगीं। पर आवाज़ वो नहीं आई जो हर बार आती थी। न सिस्टम की छोटी, चटपटी आवाज़, न वो चुपचाप, सधी हुई आवाज़ जो पापा की लगती थी।

इस बार कुछ और था। बूढ़ा। काँपता हुआ। जैसे किसी ने दूर से, किसी कुएँ से आवाज़ दी हो।

"बेटा…"

क़ासिम भाई चौंककर उठ खड़े हुए, जैसे ज़मीन से कुछ चुभ गया हों।

"उस मिशन को मत लेना," वो आवाज़ कह रही थी, "जो कल आएगा। वरना तू अपने पापा को खो देगा।"

रवि की उँगलियाँ घड़ी पर जम गईं। उसने क़ासिम भाई की तरफ़ देखा — और क़ासिम भाई का चेहरा ऐसा हो गया था जैसे उन्होंने अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी बात एक पल में खो दी हो।

"बाबा…" रवि की आवाज़ फट गई। "ये कौन था? ये आवाज़…"

क़ासिम भाई ने धीरे-धीरे सिर हिलाया। "मुझे नहीं पता, बेटा।" उनका गला बैठ गया। "घड़ी ने आज तक कभी ऐसा नहीं कहा। कभी नहीं।"

घड़ी की सुई फिर स्थिर हो गई। शीशे पर धूल जमी थी, और उस धूल में एक पतली उँगली की लकीर बनी थी — जैसे किसी ने अंदर से छुआ हो।

रवि ने घड़ी को कान के पास लगाया — बस सन्नाटा। घड़ी ने आवाज़ देनी बंद कर दी थी।

"कल आएगा…" रवि ने दबी आवाज़ में दोहराया। "कौन कल आएगा, बाबा?"

क़ासिम भाई ने झोपड़ी की तरफ़ देखा, फिर बाहर बारिश से सने मैदान की तरफ़, जहाँ दूर धुएँ के सिवा कुछ नहीं दिख रहा था।

"जिसके बारे में मैं खुद सोचना नहीं चाहता, बेटा," उन्होंने कहा। "और इसीलिए मैं एक बात कहूँगा — अगर मिशन आए और तेरा दिल कहे कि नहीं, तो मत लेना। घड़ी की बात चाहे छोटी लगे, पर ये सिर्फ़ आवाज़ें नहीं है। ये एक आख़िरी इच्छा भी है। किसी का वसीयतनामा।"

रवि ने घड़ी जेब में रखी। उसका हाथ हथेली की उस जगह पर गया जहाँ सुई चुभी थी — अब वहाँ सिर्फ़ एक छोटा सा खुरचा बचा था।

"जाता हूँ, बाबा।" उसकी आवाज़ भारी थी। "माँ अकेली है।"

पर जैसे ही वो पलटा, क़ासिम भाई ने उसका कंधा पकड़ा। उनकी पकड़ में वो ताक़त नहीं थी जो कभी रघु के हाथों में थी, फिर भी रवि के पैर थम गए।

"बेटा, एक बात और…" क़ासिम भाई ने धीरे से कहा। "जो आवाज़ अभी आई… उसमें एक बात अजीब थी।"

"क्या?"

"उसने कहा — 'वरना तू अपने पापा को खो देगा।'" क़ासिम भाई ने रवि की आँखों में देखा। "बेटा, अपने पापा को तो तू कभी नहीं खो सकता। जो जा चुका है, वो जा चुका। तो फिर… इसका मतलब क्या है?"

रवि कोई जवाब नहीं दे पाया। गली की तरफ़ भागते वक़्त भी यही सवाल उसके पीछे-पीछे दौड़ रहा था, कीचड़ में चप्पलों के साथ फिसलता हुआ।

सच में… अगर पापा चले ही गए हैं, तो उन्हें खोने का डर कैसा?

घड़ी उसकी जेब में चुप बैठी थी।

पर रवि को लगा — वो चुप नहीं है। वो सिर्फ़ इंतज़ार कर रही है।

॥

"बेटा, क्या हुआ?" क़ासिम भाई ने रवि का कंधा हिलाया। "तेरा चेहरा क्यों ऐसा पड़ गया?"

रवि ने घड़ी हथेली में दबाई हुई थी। झोपड़ी के बाहर बारिश की बूँदें टपक रही थीं, और अंदर लालटेन की लौ हवा से काँप रही थी।

"बाबा, ये आवाज़…" रवि ने धीरे से कहा। "ये घड़ी से आई। घड़ी मेरी जेब में थी। मैंने कुछ पूछा भी नहीं था।"

क़ासिम भाई ने कुछ देर उन्हें देखा। फिर उन्होंने अपना मोटा काला चश्मा उतारा और आँखों को रगड़ा। उनकी आँखें अंधी नहीं थीं, थकी थीं।

"बेटा," उन्होंने बैठकर कहा, "मैं तेरे पापा के साथ चालीस साल रहा। घड़ी के साथ भी। हमने उसे बनते देखा है। उसने हजार बार बात की है मेरे सामने, पर… पर ऐसे नहीं।"

"कैसे नहीं?"

"पापा की आवाज़ में बात होती थी तो पलक नहीं झपकती थी, क्योंकि वो जाना-पहचाना था। सिस्टम की आवाज़ आती तो हम समझ जाते, ये मशीन है।" क़ासिम भाई ने लालटेन की तरफ़ देखा। "पर आज वो आवाज़… वो किसी बूढ़े की थी, बेटा। किसी थके हुए, डरे हुए बूढ़े की। जैसे कोई कुएँ में गिरा हो और ऊपर से आवाज़ दे रहा हो।"

रवि ने घड़ी को कान के पास लगाया। बस सन्नाटा।

"बाबा, आपने कभी वो आवाज़ सुनी है?"

क़ासिम भाई ने देर तक कोई जवाब नहीं दिया। फिर उन्होंने झोपड़ी की दरवाज़े की तरफ़ देखा — जहाँ बारिश से सना मैदान था, दूर श्मशान की ठंडी राख पड़ी थी।

"सुनने की बात नहीं है, बेटा," उन्होंने बहुत धीरे से कहा। "पहचानने की बात है। और मैं पहचान नहीं पा रहा। यही तो डर है।"

रवि का दिल ज़ोर से धड़का। "आप नहीं पहचान पा रहे?"

"चालीस साल से जो आवाज़ें मैंने सुनी हैं… उनमें से हर एक किसी की थी। पर ये —" क़ासिम भाई ने हाथ जोड़ लिए, जैसे कोई गिड़गिड़ा रहा हो। "बेटा, ये आवाज़ मेरे लिए नई है। और जो आदमी जानता है कि घड़ी क्या है, वो मेरे लिए नई आवाज़ नहीं हो सकती।"

झोपड़ी में सन्नाटा छा गया। बाहर लोहे के एक टुकड़े पर बारिश की बूँदें बज रही थीं — टक… टक… टक…

रवि ने अपने हाथ की तरफ़ देखा। हथेली पर वो छोटा सा खुरचा अभी भी था जहाँ सुई चुभी थी।

"बेटा, अब तू जा।" क़ासिम भाई ने अचानक कहा, और आवाज़ में हुक्म की एक गरमी आ गई। "माँ अकेली है। पिंकी सोई होगी। जा।"

"पर बाबा —"

"जा।" क़ासिम भाई ने उसका हाथ पकड़ा। "आज रात सो जा। सुबह जो आए, देख लेंगे। पर एक बात याद रख — अगर मिशन आए और तेरा दिल कहे कि नहीं…"

"तो मत लेना।" रवि ने कह दिया।

क़ासिम भाई ने सिर हिलाया। और रवि को लगा कि उन्होंने कुछ और भी कहना चाहा, पर कह नहीं पाए।

रास्ते में कीचड़ भरा था। रवि की चप्पल दो बार फिसली। पर वो नहीं गिरा। जैसे कुछ उसे अंदर से संभाले हुए था।

घड़ी जेब में चुप पड़ी थी। और रवि को लगा — उसमें कोई साँस ले रहा है। धीमी, बूढ़ी, थकी साँस।

घर पहुँचा तो माँ सो चुकी थी। पिंकी की चप्पल जोड़े में रखी थी। रवि ने दरवाज़े पर खड़े-खड़े माँ के चेहरे को देखा — बाल बिखरे, होंठ हल्के से खुले, और तकिये के नीचे दवाई की पत्ती दबी हुई।

वो चुपचाप अपनी चारपाई पर बैठा। घड़ी सामने मेज़ पर रखी। लालटेन नहीं जलाई — अंधेरे में सिर्फ़ घड़ी का शीशा चाँदनी में चमक रहा था।

"तुम कौन हो?" रवि ने फुसफुसाकर पूछा। "जो बोला, वो कौन था?"

घड़ी चुप।

"मेरे पापा से तुम्हें क्या लेना? वो जा चुके। तुम किस पापा की बात कर रहे थे?"

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