Billionaire Empire System – Chapter 92
उसने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर से काग़ज़ों का मोटा बंडल निकला। काग़ज़ पीले पड़ चुके थे, किनारे मुड़े हुए, और जहाँ मोड़ थे वहाँ से उम्र की खुशबू आ रही थी — पुरानी किताबों वाली, बंद कमरे वाली।
इरा ने पहला पन्ना खोला।
पन्ने के ऊपर टाइप में साफ़ लिखा था — "सेवा सदन ट्रस्ट — हिसाब खाता — खंड तीन।"
नीचे नाम थे। रकम थीं। रकम के आगे कोई ज़ोर नहीं लगा था — सीधे चलती हुई, चौंका देने वाली रकमें। एक पंक्ति, फिर दूसरी, फिर तीसरी। ग्यारह नाम, ग्यारह रकमें। और हर पन्ने के नीचे एक गोल मोहर थी — घिसी हुई, पर पढ़ी जा सकती थी।
इरा ने उँगली उस मोहर पर रखी। उसकी साँस रुक गई।
"माँ…" उसकी आवाज़ फट गई, "ये मोहर…"
"पढ़ ले," फ़ातिमा बी ने कहा, बहुत धीरे।
इरा ने पढ़ा। धीरे-धीरे, हर अक्षर को अलग-अलग।
"राय कंस्ट्रक्शन… बलवंत राय…"
कमरे में कुछ नहीं बोला। मशीन चुप थी। कोई पंखा नहीं चल रहा था। बाहर कोई बच्चा गली में चिल्लाया, पर वो आवाज़ दूर की थी, किसी दूसरी दुनिया से।
रवि दरवाज़े से धीरे से अंदर आया। उसने कुछ नहीं कहा, बस पास आकर खड़ा हो गया।
इरा ने दूसरा पन्ना खोला। तीसरा। चौथा। हर पन्ने पर वही मोहर। हर पन्ने के नीचे एक-दो नाम — ज़मीनों के, दुकानों के, किसी फ़ैक्टरी के मज़दूरों के। और हर पन्ने के कोने पर, हाशिये में, एक छोटा सा हस्ताक्षर — घसीटी हुई लिखाई में, जिसे इरा ने एक पल में पहचान लिया।
उसका हाथ मुँह पर चला गया।
"अब्बू की लिखाई," उसने कहा, और फिर वो बैठ गई — वहीं ज़मीन पर, मशीन के पास, काग़ज़ों को गोद में लिए हुए, एकदम बच्चों की तरह। "ये अब्बू ने लिखा है। ये उनका हाथ है। ये हर पन्ने पर मेरे अब्बू का हाथ है, माँ।"
फ़ातिमा बी उसके सामने बैठ गईं। धीरे से उन्होंने इरा के घुँघराले बाल पीछे किए, और इरा का सिर अपनी गोद में रख लिया। बात वो कर रही थीं जो दस साल से अंदर दबी थी — और उसे बाहर निकालने के लिए उन्हें इरा का सिर गोद में लेना पड़ा, जैसे बोलते वक़्त उन्हें किसी चीज़ का सहारा चाहिए था।
"मुझे पता था, बेटी," उन्होंने कहा। "पता था कि तेरे अब्बू को मारने वाला कोई बाहर का आदमी नहीं था। जो रोज़ उनके साथ दफ़्तर में बैठता था, जो उनके साथ चाय पीता था — वही था।"
इरा की आँखें बंद हो गईं। "तो तुमने मुझे क्यों नहीं बताया? दस साल, माँ। दस साल मैंने सोचा कि बस एक हादसा था। मैंने सोचा कि भगवान ने छीन लिया।"
फ़ातिमा बी की आवाज़ रुकी। उन्होंने इरा के माथे पर हाथ रखा।
"तू नौ साल की थी, इरा। नौ। उस रात के बाद तू तीन महीने स्कूल नहीं गई थी। रात में चीखती थी, उठकर बैठ जाती थी। डॉक्टर ने कहा था — बच्चा टूट गया है, इसे वक़्त दो।" उनकी उँगलियाँ इरा के बालों में धीरे से चलीं। "मैं तुझे कैसे बताती? मैं क्या कहती — 'तेरे अब्बू को मार दिया गया, और उनके काग़ज़ मेरे पास रखे हैं'? तू उस आदमी के दरवाज़े पर चली जाती। तू नौ साल की थी, पर ज़िद तेरी अभी जैसी थी। मैंने तुझे खोने से बचाया था, इरा। मुझे माफ़ कर दे।"
इरा ने अपना मुँह माँ की गोद में दबा लिया। रोना बहुत धीरे आया — बिना आवाज़ के, कंधों को हिलाते हुए, जैसी कोई शर्म के मारे रो रहा हो। रवि ने अपनी आँखें दूसरी तरफ़ कर लीं। उसका गला भर आया था, और वो उस घर में खड़ा था जहाँ पिता नहीं थे, और उसे लगा कि वो कमरा कितना जाना-पहचाना है।
फ़ातिमा बी ने इरा को सहलाया, और फिर रवि की तरफ़ देखा — पहली बार सीधे, आँखों में।
"बैठ जाओ, बेटा।" उन्होंने बगल में पड़ी चौकी की तरफ़ इशारा किया। "तुम्हें भी पता होना चाहिए कि तुम किस लड़ाई में खड़े हो।"
रवि बैठ गया। फ़ातिमा बी ने काग़ज़ों का एक अलग पन्ना उठाया — सबसे पुराना, जिसके कोने गोल हो चुके थे, और जो बंडल से ज़रा अलग रखा था।
"ये वो आख़िरी पन्ना है," उन्होंने कहा, "जो उन्होंने मुझे अलग देकर कहा था — 'ये डिबिया के नीचे रहेगा, मेरा सच बचा रहेगा। जिस दिन इरा बड़ी हो जाए और अपने दम पर खड़ी हो जाए — उस दिन उसे देना।'"
इरा ने पन्ना लिया। वो एक पत्र था — छोटा सा, दो लाइन का।
"अगर मैं न रहूँ — ये काग़ज़ किसी ऐसे आदमी तक पहुँचाना जो पैसे से न डरे। बलवंत राय सिर्फ़ बिल्डर नहीं है — वो उस पैसे का मालिक है जो ग्यारह हज़ार लोगों का था। मेरे पास इसका एक और हिस्सा है, जो मैंने कहीं और छिपाया है। बस एक ही डर है — कि वो मेरी बेटी तक न पहुँचे।"
इरा ने पत्र अपने सीने से लगा लिया। उसके होंठ काँप रहे थे।
"तो सबूत दो जगह हैं," रवि ने धीरे से कहा, जैसे खुद से बात कर रहा हो, "एक यहाँ, और एक कहीं और।"
फ़ातिमा बी ने उसकी तरफ़ देखा। "तुम रवि हो, है ना? चाय वाले रघु के बेटे?"
रवि ने सिर हिलाया।
फ़ातिमा बी की आँखों में कुछ आया — पहचान, फिर दर्द, फिर एक अजीब सी कोमलता। "तेरे अब्बू और मेरे सलाम, दोनों एक ही हाल में गए। मैंने सुना था। और मैं ये भी जानती हूँ कि तू तब से चुप है। पर अब तू उस आदमी के रास्ते में खड़ा है।" उन्होंने रवि का हाथ थाम लिया। उनकी उँगलियाँ सुई चलाने की आदी थीं — खुरदरी, गरम। "मेरी बेटी के साथ रहना। ये अब अपना सब कुछ भूल जाएगी, सिर्फ़ ये काग़ज़ याद रहेंगे। और जब इंसान सिर्फ़ काग़ज़ याद रखे, तब वो खुद खत्म हो जाता है।"
रवि ने इरा की तरफ़ देखा। वो अब भी ज़मीन पर बैठी थी, काग़ज़ों को गोद में लिए, आँखें लाल, पर चेहरे पर वो ज़िद लौट रही थी जो रवि जानता था।
फिर इरा ने काग़ज़ों को बहुत सँभालकर, एक-एक करके समेटना शुरू किया। उसकी उँगलियाँ अब काँप नहीं रही थीं।
"माँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बैठी हुई थी, पर साफ़, "ये सबूत है। सिर्फ़ काग़ज़ नहीं। ये ग्यारह हज़ार लोगों का सच है, और मेरे अब्बू का। मैं इसे कल चैनल ले जाऊँगी। बंसल गिरे तो ठीक, नहीं तो जो है, उसका खून बहुत सारा हो जाएगा। पर मैं इसे किसी के जेब में नहीं छिपाऊँगी, माँ। दस साल का इंतज़ार बहुत हो गया।"
फ़ातिमा बी ने कुछ नहीं कहा। बस इरा के सिर पर हाथ रखा, आँखें बंद कर लीं, जैसे कोई दुआ माँग रही हों।
रवि ने धीरे से कहा, "इरा…"
इरा पलटी। और उस पल, उसके चेहरे पर जो था — वो रवि ने पहले कभी नहीं देखा था। दस साल का पीछा, दस साल का सवाल, दस साल की अकेली लड़ाई — सब एक साथ उस चेहरे पर आ गए थे।
"रवि," उसने कहा, और उसकी आवाज़ नरम पड़ गई, "तू मेरे साथ चलेगा ना? कल। चैनल। मैं अकेले नहीं जाना चाहती।"
रवि का गला सूख गया। उसने काग़ज़ों की तरफ़ देखा। बलवंत का नाम। वो मोहर। और उसके नीचे उसका पूरा शहर।
"हाँ," उसने कहा। आवाज़ बाहर आई, पर कहीं अंदर से नहीं आई। "मैं साथ चलूँगा।"
इरा ने मुस्कुराकर सिर हिलाया, काग़ज़ अपने बैग में रखे, और फिर उठकर माँ के गले लग गई। रवि खड़ा देखता रहा — एक बेटी अपनी माँ से कुछ ऐसे चिपकी हुई जैसे वो अब कभी नहीं छूटेगी।
फिर इरा ने बैग कंधे पर टाँगा और खिड़की की तरफ़ बढ़ी — शायद कुछ सोचकर, शायद बस धूप देखने।
और रवि ने ठीक उसी पल देखा।
खिड़की के बाहर, गली के उस पार, किसी पुराने मकान की छत की परछाई में — एक आदमी खड़ा था। सफ़ेद कपड़े। और वो इरा को देख रहा था, एकटक, जैसे बहुत देर से देख रहा हो।
रवि का पूरा शरीर ठंडा हो गया। वो बिना आवाज़ किए खिड़की की तरफ़ बढ़ा, पर उसी पल वो आदमी पीछे हट गया — कोई शोर नहीं, कोई हलचल नहीं, बस अंधेरे में घुल गया, जैसे वहाँ था ही नहीं।
रवि खिड़की तक पहुँचा और बाहर झाँका। गली खाली थी। एक कुत्ता सो रहा था। एक बच्चा अपनी गेंद लेकर भाग रहा था।
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