Billionaire Empire System – Chapter 89
मुश्ताक़ ने कुछ कहना चाहा। बलवंत ने उँगली उठाई — बस इतना। मुश्ताक़ चुप हो गया। रस्सी खुली। रवि ने अपनी कलाइयाँ मली; निशान लाल थे और उँगलियाँ सुन्न थीं। बलवंत सामने वाली कुर्सी पर बैठा — वो कुर्सी जिसकी एक टाँग में पीतल की चमक थी।
चाय आई। कटोरी में नहीं, चाँदी की प्याली में। भाप निकल रही थी। बलवंत ने प्याली उठाई, एक बड़ा घूँट लिया, और गर्म से मुँह नहीं बनाया। उसने रवि की तरफ़ प्याली बढ़ाई।
"पी।" उसने कहा। "अब भी तेरे पापा की तरह ज़िद करेगा तो ठंडी हो जाएगी।"
रवि ने प्याली नहीं ली। बलवंत हँसा, धीरे, पेट से नहीं, गले से। "तेरे पापा भी ऐसा ही करते थे। देता था तो पहले नहीं लेते। फिर जब मैं खुद पीकर रख देता, तो उठाकर पी लेते।" उसने प्याली वापस मेज़ पर रखी। "बिना चीनी पीते थे। कहते थे — चीनी चाय के अंदर वाले सच को छिपा देती है।"
रवि का दिल काँपा। उसके पापा ऐसा ही कहते थे। रवि ने बचपन में एक बार चीनी डालकर दी थी और पापा ने हँसकर कहा था — "बेटा, चाय का असली स्वाद कड़वाहट में है। जो कड़वा पी ले, वो ज़िंदगी का हर कड़वा पी जाता है।" रवि का गला सूख गया। ये आदमी उसके पापा की आदतें जानता था — वो आदतें जो पैसों से नहीं खरीदी जातीं।
"बेटा।" बलवंत ने आवाज़ नरम करके कहा। "मैं तेरा दुश्मन नहीं, तेरा वली हूँ। तेरे पापा ने मेरा साथ छोड़ा। बताया नहीं? मैंने उन्हें आधा ट्रस्ट देने को कहा था। कहा — 'रघु, ये ट्रस्ट हमारा है, इसका पैसा हमारा है। जो चलाता है, उसका है।' उन्होंने मना कर दिया। बस इतना ही, रवि। बस इतना।"
रवि ने उसकी तरफ़ देखा। "साहब, आपने पापा की मौत के दिन दालचीनी वाली चाय पी थी?"
बलवंत रुका। उसके चेहरे पर पहली बार कोई हलचल आई — जैसे कमरे में ठंडी हवा आ गई हो।
"ये तुम्हें किसने बताया?" उसने पूछा, आवाज़ पहले से धीमी।
"माँ ने।" रवि ने कहा। "कहा था — उस रात घर में दालचीनी की महक आई थी। माँ ने सोचा पापा दुकान से लाए होंगे। पापा न आए।" वो रुका। "आप आए थे, साहब।"
बलवंत ने अपनी प्याली उठाई और उसमें झाँका, जैसे उसमें कोई जवाब तैर रहा हो। फिर उसने एक घूँट लिया और उसे धीरे से रख दिया।
"तेरे पापा जब तक ज़िंदा रहे, उनके पास एक चीज़ रही।" उसने कहा, और रवि की जेब की तरफ़ नहीं देखा, पर रवि को लगा उसकी नज़र वहीं टिकी है। "जिस दिन वो चीज़ मेरे पास आ जाएगी, उस दिन मैं तेरी माँ के इलाज से लेकर तेरी बहन की डिग्री तक — सब अपने हाथ में ले लूँगा। समझा?"
रवि ने कुछ नहीं कहा। उसकी जेब में घड़ी थी, और घड़ी ठंडी थी — जैसे अंदर सब कुछ सो गया हो।
बलवंत खड़ा हुआ। उसने अपना कुर्ता सीधा किया और दरवाज़े की तरफ़ चला। मुश्ताक़ ने पीछे हटकर रास्ता दिया। बलवंत दरवाज़े पर रुका, बाहर के अंधेरे में देखा, और बिना पलटे बोला, "अच्छा, एक बात — तेरी माँ इंसुलिन ले रही है ना? मैंने सुना, बंद हो गई।" उसने धीरे से जेब से रूमाल निकाला और होंठ पोंछे। "ऐसा न हो कि कल से शहर में दूध भी बंद हो जाए। छोटी बात है, बेटा — पर छोटी बातें ही घर तोड़ती हैं।"
वो चला गया। गाड़ी की रोशनी दीवार पर फिर फिराई, और फिर अंधेरा।
मुश्ताक़ कुछ पल चुप खड़ा रहा, फिर रवि के पास आया और झुककर उसके कान के पास बोला, "साहब अच्छे आदमी हैं। बुरा वक़्त सबके साथ आता है। तू अपने पापा की तरह ज़िद मत कर।" उसने अपनी जली उँगली उठाई। "ये निशान बता रहा है — ज़िद की क़ीमत क्या होती है।"
रवि उठा। उसके पैर सुन्न थे। उसने अपना फटा होंठ जीभ से सहलाया और कमरे की तरफ़ आख़िरी बार देखा — जली राख, खुली तिजोरी, और दीवार पर टँगा एक पुराना कैलेंडर जिसकी तारीख़ कोई उखाड़ चुका था।
शमशेर दरवाज़े के बाहर खड़ा था। सफ़ेद कपड़े अंधेरे में और सफ़ेद लग रहे थे। उसने रवि को आते देखा और बहुत धीरे बोला, "तेरे पापा भी इसी दरवाज़े से गुज़रे थे, बेटा। उस रात भी इतनी ही ठंड थी।" उसने रवि के कंधे पर हाथ रखा। "फ़र्क़ बस इतना — वो अंदर आए थे। तू… तू अंदर आ गया।"
रवि ने उसका हाथ अपने कंधे से हटाया, बिना ज़ोर लगाए, और आगे बढ़ गया। पीछे से शमशेर की आवाज़ आई, "घड़ी संभालकर रख। वो मेरी है। मैं उसे तेरे पास से नहीं छीनूँगा। मैं तेरे पापा से वादा कर चुका हूँ।"
रवि रुका नहीं। वो सीढ़ियों से नीचे उतरा। बाहर की हवा चेहरे पर लगी तो होंठ की जलन और बढ़ी। उसने जेब से घड़ी निकाली। सुइयाँ स्थिर थीं। उसने कान से लगाया — सिर्फ़ सन्नाटा।
पीछे से मुश्ताक़ की आवाज़ आई, "छोड़ दो इसे। साहब ने कहा है — आज नहीं।" फिर किसी ने कहा, "पर साहब, ये…" और मुश्ताक़ का ठंडा जवाब, "साहब ने कहा है।"
रवि अंधेरी गली में चला। उसके होंठ से खून सूख रहा था, और उसके हाथ में घड़ी थी जो आज कुछ नहीं बोल रही थी। उसने घड़ी को जेब में रखा और एक गहरी साँस ली। घर पहुँचने में अभी देर थी, और उसके पास सिर्फ़ एक चीज़ बची थी — पैरों की ज़ोर।
पीछे, सेवा सदन की खिड़की में एक परछाई खड़ी थी, जो उसे जाते हुए देख रही थी। और रवि को पता था कि वो परछाई अगली सुबह तक उसकी माँ के दरवाज़े तक पहुँच जाएगी।
रवि ने घड़ी जेब में रखी ही थी कि सामने से एक साइकिल की घंटी बजी — छन्… छन्… और फिर एक आवाज़, "रवि! अरे रवि, तू है?" शमशेर का छोटा बेटा, गोलू, साइकिल पर बैठा था, हाथ में दूध का थैला। उसने रवि का चेहरा देखा और साइकिल रोक दी। "तेरा होंठ… खून… किसने किया? बता, किसने किया?" उसकी आवाज़ में वो गुस्सा था जो सिर्फ़ सोलह साल का लड़का बाहर निकाल सकता है — बिना डरे, बिना सोचे।
रवि ने हाथ से होंठ पोंछा। "गिर गया था।"
गोलू ने उसकी तरफ़ देखा, फिर सेवा सदन की तरफ़ जलती खिड़की, फिर मुश्ताक़ की गाड़ी, जो अभी-अभी गली मुड़ रही थी। "गिरा था…" उसने धीरे से दोहराया, और उसकी आवाज़ फीकी पड़ गई। "रवि, मेरे पापा भी अंदर थे?" वो साइकिल से उतरा। "उन्होंने कुछ कहा? उन्होंने मेरे बारे में—"
"तेरे पापा ने मुझे बचाया।" रवि ने कहा। "और उन्होंने मुझे एक बात कही।" वो रुका। गोलू के हाथ थैले पर कस गए। "कहा — तेरे पापा ने मेरे पापा से वादा किया था।"
गोलू कुछ नहीं बोला। उसने साइकिल का हैण्डल पकड़ा, उँगलियाँ सफ़ेद हो गईं। फिर उसने थैला रवि की तरफ़ बढ़ा दिया। "ये ले। माँ भेज रही थी। कह रही थी — आज कम है, कल ज़्यादा लाऊँगी।" और फिर, बिना रुके, वो साइकिल पर चढ़ गया और अंधेरे में गायब हो गया। घंटी दूर तक बजती रही — छन्… छन्… — जैसे कोई रास्ता भूल रहा हो।
रवि ने थैला देखा। दूध की सफ़ेदी थैले में झाँक रही थी। और उसे बलवंत की आवाज़ याद आई — "कल से शहर में दूध भी बंद हो जाए।"
घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला था। अंदर रोशनी थी। माँ चारपाई पर बैठी थीं, हाथ में इंसुलिन की छोटी शीशी, और पास में बहन सीमा खड़ी थी, जिसके हाथ में एक काग़ज़ था। सीमा ने रवि को देखा और उसका चेहरा टूट गया। "भैया…" उसकी आवाज़ जैसे फंस गई। "कॉलेज से लेटर आया है। लिखा है — फ़ीस नहीं जमा हुई तो नाम काट दिया जाएगा। तीन दिन का वक़्त है।"
माँ ने शीशी को दोनों हाथों में पकड़ा, जैसे वो भी छूट जाएगी। "रवि, तेरा होंठ?" उनका हाथ उठा, पर वो चेहरे तक पहुँचने से पहले ही रुक गया। "किसने…"
"कोई नहीं, माँ।" रवि ने कहा, और आवाज़ को सीधा रखा। "रास्ते में ठोकर लग गई।" उसने थैला चूल्हे के पास रख दिया और काग़ज़ सीमा के हाथ से ले लिया। उसने उसे पढ़ा। फिर मोड़कर जेब में डाल दिया। "तीन दिन हैं। तीन दिन बहुत होते हैं।"
सीमा ने उसका होंठ देखा, फिर उसकी आँखें। "तू झूठ बोल रहा है।" उसने धीरे कहा, इल्ज़ाम की तरह नहीं, दुआ की तरह। "तू बचपन से झूठ बोलता है तो कान लाल हो जाते हैं।"
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