Billionaire Empire System – Chapter 823
लोग आगे बढ़ने लगे। जूते मिट्टी पर पटकने की आवाज़ें, किसी की फटी चप्पल, किसी का डंडा हवा में उठा हुआ। मेहरा ने अपना सिर दोनों हाथों से ढक लिया और पीछे सिकुड़ गया, जैसे कोई बच्चा हो जिसे डरावना सपना आया हो।
रवि ने अपना हाथ हवा में उठा दिया।
"रुको!" उसकी आवाज़ भीड़ की चीख़ों के ऊपर उठी, और जिस लहजे में वो बोला, वो किसी चीख़ जैसा नहीं था — वो शांत था, बहुत शांत। "रुक जाओ, सब के सब।"
भीड़ रुकी। न चाहते हुए भी रुकी। रवि का हाथ अभी भी ऊपर था और उसके हाथ में पापा की चाँदी की घड़ी थी, जिसकी सुई चल रही थी — तिक… तिक… तिक… — इतनी धीमी आवाज़ कि सिर्फ़ पास वाले सुन सकें।
"अगर मैं इसे मार दूँगा," रवि ने कहा, और उसकी नज़र एक-एक चेहरे पर घूम रही थी, "तो सच कहाँ जाएगा? तुम्हारे मुर्दों का हिसाब कौन देगा?"
क़ासिम भाई वहीं खड़े थे, और उनके होंठ काँप रहे थे। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
रवि मेहरा के सामने बैठ गया। उसके घुटने घुटनों से छू रहे थे, और उसकी आवाज़ इतनी धीमी हो गई कि सिर्फ़ आस-पास के दस लोग सुन सके। "देखो मेरी तरफ़," उसने कहा। "मेरी आँखों में देखो, और एक-एक बात साफ़-साफ़ बताओ। घुमाओ मत।"
मेहरा ने आँखें उठाईं। छोटी, लाल, और इतनी हारी हुई कि देखने वाले के हाथ अपने आप जेब में चले जाएँ।
"बलवंत ने मुझे फँसाया," मेहरा ने कहा, और उसकी आवाज़ गले में अटक-अटक कर निकल रही थी। "मेरे एक बेटा था। बम्बई में पढ़ता था। एक दिन फ़ोन आया — 'मेहरा साहब, आपका बेटा हमारे पास है। छोटा-सा काम है, कर दो, बेटा सही-सलामत घर आ जाएगा।'"
"क्या काम?" रवि ने पूछा।
"एक शीशी।" मेहरा ने अपनी हथेली खोली, जैसे उसमें अब भी कुछ रखा हो। "बस एक शीशी। मैंने पूछा — किसके लिए? उन्होंने कहा — 'एक आदमी है, सेवा सदन का खज़ांची, सबको सच बताने की ज़िद कर रहा है।'"
रवि के हाथ में घड़ी थी। उसने घड़ी भींच ली।
"मैंने मना किया," मेहरा ने आगे कहा, और अब वो रो नहीं रहा था, उसकी आवाज़ सूख रही थी। "मैं डॉक्टर हूँ। मैंने कहा — मैं जान नहीं लूँगा। तो उन्होंने फ़ोन पर हँसकर कहा — 'अच्छा? तो तेरे बेटे की लाश कल सुबह पहुँच जाएगी। मेहरा, तू वैसे भी किसी के काम नहीं आया।'"
क़ासिम भाई ने आँखें खोलीं। उनमें पानी था, पर आवाज़ में पत्थर। "तो तूने सुई दे दी।"
"हाँ।" मेहरा ने सिर झुका लिया। "मैंने चार बजे रात को नीचे गली में एक सफ़ेद कोट पहनकर उसका इंतज़ार किया। मुझे लगा मैं उन सबको बचा रहा हूँ। उन्होंने कहा — 'ये आदमी धोखेबाज़ है, ये तेरे जैसे डॉक्टरों का नाम खराब करता है, समाज के पैसे खाता है।' और मैं…"
उसकी आवाज़ टूट गई।
"और मैंने सुई उसके हाथ में थमा दी।" उसने अपना मुँह हाथों से ढक लिया, और उसकी पीठ हिलने लगी। "वो रात मेरे जीवन की आख़िरी रात थी जिसमें मैं चैन से सोया।"
इरा रवि के पीछे खड़ी थी, और उसका कैमरा — जो उसने घुटनों पर टिका रखा था — लाल बत्ती के साथ चल रहा था। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर कैमरा नहीं हिल रहा था। रिपोर्टर का सबसे बड़ा हुनर — दर्द के बीच भी हाथ स्थिर रखना। कोमल उसके पीछे खड़ी थी, च्युइंग गम अब बंद, और उसकी आँखों से आँसू गालों पर गिर रहे थे, जिन्हें वो छिपाने की कोशिश भी नहीं कर रही थी।
"एक बात और," रवि ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब कुछ ऐसा था जो मेहरा को सीधा छू गया। "पापा को सुई कैसे दी गई? खिड़की से? धक्का देकर?"
मेहरा ने सिर हिलाया। "नहीं। मैं खुद उनके कमरे में गया था। बहाना बनाकर — 'आपकी रिपोर्ट देखने आया हूँ।' वो बिस्तर पर बैठे थे।" मेहरा ने आँखें बंद कर लीं, जैसे वो दृश्य उसकी आँखों में अब भी चल रहा हो। "उन्होंने मुझे पहचान लिया था, रवि। उन्होंने कहा — 'मेहरा भाई, आप? आप क्यों?'"
रवि की साँस रुक गई।
"उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया था," मेहरा फुसफुसाया। "और मैंने… मैंने बहाना बनाया कि आपको ताक़त की दवा लगानी है। और फिर…" उसने अपना हाथ अपने चेहरे पर मार लिया। "और वो चले गए। मेरे हाथ पकड़े हुए। मेरे हाथ पकड़े हुए चले गए।"
मैदान में एक बूढ़ी औरत भीड़ को चीरती हुई आगे आई। सत्तर से ऊपर की उम्र, सफ़ेद बाल, फटी साड़ी जिसका पल्लू उसने अपनी कमर में बाँध रखा था। वो मंच तक आई और मेहरा के सामने खड़ी हो गई। किसी ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की — भीड़ के लोग अपने आप पीछे हट गए, जैसे उसे रास्ता दे रहे हों।
उसने अपनी साड़ी का पल्लू खोला। उसमें एक छोटा-सा टुकड़ा था — बच्चे की क़मीज़ का, फटा, पीला पड़ चुका, धुले हुए भी धब्बे न गए।
"मेहरा साहब," उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर साफ़ थी। "मेरा बेटा सात साल का था। उसको बुख़ार आया था। उस वार्ड में भर्ती किया। बारह साल पहले।" उसने क़मीज़ का टुकड़ा मेहरा के सामने हवा में पकड़ा। "तीसरे दिन उसकी साँस रुक गई। मुझे बोला गया — 'सिस्टर बदली आई थी, सुई लगा दी थी'।" उसने मेहरा के चेहरे के बिलकुल पास जाकर कहा — "तुमने उसे देखा था? इलाज के नाम पर?"
मेहरा ने अपना मुँह दोनों हाथों से ढक लिया। उसकी उँगलियों के बीच से एक लंबी, टूटी-सी आवाज़ निकली — वो किसी शब्द जैसी नहीं थी, किसी जानवर के रोने जैसी थी।
और फिर, धीरे-धीरे, भीड़ खुलने लगी।
एक बूढ़ा आदमी आगे आया। "मेरी बहू भी उसी वार्ड में मरी थी," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, सिर्फ़ थकान। "पचास साल की थी। डिलीवरी के बाद।"
दूसरा आदमी आगे आया, हाथ में पुरानी रसीद। "मेरी बहन। उन्नीस साल। उसके पति ने दूसरी शादी कर ली — हमें बोला गया, 'बीमारी थी।'"
फिर एक औरत आई, गोद में बच्चा लिए। फिर एक लड़का, जिसके पास सिर्फ़ एक पुरानी तस्वीर थी — सालों पुरानी, टूटी हुई।
"मेरे पापा," उस लड़के ने कहा। "मुझे बोला गया — हार्ट अटैक। मैं江湖 सात साल का था।"
एक-एक नाम। एक-एक मुर्दा। एक-एक तारीख़। रवि हर नाम सुनकर चुपचाप सिर हिलाता रहा। उसका चेहरा पत्थर जैसा हो गया था — जो किसी औरत ने मिट्टी को शांत करने के लिए सलाम किया। उसके हाथ में पापा की घड़ी और भी तेज़ चलने लगी — तिक-तिक-तिक — जैसे वो अपने मालिक के साथ हिसाब लगा रही हो।
लुट्टन पीछे खड़ा था, हाथ जोड़े। उसकी आँखों से पानी लगातार गिर रहा था और वो पोंछ भी नहीं रहा था। "यार रवि," उसने फुसफुसाया, और वो इतना धीमा था कि रवि ने सुना, "भगवान भी मुझे भूल गया है… पर आज ऐसा लगा जैसे उसने सब याद रखा था।"
रघुवीर सिंह भीड़ की एक तरफ़ खड़े थे। उनके हाथ में पुराना रजिस्टर था, और उनका सारा पसीना सूख गया था। मेहरा की बातें सुनकर वो धीरे-धीरे मंच के पास आए और रवि के कान में बोले, "बेटा, ये काफ़ी है। अब सब सुन लिया। इसे हिरासत में लेने दो।"
रवि ने अपने घुटनों के बल झुककर मेहरा के कान के पास अपना मुँह लाया। उसकी आवाज़ पूरी भीड़ को सुनाई नहीं दी, पर उसकी बाँहों की हड्डी सख़्त हो गई थी, और सुनने वाले को भी लगा कि अब कुछ होगा।
"मेहरा साहब," रवि ने धीरे से कहा। "तुम्हारे पास एक रास्ता है। बस एक।" उसने रुककर साँस ली। "वो काग़ज़ दिखा दो जो तुमने छिपाया है। जिस पर बलवंत के हस्ताक्षर हैं।"
मेहरा ने धीरे-धीरे अपना चेहरा हाथों से खोला। उसकी आँखें रवि से मिलीं — एक पल के लिए उनमें कुछ और भी था, बस थकान नहीं। फिर उसकी नज़र रवि के कंधे के ऊपर से निकल गई।
रवि ने पीछे मुड़कर देखा।
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