Billionaire Empire System – Chapter 827
"पापा, मैंने…" रवि की आवाज़ रुक गई। उसने कुछ कहना चाहा, बहुत कुछ कहना चाहा — माँ की बीमारी, पिंकी की फ़ीस, दुकान, टीवी नरेंद्र, बलवंत, ज़ुबैर, वो सब रातें जब वो अकेले छत पर बैठकर आसमान को देखता था। "पापा, मैंने सब कर दिया। सबके सामने।"
"मुझे पता है, बेटा," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो नरमी थी जो सिर्फ़ पिताओं में होती है। "मैं यहीं था। हर वक़्त। तेरी जेब में, तेरे हाथ में, तेरे उस हर सवाल में जो तू रात को पूछता था और सुबह भूल जाता था।"
रवि ने आँखें बंद कर लीं। अंधेरे में उसके होठ काँप रहे थे।
"मैं आपको ढूँढ रहा था," उसने धीरे से कहा। "दस साल। दस साल, पापा।"
"और तूने ढूँढ लिया," पापा ने कहा। "मुझे नहीं, मेरे सच को। और ये उससे बड़ा है, बेटा।"
तभी किसी ने उसके कंधे को हिलाया, ज़ोर से, और एक आवाज़ दूर से आई, और फिर और पास — "भैया! भैया, आँखें खोलो!"
पिंकी की आवाज़।
रवि ने आँखें खोलीं। सफ़ेद आसमान उसके ऊपर था, और उसमें पिंकी का चेहरा — आँसुओं से भीगा, होंठ काँपते हुए, और उसकी नाक से पानी बह रहा था जो वो पोछ भी नहीं रही थी। उसका सिर इरा की गोद में था। इरा के हाथ उसके माथे पर थे, ठंडे और काँपते।
लुट्टन एक तरफ़ घुटनों के बल बैठा था, हाथ में पानी का गिलास, और उसका हाथ इतना काँप रहा था कि पानी छलक-छलककर ज़मीन पर गिर रहा था। वो अपनी मोटी आवाज़ में कह रहा था — "यार रवि, तूने हमारी जान निकाल दी। भगवान भी मुझे भूल गया है, पर तूने तो हद कर दी। तेरे बिना मेरी पान की दुकान कौन खरीदेगा?"
रवि ने धीरे से मुस्कुराने की कोशिश की। उसका गला सूखा था, होंठ चिपक रहे थे, और आवाज़ बस फुसफुसाहट जैसी निकली — "घड़ी… घड़ी कहाँ है?"
इरा ने उसका दाहिना हाथ उठाया — घड़ी अब भी उसकी मुट्ठी में थी, बंद, और उसकी हथेली पर उसकी ठंडक चुभ रही थी। इरा ने उसकी मुट्ठी को धीरे से खोला। चाँदी की घड़ी उसकी हथेली पर रखी थी, और उसका शीशा धूप में चमक रहा था।
"रवि, मैं हूँ…" इरा ने कहा, बहुत धीरे, जैसे डर रही हो कि ज़ोर से बोलेगी तो वो फिर चला जाएगा। "सुनाई दे रहा है?"
रवि ने उसकी तरफ़ देखा। इरा के बाल उसके चेहरे से चिपके हुए थे, और उसकी आँखों में वो डर था जो उसने पहले कभी नहीं देखा था — रिपोर्टर वाला डर नहीं, किसी अपने को खोने का डर।
"सुनाई दे रहा है," रवि ने कहा। उसकी आवाज़ अब थोड़ी लौट रही थी। "तेरी आवाज़… सबसे पहले यही आई थी।"
तभी उसकी जेब से फ़ोन की घंटी बजी। इरा ने निकालकर स्क्रीन देखी — माँ का नाम। उसने फ़ोन रवि के कान पर रख दिया।
माँ की आवाज़ आई — धीमी, काँपती, पर उसमें वो लोहा था जो सिर्फ़ माँओं में होता है।
"बेटा… तू ठीक है?"
रवि ने आँखें बंद कर लीं। उसके गले में कुछ ऐसा अटका कि वो बोल ही नहीं पाया। उसने एक गहरी साँस ली — वो वाली जो वो हर बात से पहले लेता था।
"माँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ भर्रा गई। "मैं ठीक हूँ।"
माँ कुछ पल चुप रहीं। रवि सुन सकता था कि वो अपनी साँस रोक रही हैं, जैसे डर रही हों कि आवाज़ फूट पड़ेगी।
"मैंने सुना," माँ ने कहा। "रेडियो पर सब बोल रहे हैं। बेटा… तेरे पापा का नाम आज सबके मुँह पर है।" वो रुकीं, और फिर उनकी आवाज़ में पानी आ गया — "वो जो भी करते थे, ग़रीबों के लिए करते थे। मुझे पता था। मुझे हमेशा पता था।"
रवि ने फ़ोन अपने सीने पर रख लिया। वो माँ की आवाज़ अपने दिल की धड़कन के साथ महसूस कर रहा था, जैसे दो आवाज़ें एक हो रही हों।
फिर माँ ने वो कहा जो वो हर बात के बाद कहती थीं — "भगवान भला करे।"
रवि ने आँखें खोलीं और धीरे से हँसा। उसी हँसी में आँसू भी थे।
उसने धीरे से कुहनी के बल उठने की कोशिश की। लुट्टन ने काँधा दिया, इरा ने कमर सहारी। वो घुटनों पर आया, फिर खड़ा हुआ। उसकी टाँगें अब भी काँप रही थीं, पर वो खड़ा था।
मैदान में हज़ार लोग अब भी खड़े थे। कोई जाने का नाम नहीं ले रहा था। तालियाँ थम चुकी थीं, पर सन्नाटा ऐसा था जैसे सबको लग रहा हो कि अगर कोई हिला, तो ये पल टूट जाएगा।
मंच के किनारे क़ासिम भाई खड़े थे। उनका मोटा काला चश्मा अब भी उनकी आँखों पर था, और उनकी सफ़ेद दाढ़ी हवा में धीरे-धीरे हिल रही थी। उन्होंने रवि की तरफ़ देखा और बस एक बार सिर हिलाया — जैसे कह रहे हों, "उठ, बेटा। ये तेरा मैदान है।"
रवि ने इरा का हाथ पकड़ा और उसकी मदद से सीढ़ियाँ चढ़कर मंच पर वापस पहुँचा। उसने झुककर माइक उठाया। माइक की तार थोड़ी मुड़ गई थी, पर वो चल रहा था।
उसने एक बार आँखों से पूरा मैदान नापा। बूढ़ा दर्ज़ी अब भी अपने बेटे का हाथ पकड़े खड़ा था। वो औरत थी — जिसका बेटा फ़ैक्टरी की दीवार गिरने में मरा था — मुँह पर हाथ रखे, आँसू बह रहे थे। और सबसे आगे, बैसाखी के सहारे, मुन्ना भाई खड़ा था। उसकी टाँग पर पट्टी बँधी थी, और उसकी आँखों में वो चमक थी जो रवि ने पहली बार सुबह देखी थी जब मुन्ना भाई दुकान के सामने बैठा था।
रवि का गला फिर भर आया। उसने माइक अपने मुँह के पास लाया।
"सुनो," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब साफ़ थी, ऊँची थी। "मैं आज यहाँ खड़ा हूँ, तो सिर्फ़ इसलिए नहीं कि मेरी आवाज़ तुम तक पहुँच रही है। मैं खड़ा हूँ इसलिए कि मेरे पापा यहाँ नहीं हैं। और मेरे पापा की जगह अब मैं हूँ।"
मैदान में एक भी हलचल नहीं हुई।
"ये बही," रवि ने कहा, और उसने क़ासिम भाई से बही ले ली। मोटी, फटी, भूरे काग़ज़ वाली बही उसने हवा में उठाई। "इसमें ग्यारह हज़ार लोगों के नाम हैं। ग्यारह हज़ार वो लोग जिनका पैसा छीना गया। किसी का मकान छीना गया, किसी की ज़मीन, किसी का बेटा।"
उसने बही खोली और उसका पहला पन्ना सबके सामने कर दिया।
"मैं ये बही अपने पास नहीं रखूँगा। किसी तिजोरी में नहीं।" उसने रुककर इरा की तरफ़ देखा। इरा ने उसकी तरफ़ देखकर धीरे से सिर हिलाया। "कल से, हर रविवार, इसी मैदान में, मैं खुद यहाँ खड़ा होऊँगा। इस बही से एक नाम पढ़ूँगा। और उस नाम का पैसा, उसका हक़, उसके घर तक पहुँचाऊँगा। जब तक आख़िरी नाम नहीं पढ़ लिया जाता।"
भीड़ में से पहली आवाज़ आई — "सच बोल रहे हो?" एक बूढ़े आदमी की आवाज़, जिसकी आँखें डबडबाई थीं और जिसकी मुट्ठी में एक फटा हुआ पर्चा था।
रवि ने उसकी तरफ़ देखा।
"मैं चाय वाला हूँ, दादा," उसने कहा। "चाय वाले के पास ऐसी बात कहने के लिए कुछ नहीं होता — न पद, न पैसा, न ताक़त। सिर्फ़ उसकी चाय और उसकी बात होती है। और मेरी चाय हमेशा गरम रहती है।"
कुछ पल चुप्पी रही। फिर मुन्ना भाई ने अपनी बैसाखी ज़मीन पर टिकाई और अपने दोनों हाथ जोड़कर सिर ऊपर उठाया। और फिर, जैसे किसी ने बाँध तोड़ दिया हो, पूरा मैदान फूट पड़ा।
तालियाँ। चीख़ें। किसी औरत ने अपना दुपट्टा हवा में लहरा दिया। कोई बच्चा अपने पिता के कंधे पर चढ़कर ताली बजा रहा था। और रवि ने देखा — बूढ़ा दर्ज़ी अपने बेटे के साथ ज़मीन पर बैठ चुका था, मुँह हाथों में छिपाए, कंधे हिल रहे थे।
इरा रवि के पास आई और उसके कान में बोली — "अब गिरना मत, रवि। सब देख रहे हैं।"
रवि हँसा। उसने धीरे से कहा — "गिरूँगा तो भी तू पकड़ेगी।"
इरा ने उसकी कलाई पकड़ ली और कुछ नहीं कहा।
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