Billionaire Empire System – Chapter 88
फिर उसने घड़ी को हथेली में कसा। "चलाओ।"
एक झनझनाहट हुई — हल्की, जैसे कान में कोई मक्खी भिनभिना रही हो। रवि ने अपने हाथों को देखा। उँगलियाँ धुँधली हो रही थीं, जैसे कोई उन पर पानी फेर रहा हो। फिर उसका पूरा हाथ, फिर बाँह। इरा ने हाँफते हुए मुँह पर हाथ रखा।
"मैं ठीक हूँ।" रवि की आवाज़ आई — कहीं से, हवा से। "दस मिनट। याद रखना।"
फिर वो दीवार के किनारे बनी पतली सीढ़ियों पर चढ़ा। पैर की आवाज़ नहीं हो रही थी। सिर्फ़ उसकी साँस थी, जो उसे अपनी ही लग रही थी।
ऊपर की कोठरी में पहुँचा तो लोहे की छड़ों की चोट और तेज़ हो गई थी। दीवार में एक बड़ा सा छेद बन चुका था। तीन आदमी वहाँ खड़े थे — एक के हाथ में हथौड़ा, दो के हाथ में छड़ें। और उनके पीछे, तिजोरी के पास, मुश्ताक़ खड़ा था, काला चश्मा, दस्ताने, और उसके होंठों पर वो पतली सी रेखा जो रवि अब पहचानता था — बेसब्री।
"तेज़!" मुश्ताक़ ने कहा। "साहब ऊपर इंतज़ार कर रहे हैं।"
रवि दीवार के सहारे खड़ा रहा। उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा था, और उसे डर था कि कहीं वो धड़कन सुनाई न दे।
छड़ ने आख़िरी चोट मारी। चटाक! पत्थर टूटा, और अंदर से धूल का एक बादल उठा। एक आदमी ने हाथ डालकर अंदर से एक छोटी लोहे की तिजोरी निकाली — जंग लगी, काली पड़ी।
"ये है?" मुश्ताक़ ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ और था — जल्दबाज़ी।
उसने तिजोरी खोली। अंदर एक छोटी थैली थी, और उस थैली के ऊपर राख पड़ी थी। मुश्ताक़ ने थैली खोली, उसमें झाँका — और उसका चेहरा कठोर हो गया।
"राख?" उसने कहा। "सिर्फ़ राख?"
उसने तिजोरी को उलट दिया। धड़ाम! वो खाली ज़मीन पर गिरी। एक पुरानी मोहर लुढ़ककर दूर जा रही थी।
"साहब को बताओ।" मुश्ताक़ ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक अब डर में बदल रही थी। "बही यहाँ नहीं है।"
रवि दीवार के सहारे खड़ा सब देख रहा था। उसने अपने पापा की राख देखी — मुश्ताक़ की हथेली पर, दस्ताने के ऊपर, उड़ती हुई। और अंदर कुछ ऐसा टूटा जो शायद पहले से टूटा हुआ था।
उसकी मुट्ठी भर गई।
तभी वो आदमी पलटा — जिसके हाथ में हथौड़ा था। उसने आँखें सिकोड़कर दीवार के सहारे देखा, जहाँ रवि खड़ा था।
"अजीब बात है…" उसने धीरे से कहा। "यहाँ हवा ऐसी क्यों है?"
रवि ने साँस रोक ली। रामदीन की आवाज़ उसके कान में गूँजी — "जब भी शमशेर का नाम सुनो, भाग जाओ।" उसका गला सूख रहा था। वो कमरे में खड़ा था, सिर्फ़ अपनी ही साँस से बचा हुआ।
"क्या हुआ?" मुश्ताक़ ने पूछा।
"कुछ नहीं।" आदमी ने कहा। "लगा जैसे कोई…" वो रुक गया। "कुछ नहीं, साहब।"
मुश्ताक़ ने राख को हथेली से झाड़ दिया और अपना मोबाइल निकाला।
"साहब।" वो बोला, आवाज़ धीमी। "तिजोरी खुली। बही नहीं है। सिर्फ़ राख है।"
उधर से कुछ कहा गया। मुश्ताक़ का चेहरा बदल गया — एक पल के लिए वो उस दस्ताने वाले हाथ की तरफ़ देखने लगा, जिसे रवि ने पहले भी देखा था। वो हाथ काँप रहा था।
"जी।" मुश्ताक़ ने कहा। "जी, साहब। समझ गया।"
उसने फ़ोन रखा और अपने आदमियों की तरफ़ देखा।
"साहब कह रहे हैं — नीचे सुरंग है। वो लोग उसी में हैं।" उसकी आवाज़ में वो ठंडक लौट आई थी। "एक को यहाँ रखो। बाकी नीचे। और सुन — अगर वो मिल जाएँ, तो…" वो रुका। "साहब ने कहा है। मुँह हमेशा के लिए बंद।"
रवि का कलेजा धक् से रह गया।
इरा और रामदीन नीचे थे।
वो पलटा, और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा — पर तभी कमरे में रोशनी की एक लकीर आई। किसी ने दरवाज़ा खोला।
"साहब आ रहे हैं।" किसी ने कहा। "गाड़ी आ गई।"
मुश्ताक़ ने अपनी क़मीज़ सीधी की और अपने आदमियों की तरफ़ देखा।
"तेज़ी करो।" उसने कहा। "साहब को इंतज़ार नहीं कराना है।"
रवि सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। एक कदम। दो कदम। नीचे से कोई आ रहा था — उसके जूतों की आवाज़ सीढ़ियों पर गूँज रही थी। रवि दीवार से चिपक गया, और वो आदमी उसके बगल से गुज़र गया, बाल-बाल।
रवि नीचे उतरा, दो-दो सीढ़ियाँ। उसकी साँस फूल रही थी, और उसे पता था कि वक़्त ख़त्म हो रहा है। सुरंग का दरवाज़ा दिखा। उसने धक्का दिया।
"इरा!" वो फुसफुसाया। "इरा, वो लोग नीचे आ —"
तभी कुछ हुआ।
जैसे किसी ने उसके शरीर पर से पर्दा खींच लिया हो। रवि ने अपने हाथ देखे — वो साफ़ दिख रहे थे। ठोस। असली।
उसका दिल ज़ोर से धड़का। दस मिनट पूरे।
और उसी वक़्त पीछे से आवाज़ आई।
"कौन है?"
रवि पलटा। मुश्ताक़, रोशनी की लकीर में खड़ा, उसी तरफ़ देख रहा था। फिर उसकी आँखें फैलीं। उसका मुँह खुला, और उसके हाथ अपने आप ऊपर उठ गए, जैसे उसने कोई भूत देखा हो।
"ये… ये यहाँ कैसे आया?" वो चीखा।
रवि ने अपने पीछे सुरंग का खुला दरवाज़ा देखा। इरा की टॉर्च की रोशनी अंदर से झाँक रही थी।
और उसके सामने, मुश्ताक़ के पीछे, दरवाज़े में एक परछाई पड़ी — लंबी, खड़ी, किसी की, जो अभी अंदर आई थी। उस परछाई ने धीरे से कहा, "तो ये है रघु का बेटा।"
वो आवाज़ ठंडी थी। बहुत ठंडी।
रवि ने अपनी मुट्ठी कस ली। घड़ी उसकी जेब में थी, और अंदर कुछ नहीं बचा था — न दस मिनट, न अठारह सौ पॉइंट।
सिर्फ़ वो, उसकी ज़िद, और सामने खड़ा शमशेर।
॥
रवि को लगा जैसे किसी ने उसके शरीर से पर्दा खींचकर फेंक दिया हो। वो बीच कमरे में खड़ा था — ठोस, असली, सबके सामने। मुश्ताक़ की आँखें फैली हुई थीं। वो एक पल के लिए पीछे हटा, जैसे सामने कोई भूत खड़ा हो। फिर उसका चेहरा सख़्त हो गया और उसने इशारा किया।
दो आदमी दौड़कर आए। एक ने रवि की बाँह पकड़ी, दूसरे ने कमर। रवि ने ज़ोर लगाया, धक्का दिया, पर अंदर कुछ खाली था — दो घंटे की भूख, पूरी रात की जाग, और वो शक्ति जो हाथ से निकल चुकी थी। उसे लोहे की कुर्सी पर गिराकर बिठाया गया। रस्सी कलाइयों पर कसी, चटाक की आवाज़ आई। पीछे से कोई बोला, "देखते हैं, अब कितना अकड़ता है।"
मुश्ताक़ ने दस्ताना उतारा। उसके हाथ की जलन खुल गई — लाल, सिकुड़ी, पुरानी। वो धीरे-धीरे रवि के सामने आया, अपनी उँगली रवि के कंधे पर रखी, और धीमी आवाज़ में बोला, "ये निशान तेरे ठीक करने वाले अपने पापा की याद दिलाता है। ये हाथ तेरे पापा की एक बात पर जला था। बोलो, उस वक़्त तुम्हारी माँ रसोई में थी?"
रवि ने उसकी आँखों में देखा और कुछ नहीं बोला। मुश्ताक़ का चेहरा टूटा। उसने रवि के गाल पर ज़ोर से हाथ मारा — चटाक! रवि का सिर एक तरफ़ झुका, होंठ फटा, गर्म खून की लकीर ठुड्डी तक आई।
"तेरे पापा भी ऐसे ही अकड़कर बैठे थे।" मुश्ताक़ ने कहा। "बोले थे — 'मेरे बच्चों को मेरी नज़र में मत लाना।' अब देख, तू खुद मेरी नज़र में आ गया।"
रवि ने अपना फटा होंठ जीभ से छुआ और धीरे से कहा, "पापा ने एक बात ग़लत कही थी।" मुश्ताक़ रुका। "वो ये कि मैं उनकी नज़र में हूँ। कोई मुझे लाने की ज़रूरत नहीं।"
मुश्ताक़ की आँख झपकी। उसने हाथ उठाया कि फिर मारे, पर तभी बाहर गाड़ी की रोशनी आई। कमरे में सब सिर झुका लेकर खड़े हो गए। मुश्ताक़ ने दस्ताना वापस पहना, क़मीज़ सीधी की, और दरवाज़े की तरफ़ मुँह किया।
बलवंत राय अंदर आया। सफ़ेद कुर्ता, सोने की चेन, चमड़े के जूते जिनकी आवाज़ फ़र्श पर धीमी होकर गिर रही थी। उसके पीछे दो आदमी चुपचाप चल रहे थे। वो रवि के सामने आकर रुका। उसने रवि के फटे होंठ और बँधी कलाइयों को देखा, फिर मुश्ताक़ की तरफ़ देखा और उतनी ही धीमी आवाज़ में बोला जितनी धीमी रवि की अपनी थी।
"कुर्सी खोलो। इसे बैठने दो। चाय लाओ।"
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