Billionaire Empire System96 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 96

7 min read November 7, 2026

फिर रवि अपने कमरे में गया, बिस्तर पर बैठा, और घड़ी जेब से निकालकर मेज़ पर रख दी। उसने शर्ट के बटन खोले ही थे कि फ़ोन बजा।

अनजान नंबर।

उसने उठाया।

"रवि?" आवाज़ गरम, आत्मविश्वास से भरी। "रवि प्रसाद? मैं नरेश बंसल बोल रहा हूँ। इरा का बॉस। चैनल का मालिक।"

रवि की उँगलियाँ फ़ोन पर कस गईं।

"हाँ, बोलिए।"

"मैं तुझे छोटी सी बात बताने के लिए फ़ोन कर रहा हूँ।" नरेश बंसल ने काग़ज़ हिलाने जैसी आवाज़ की। "इरा ने आज सुबह ऑफ़िस आकर कहा कि उसके पास बड़ी ख़बर है। कह रही थी, कल शाम तक पूरे शहर के सामने लाएगी।"

रवि चुप रहा।

"सुन, तू चाय वाला है, तेरी दुकान है, तेरी माँ है। तू समझदार है। मैं तुझे सिर्फ़ एक बात कहने आया हूँ — उसे रोक दे।" बंसल की आवाज़ से मिठास गिर गई। "वरना जो उसके पापा के साथ हुआ, वो उसके साथ भी हो जाएगा। और तू जानता है ना, उसके पापा के साथ क्या हुआ था?"

रवि की साँस रुक गई।

"मैं चाहता हूँ तू मेरी बात समझे," बंसल ने कहा। "क्योंकि मैं तेरे पापा को जानता था। और मुझे लगता है, तू भी वही रास्ता चुन रहा है जो उसने चुना था।"

फ़ोन कट गया।

रवि ने फ़ोन मेज़ पर रखा। उसके हाथ काँप रहे थे। लेकिन इस बार उसे ठंडक महसूस नहीं हुई — इस बार हथेली में गरमी थी।

वो उठा, खिड़की के पास गया, और बाहर अंधेरे में देखा। गली खाली थी। सिर्फ़ एक दूर की रोशनी जल रही थी, और बारिश की बूँदें मोटर पर टपक रही थीं।

फिर उसने पलटकर मेज़ पर रखी घड़ी को देखा।

और बहुत धीमे से बोला, "बोल, अब क्या?"

घड़ी की सुईं घूमने लगीं। शीशे के अंदर से छोटी, शांत आवाज़ आई — "अब उस आदमी से मिल। जो तुझसे कल मिलने आ रहा है।"

रवि ने साँस रोकी।

"कौन आ रहा है?" उसने पूछा। "नाम बता।"

घड़ी एक पल चुप रही। फिर सुईं रुकी, और आवाज़ आई — इतनी धीमी कि लगा किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया हो।

"नाम नहीं बताऊँगा। पर इतना सुन ले — कल दुकान पर जो चाय पीने आएगा, वो तेरे पापा की आख़िरी रात का चौथा आदमी है।"

रवि की उँगलियाँ खिड़की की सलाख पर जम गईं। बाहर गली में एक कुत्ता भौंका, और दूर कहीं बारिश की आवाज़ में किसी का हँसना घुल गया।

घड़ी की आवाज़ आख़िरी बार आई — "और बेटा, कल चाय में चीनी कम डालना। वो आदमी कड़वी चाय पीता है।"

॥

बंसल की आख़िरी बात कान में ऐसे बैठी थी जैसे किसी ने कील ठोंक दी हो — "मैं तेरे पापा को जानता था। और मुझे लगता है, तू भी वही रास्ता चुन रहा है जो उसने चुना था।"

रवि ने रात भर आँख नहीं लगाई। खिड़की के पास बैठा रहा, और बारिश की बूँदें मोटर पर टपकती रहीं — टक… टक… टक। घड़ी उसकी हथेली में रखी थी, ठंडी, चुप। जैसे कोई मुँह फेरकर सो गया हो।

सुबह जब पहली किरण गली में आई, वो उठा। माँ को बिना जगाए, चुपचाप चप्पल पहनी और बाहर निकला। बारिश रात भर पड़ी थी, कीचड़ घुटनों तक छपाक, छपाक कर रहा था।

श्मशान के पीछे की झोपड़ी तक पहुँचते-पहुँचते उसकी साँस फूल गई थी, और आँखें लाल थीं — नींद की नहीं, सवालों की।

क़ासिम भाई झोपड़ी के बाहर चटाई पर बैठे थे। सामने मिट्टी का चूल्हा, ऊपर ताँबे की केतली, और उसमें पानी उबल रहा था। भाप उनके चश्मे पर जम रही थी और वो साफ़ नहीं कर रहे थे।

रवि ने घड़ी सामने रख दी — चटाई पर, क़ासिम भाई के घुटनों के पास।

"बाबा," रवि की आवाज़ कर्कश थी, जैसे रात भर किसी ने गला सुखा दिया हो। "आज मुझे सच चाहिए। पूरा सच।"

क़ासिम भाई ने केतली से पानी छाना। कुछ नहीं बोले।

"ये घड़ी क्या है?" रवि ने पूछा। उसका हाथ काँप रहा था, पर आवाज़ वो ठंडी और धीमी कर चुका था जो लोग सबसे ज़्यादा डरते हैं। "ये क्यों बोलती है? ये मुझे ताक़त क्यों देती है? और… और कभी-कभी इसकी आवाज़ पापा जैसी क्यों लगती है? बाबा, बताइए!"

क़ासिम भाई ने प्याली धरी, और फिर बहुत देर तक चुप रहे। झोपड़ी के बाहर कोई चिड़िया चहचहा रही थी, बस वही आवाज़ थी।

फिर उनका हाथ ऊपर उठा। उन्होंने चश्मा पकड़ा और उतार दिया।

रवि के हाथ के नीचे चटाई का तिनका चटक गया।

क़ासिम भाई अंधे नहीं थे। उनकी आँखें देख रही थीं — बस उनमें इतनी थकान थी जैसे दस साल से सोए ही न हों। दस साल की क़ैद, दस साल का डर, दस साल की चुप्पी — सब उन आँखों में बैठा था, तरल और बुझा हुआ।

"बैठ, बेटा," उन्होंने धीरे से कहा।

रवि बैठ गया। घुटने पर घुटने रखकर।

"अब जो सुनाऊँगा, उसे लड़के जैसा मत सुनना। आदमी जैसे सुनना।" क़ासिम ने घड़ी की तरफ़ देखा, फिर उनकी आवाज़ और धीमी हुई। "तेरे अब्बू… रघु यानी तेरे पापा… उन्होंने ये घड़ी बनाई थी। पहले उन्होंने सोचा था कि एक ऐसी चीज़ बनाऊँगा जो ग़रीबों की तकलीफ़ पहचाने। जो सही वक़्त पर सही आदमी की मदद करे।"

"पर ये घड़ी तो…" रवि ने घड़ी उठाई, "ये तो सिर्फ़ सुइयाँ हैं, बाबा। एक टूटी सुई।"

"यही तो पापा का करिश्मा है, बेटा।" क़ासिम भाई मुस्कुराए, बहुत पतली मुस्कान, जैसे लंबे वक़्त बाद किसी ने होंठ हिलाए हों। "बाहर से देखो तो लोहा है। अंदर से देखो तो हिसाब है। और उस हिसाब से ज़्यादा गहरा… एक दिल है।"

रवि ने घड़ी कान के पास लाई। जैसे किसी सीप को कान से लगाकर समुद्र सुना जाता है।

"तेरे पापा जानते थे," क़ासिम ने कहा, "कि जो सच के साथ खड़ा होगा, उसके कितने दुश्मन होंगे। उन्हें पता था कि वो इस शहर में ज़्यादा नहीं टिकेंगे। तो उन्होंने घड़ी में अपनी जान का एक टुकड़ा डाल दिया।"

रवि की साँस ठहर गई।

"जब तू इससे बात करता है," क़ासिम ने धीरे से कहा, "तो तू अपने पापा से बात करता है, बेटा।"

रवि ने चटाई पकड़ ली, दोनों हाथों से, जैसे ज़मीन खिसक रही हो। उसने एक गहरी साँस ली — बहुत गहरी — और मुँह से हवा ऐसे निकली जैसे वर्षों से रुकी थी। फिर आँसू आया। बहुत धीरे, बहुत शांति से, बिना सिसकी — सिर्फ़ गाल पर एक लकीर दौड़ी और ठुड्डी से टपक गिरी। उसने पोंछा नहीं।

"ये घड़ी उस दिन भी थी, बेटा," क़ासिम ने कहा। "जिस दिन तूने पहली बार मिशन पूरा किया था। उसने तुझे नब्ज़ की तरह महसूस किया था।"

रवि ने घड़ी अपनी हथेली पर सीधी रखी। काँपती हथेली। और घड़ी की वो टूटी, थोड़ी झुकी सुई उसकी हथेली में चुभ गई।

उसने पीछे हाथ नहीं खींचा।

वो सुई उसकी हथेली में धँसी रही, और वो दबाता रहा। खून की एक छोटी बूँद लोहे पर बैठ गई। उसे लगा — जैसे पापा का हाथ उसकी हथेली पर है।

"बहुत दिन तक इसे बंद रखा था मैंने, बेटा," क़ासिम भाई बोले। "जिस दिन से ट्रस्ट लूटा गया। डर था कि कहीं ये घड़ी भी उनके हाथ लग जाए। किसी ऐसे हाथ में पड़ जाए जो इससे ग़रीबों को डराने का काम ले।" उन्होंने चश्मा वापस नहीं पहना। "पर तू आया। तेरे हाथ की गरमी में ये फिर जागी। तेरे पापा ने तुझे ही चुना था, बेटा। ये सब इत्तेफ़ाक़ नहीं है।"

रवि ने घड़ी उठाई, और बहुत धीरे से बोला, "पापा…"

घड़ी चुप रही। सुई स्थिर। पर रवि को लगा, जैसे किसी ने उसके सिर पर हाथ रखा हो।

तभी फ़ोन बजा।

रवि ने चौंककर जेब से निकाला। लुट्टन का नाम चमक रहा था। उसने उठाया।

"यार रवि? सुन, सुन!" लुट्टन की आवाज़ हाँफ रही थी, और पीछे किसी के भागने की आवाज़ आ रही थी। "गली में मुश्ताक़ के दो आदमी घूम रहे हैं। काले कपड़े, और… और वो रघु के पास वाली चाय की दुकान पर पूछ रहे हैं — 'रवि की माँ की दवाई कहाँ से आती है?' बीबी को पूछ रहे हैं, यार! मैंने सुना खुद अपने कानों से!"

रवि के हाथ से घड़ी फिसलने लगी, उसने कसकर पकड़ ली।

"कहाँ है तू?" लुट्टन फूँक-फूँक कर बोला। "मैं तेरी दुकान पर आया, शटर पर ताला। माँ को फ़ोन किया, तो वो कहती हैं — 'रवि सुबह से नहीं है।' यार, तू कहाँ मर गया है?"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho