Billionaire Empire System – Chapter 99
"काग़ज़ों के हिसाब के लिए?" रवि की आवाज़ धीमी थी। ठंडी। "ये काग़ज़ जिनका हिसाब है, साहब, वो कहाँ हैं?"
बलवंत मुस्कुराया। कुर्सी छोड़कर मेज़ तक आया और इरा के गिरे हुए काग़ज़ों में से एक उठाया। उसकी उँगली पन्ने पर फिरी — धीरे, प्यार से, जैसे कोई अपने बच्चे का सिर सहला रहा हो।
"बेटा," उसने कहा, "ये सबूत तो मैंने ही तुम्हें दिया था।"
रवि का दिल एक पल के लिए रुक गया।
"मतलब?" इरा की आवाज़ फूटी। "मतलब ये…" उसने काग़ज़ों की तरफ़ देखा, फिर बलवंत की तरफ़, फिर रवि की तरफ़।
बलवंत ने बहुत धीरे से कहा, "तेरे पापा के मरने के बाद, मैंने ही सोचा — एक रिपोर्टर बेटी को इंसाफ़ की भूख कैसे दूँ?" उसने इरा के कंधे की तरफ़ देखा, जैसे कोई शिक्षक अपने सबसे प्यारे छात्र को देखता हो। "तुम्हारी आँखों में वो भूख देखी तो लगा, क्यों न ये काग़ज़ तुम्हारे रास्ते में रख दूँ। ताकि तुम खुद मेरे पास आ जाओ। तुम्हारा सारा सच — मेरे हाथ से निकला हुआ हो, ये मुझे पसंद आया।"
इरा ने रवि की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो पूछ नहीं पा रही थी — क्या तुम्हें पता था?
रवि ने उसे देखा और धीरे से सिर हिलाया — नहीं।
इरा कुर्सी के सहारे खड़ी रही। उसका चेहरा सफ़ेद था। और उसके होंठ काँप रहे थे — वो इरा ही थी जो हर बात में सवाल करती थी, हर बात में गवाह ढूँढती थी, और आज खुद बेनक़ाब खड़ी थी।
"बेटा," बलवंत ने रवि की तरफ़ बढ़ते हुए कहा, "मैंने तुम्हारे पापा की परछाईं से ही तुम्हें बड़ा किया है।" उसकी उँगली हवा में उठी। "घड़ी लौटा दो। माँ का इलाज मेरी ज़िम्मेदारी। पिंकी की पढ़ाई मेरी ज़िम्मेदारी। जो तुम्हें चाहिए।"
रवि चुप खड़ा रहा।
बलवंत इरा के पास आया। वो उसके सामने खड़ा हो गया, इतना करीब कि दोनों की साँसें मिल रही थीं। इरा पीछे नहीं हटी।
"और ये लड़की," बलवंत ने धीरे से कहा, जैसे कोई मिठाई चख रहा हो, "जो तुम्हारे साथ खड़ी है।" उसकी आँखें इरा पर जम गईं। "इसका बाप भी मेरी वजह से गया था।" उसने एक कदम और बढ़ाया। "और अब…" वो फुसफुसाया, "…इसकी जान भी मेरे हाथ है।"
इरा ने उसकी आँखों में देखा। उसका डर उसके चेहरे से बह रहा था — जैसे किसी ने उसके अंदर का पानी खींच लिया हो। पर उसने अपना हाथ कुर्सी पर रखा, खुद को सीधा किया, और काँपती आवाज़ में बोली —
"मेरे अब्बू के क़ातिल," उसने कहा, "आप यहाँ मुँह उठाकर खड़े हैं?"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
बाहर लकड़ी की घड़ी टिक-टिक कर रही थी।
और रवि की जेब में, टूटी घड़ी की सुइयाँ — जो अब तक स्थिर थीं — धीरे-धीरे घूमने लगीं।
॥
बलवंत राय की आवाज़ कमरे में ऐसे फैली जैसे गरम तवे पर पानी गिरा हो — "आओ बेटा, तुम्हारी ही बात हो रही थी।"
रवि दरवाज़े पर खड़ा था। उसके पैर जमे हुए थे। सामने इरा खड़ी थी, उसके हाथ से काग़ज़ गिर रहे थे, हवा में लहराते हुए फ़र्श पर। नरेश बंसल चमड़े की कुर्सी पर बैठा था, हाथ में सिगार, होंठों पर वो मुस्कान जो कहती है — मैं जानता था तुम आओगे। और उनके पीछे, कुर्सी पर, सफ़ेद कुर्ते में, गले में सोने की चेन — बलवंत राय। वो बैठा था, जैसे ये पूरा दफ़्तर उसका हो, जैसे ये पूरी दुनिया उसकी हो।
"अंदर आओ, बेटा," बलवंत ने हाथ से इशारा किया। "दरवाज़े पर खड़े मत रहो। घर जैसा समझो।"
रवि ने एक कदम अंदर रखा। फिर दूसरा। उसकी आँखें इरा पर थीं। वो काँप रही थी। उसके होंठ हिल रहे थे, पर कोई आवाज़ नहीं निकल रही थी। इरा — जो हर बात का जवाब देती थी, जो हर सवाल का सवाल बनाती थी — आज चुप खड़ी थी।
"मैडम," बलवंत ने इरा की तरफ़ देखा, "आप बैठिए। प्लीज। चाय आएगी। और बेटा —" उसने रवि की तरफ़ देखा, "— तुम भी। देखो, आज इत्तेफ़ाक़ देखो। मैं यहाँ सिर्फ़ काग़ज़ों के एक हिसाब के लिए आया था, और तुम दोनों यहीं मिल गए।"
"काग़ज़ों के हिसाब के लिए?" रवि की आवाज़ धीमी थी। ठंडी। "ये काग़ज़ जिनका हिसाब है, साहब, वो कहाँ हैं?"
बलवंत मुस्कुराया। कुर्सी छोड़कर मेज़ तक आया और इरा के गिरे हुए काग़ज़ों में से एक उठाया। उसकी उँगली पन्ने पर फिरी — धीरे, प्यार से, जैसे कोई अपने बच्चे का सिर सहला रहा हो।
"बेटा," उसने कहा, "ये सबूत तो मैंने ही तुम्हें दिया था।"
रवि का दिल एक पल के लिए रुक गया।
"मतलब?" इरा की आवाज़ फूटी। "मतलब ये…" उसने काग़ज़ों की तरफ़ देखा, फिर बलवंत की तरफ़, फिर रवि की तरफ़।
बलवंत ने बहुत धीरे से कहा, "तेरे पापा के मरने के बाद, मैंने ही सोचा — एक रिपोर्टर बेटी को इंसाफ़ की भूख कैसे दूँ?" उसने इरा के कंधे की तरफ़ देखा, जैसे कोई शिक्षक अपने सबसे प्यारे छात्र को देखता हो। "तुम्हारी आँखों में वो भूख देखी तो लगा, क्यों न ये काग़ज़ तुम्हारे रास्ते में रख दूँ। ताकि तुम खुद मेरे पास आ जाओ। तुम्हारा सारा सच — मेरे हाथ से निकला हुआ हो, ये मुझे पसंद आया।"
इरा ने रवि की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो पूछ नहीं पा रही थी — क्या तुम्हें पता था?
रवि ने उसे देखा और धीरे से सिर हिलाया — नहीं।
इरा कुर्सी के सहारे खड़ी रही। उसका चेहरा सफ़ेद था। और उसके होंठ काँप रहे थे — वो इरा ही थी जो हर बात में सवाल करती थी, हर बात में गवाह ढूँढती थी, और आज खुद बेनक़ाब खड़ी थी।
"बेटा," बलवंत ने रवि की तरफ़ बढ़ते हुए कहा, "मैंने तुम्हारे पापा की परछाईं से ही तुम्हें बड़ा किया है।" उसकी उँगली हवा में उठी। "घड़ी लौटा दो। माँ का इलाज मेरी ज़िम्मेदारी। पिंकी की पढ़ाई मेरी ज़िम्मेदारी। जो तुम्हें चाहिए।"
रवि चुप खड़ा रहा।
बलवंत इरा के पास आया। वो उसके सामने खड़ा हो गया, इतना करीब कि दोनों की साँसें मिल रही थीं। इरा पीछे नहीं हटी।
"और ये लड़की," बलवंत ने धीरे से कहा, जैसे कोई मिठाई चख रहा हो, "जो तुम्हारे साथ खड़ी है।" उसकी आँखें इरा पर जम गईं। "इसका बाप भी मेरी वजह से गया था।" उसने एक कदम और बढ़ाया। "और अब…" वो फुसफुसाया, "…इसकी जान भी मेरे हाथ है।"
इरा ने उसकी आँखों में देखा। उसका डर उसके चेहरे से बह रहा था — जैसे किसी ने उसके अंदर का पानी खींच लिया हो। पर उसने अपना हाथ कुर्सी पर रखा, खुद को सीधा किया, और काँपती आवाज़ में बोली —
"मेरे अब्बू के क़ातिल," उसने कहा, "आप यहाँ मुँह उठाकर खड़े हैं?"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
बाहर लकड़ी की घड़ी टिक-टिक कर रही थी।
और रवि की जेब में, टूटी घड़ी की सुइयाँ — जो अब तक स्थिर थीं — धीरे-धीरे घूमने लगीं।
बलवंत का चेहरा बदला। पहली बार। उसकी उँगली, जो अब तक हवा में थी, काँपी। वो इरा से एक कदम पीछे हटा, फिर खुद को संभाला और हँसने की कोशिश की — पर हँसी गले में ही अटक गई।
"बेटी," उसने कहा, "ज़ुबान संभालकर। ये दफ़्तर है।"
"ये दफ़्तर है," इरा ने कहा, "और आप यहाँ कुर्सी पर बैठे हैं। मेरे अब्बू को जिसने मरवाया, वो मेरे सामने चाय की बात कर रहा है।" उसकी आवाज़ अब काँप नहीं रही थी। वो साफ़ हो रही थी, हर शब्द के साथ। "मैं दस साल से इन काग़ज़ों को सीने से लगाए घूम रही थी। रात-रात भर इन्हें सहेजती थी। सोचती थी — एक दिन इन्हें लेकर आऊँगी, और सच सबके सामने होगा।" उसने आँखें ऊपर उठाईं। "और आपने इन्हें… मेरे हाथ में खिलौना बनाकर रख दिया।"
बलवंत बोला नहीं।
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