Billionaire Empire System – Chapter 87
अंदर अंधेरा था। रवि ने टॉर्च जलाई। रोशनी में एक छोटा कमरा दिखा — लकड़ी की मेज़, एक कुर्सी, दीवार पर टँगी एक तस्वीर।
रवि उस तस्वीर के पास गया।
तस्वीर में तीन लोग थे। बीच में एक आदमी — मोटा चश्मा, मुस्कुराता हुआ। रवि का पापा।
उसके बाईं तरफ़ एक दुबला आदमी, चश्मा, हाथ में फ़ाइल — सलाम ख़ान।
और दाईं तरफ़ एक आदमी, जिसका चेहरा तस्वीर में उतरा हुआ था — जैसे किसी ने उसे जान-बूझकर फाड़ दिया हो। बस उसका सूट दिख रहा था, सफ़ेद।
"ये तीसरा कौन है?" लुट्टन ने धीरे से पूछा।
इरा ने तस्वीर को गौर से देखा। उसकी आवाज़ ठंडी हो गई। "ये शमशेर है।"
रवि ने तस्वीर के नीचे देखा। लकड़ी के फ़्रेम पर कोई ने कुछ खरोंचा था — "तीन में से एक कायर, एक मुर्दा, और एक…"
बाक़ी खुरचा हुआ था।
रवि का गला सूखा। उसने धीरे से कहा, "एक मुर्दा।"
इरा ने उसका हाथ पकड़ा। "रवि।"
तभी नीचे से ज़ोरदार धड़ाम आई — इतनी ज़ोरदार कि पूरा कमरा हिल गया।
"दीवार खुल गई, सर! सीढ़ियाँ हैं! वो नीचे गए हैं!"
रवि ने कमरे में चारों तरफ़ देखा। वहाँ से बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं था। सिर्फ़ एक छोटी खिड़की — बहुत छोटी, जिस पर लोहे की जाली थी।
इरा दौड़कर खिड़की के पास गई। "ये पीछे की गली में खुलती है।"
"जाली?" रवि ने पूछा।
"पुरानी है।" इरा ने दोनों हाथ लगाए। जाली की एक छड़ कच्ची सी थी। वो ज़ोर लगाने लगी — लोहे में जंग भरी थी।
लुट्टन भी आया, उसने अपनी पूरी ताक़त लगाई। पसीना उसके माथे से बह रहा था।
छटाक! छड़ टूट गई।
"रवि!" इरा ने कहा। "तुम पहले जाओ।"
"नहीं। तुम पहले।"
"बहस मत करो।" उसकी आँखें चमक रही थीं। "मैं बाद में आऊँगी। पर अगर मैं न आऊँ…"
"तो?" रवि ने कहा, आवाज़ धीमी।
"तो उस बही को लेकर आगे बढ़ना।" उसने कहा। "मेरे अब्बू के लिए। और अपनी माँ के लिए।"
पल भर के लिए कमरा चुप हो गया।
रवि ने उसकी आँखों में देखा। उसकी साँस रुकी हुई थी।
तभी नीचे से धड़ाम! और फिर एक और आवाज़ — जूतों की धमक सीढ़ियों पर। वो आ रहे थे।
रवि ने इरा की कलाई पकड़ी। "नहीं।" उसने कहा, आवाज़ बहुत धीमी। "मैंने कहा था ना — अब कोई अकेले नहीं।"
उसने लुट्टन की तरफ़ देखा। "तू खिड़की से जा। ऊपर वाली छत पर चढ़। फिर उन्हें आवाज़ दे — 'भाग गए, भाग गए, पीछे की गली से!' वो दौड़ेंगे।"
लुट्टन का रंग उड़ गया। "और तुम?"
"हम नीचे जाएँगे।" रवि ने कहा। "अंधेरे में। मैंने अभी देखा — वहाँ एक और दरवाज़ा था, बक्से के पीछे। मुझे लगता है वो बाहर निकलता है।"
इरा ने उसका हाथ कसकर पकड़ा। "तुम झूठ बोल रहे हो। तुम्हें पक्का नहीं पता।"
रवि हँसा — पहली बार उस रात। हँसी थोड़ी दरार वाली थी, पर असली।
"नहीं पता।" उसने कहा। "पर पापा बेवकूफ़ नहीं थे। उन्होंने ये जगह बनाई, तो कोई रास्ता तो निकाला ही होगा।"
लुट्टन ने उसकी तरफ़ देखा, फिर उसकी आँखों में कुछ बदला। उसने अपनी बनियान सीधी की। "ठीक है।" उसने कहा। "पर सुन — अगर मैं वो चीख नहीं लगा पाया, तो श्राप लगेगा।" उसने धीरे से जोड़ा, "पर भगवान भी मुझे भूल गया है… तो शायद श्राप से भी काम चल जाए।"
वो खिड़की पर चढ़ा। उसका पेट आड़ा आ रहा था। रवि ने उसे धक्का दिया। लुट्टन बाहर गिरा और धप! से नीचे गली में गिरा — फिर उसकी आवाज़ आई, ज़ोर से, फटी हुई — "भाग गए! भाग गए! पीछे की गली से!"
नीचे जूतों की धमक रुकी। फिर वो ठंडी आवाज़ आई — "पीछे! सब पीछे!"
रवि ने इरा की कलाई पकड़ी और उसे खींचकर नीचे ले गया। अंधेरे में वो बक्से के पीछे पहुँचे। रवि ने हाथ आगे बढ़ाया — दीवार पर प्लास्टर उखड़ा था, और उसके नीचे लकड़ी का एक पुराना दरवाज़ा।
उसने धक्का दिया। वो छन्न! से खुला।
अंदर सुरंग जैसी गली थी, बहुत पतली, दीवारों में से पानी टपक रहा था।
इरा ने टॉर्च जलाई। "ये कहाँ जाती है?"
"पता नहीं।" रवि ने कहा। "पर शहर के नीचे से तो जाती ही है।"
वो अंदर घुसे। रवि ने दरवाज़ा पीछे से बंद किया।
दूर, ऊपर, सेवा सदन की खिड़कियों में रोशनी दौड़ रही थी। एक आदमी चिल्लाया — "साहब! तिजोरी मिल गई… और उसके पीछे दीवार में एक खोखला है, साहब, कुछ है अंदर!"
वो ठंडी आवाज़ रुकी। फिर बहुत धीमे से बोली — इतना धीमे कि सुरंग तक सुनाई दी — "अब जो भी है, निकालो। और जिसने इसे देखा है… उसका मुँह हमेशा के लिए बंद कर दो।"
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"अब जो भी है, निकालो। और जिसने इसे देखा है… उसका मुँह हमेशा के लिए बंद कर दो।"
वो आवाज़ सुरंग में दीवारों से टकराकर लौटी। रवि की साँस रुकी हुई थी। अंदर अंधेरा इतना था कि अपनी ही उँगलियाँ नहीं दिख रही थीं। ऊपर से खट-खट-खट की आवाज़ आ रही थी — लोहे की छड़ें दीवार पर पड़ रही थीं।
इरा ने टॉर्च धीमी कर दी। "वो लोग उस खोखले तक पहुँच जाएँगे।" उसकी आवाज़ फुसफुसाहट थी, पर उसमें वो ठंडा गुस्सा था जो रवि अब पहचानने लगा था।
रामदीन सुरंग की दीवार से टिका बैठा था। उसके हाथ छड़ी पर काँप रहे थे।
रवि उसके पास झुका। "पंडित जी, उस खोखले में क्या है? सच बताइए।"
रामदीन की खाली आँखें उसकी तरफ़ उठीं, जैसे अंधेरा भी देख सकती हों। "राख, बेटा।" उसने कहा, और आवाज़ टूट गई। "सिर्फ़ राख। और एक पुरानी मोहर। असली काग़ज़ कभी वहाँ थे ही नहीं। तेरे पापा ने वो खोखला उसी दिन बनवाया था जिस दिन उन्हें पहली धमकी मिली थी — किसी को भरमाने के लिए।"
"तो असली बही कहाँ है?"
रामदीन ने सिर हिलाया, धीरे-धीरे। "यही तो… मुझे नहीं पता। तेरे पापा ने मुझे बस इतना कहा था — 'रामदीन, अगर मेरे साथ कुछ हो जाए, तो सबसे पहले तिजोरी खुलवा देना। वो देखकर वो लोग खुश हो जाएँगे, और असली चीज़ बची रहेगी।'"
रवि ने आँखें बंद कीं। पापा ने सब सोच रखा था। हर कदम। दस साल पहले।
ऊपर से एक और आवाज़ आई — इस बार लोहे पर हथौड़े की। धड़ाम! प्लास्टर का बुरादा सुरंग में गिरा।
"वो अब पत्थर तोड़ रहे हैं।" इरा ने कहा। "हमें कुछ करना होगा।"
रवि ने अपनी जेब से घड़ी निकाली। अंधेरे में उसका टूटा शीशा रवि की हथेली में ठंडा लगा।
"सुन।" उसने धीरे से कहा। "मुझे एक रास्ता चाहिए। दिखाई न देने का।"
घड़ी की आवाज़ आई — छोटी, चटपटी, जैसे कोई बहुत जल्दी में बोल रहा हो। "दिखाई न देना — अठारह सौ पॉइंट। दस मिनट का। दस मिनट बाद खुद लौट आएगा। और सुन — तीन लोगों के लिए नहीं है। एक ही।"
"एक काफ़ी है।" रवि ने कहा।
इरा ने उसकी कलाई पकड़ ली। "नहीं।"
"इरा —"
"नहीं!" उसकी आवाज़ सुरंग में गूँजी। रामदीन ने सिर उठाया। "तुम अकेले ऊपर जाओगे, जहाँ तीन-चार आदमी हैं, हाथ में सिर्फ़ दस मिनट? और अगर वो दस मिनट ख़त्म हो गए जब तुम बीच में हो?"
रवि ने उसका हाथ अपनी हथेली में लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं — डर से नहीं, बारिश से।
"सुन।" वो धीमे से बोला, और उसकी आवाज़ में वो ठहराव था जो अब सिर्फ़ सच्ची बातों में आता था। "अगर हम तीनों यहाँ रहेंगे, तो वो दीवार तोड़कर अंदर आएँगे। और फिर तीनों पकड़े जाएँगे। पर अगर मैं ऊपर जाऊँ, तो मैं उन्हें भटका सकता हूँ। उन्हें लगेगा हम भाग गए।"
"और तुम पकड़े गए तो?"
"तो तुम रामदीन जी को लेकर सुरंग के आख़िर तक जाओ।" उसने उसकी आँखों में देखा। "और बही को लेकर आगे बढ़ना। तुमने खुद कहा था — कोई अकेले नहीं। तो अकेले मैं भी नहीं लड़ूँगा। पर आज रास्ता यही है।"
इरा ने उसकी तरफ़ देखा। उसके होंठ काँप रहे थे, पर आँखें सूखी थीं।
"दस मिनट।" उसने कहा, जैसे कोई कसम दे रही हो। "दस मिनट बाद अगर तुम वापस नहीं आए, तो मैं ऊपर आऊँगी। भले मुझे कुछ हो जाए।"
रवि मुस्कुराया। "ठीक है।"
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