Billionaire Empire System – Chapter 822
मैदान में सन्नाटा छा गया।
रवि ने उसे देखा। उसका दिल कह रहा था कि कुछ गड़बड़ है। बलवंत का इतना शांत होना — ये ठीक नहीं। जो आदमी दस साल में किसी को नहीं फँसने दिया, वो इतनी आसानी से अपना सिर कलम के नीचे नहीं रखता।
"रघुवीर सर," रवि ने पलटकर कहा, और उसकी आवाज़ में जल्दी थी। "अब। अभी। अपने आदमियों को बुलाइए।"
रघुवीर ने सिर हिलाया और अपना रेडियो उठाया। पर तभी मेहरा ने कुछ कहा, और उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि रवि को सुनने के लिए झुकना पड़ा।
"रवि…" मेहरा ने फुसफुसाया। "मैंने सुई भरी, पर सुई भेजने वाला… सिर्फ़ मैं और बलवंत नहीं थे।"
रवि ठिठक गया।
"एक तीसरा आदमी था," मेहरा ने कहा, और उसकी आँखें भीड़ में कहीं और देख रही थीं। "वो आज भी इसी मैदान में है। और मैं… मैं उसका चेहरा नहीं जानता। मैंने कभी उसका चेहरा नहीं देखा। मैंने सिर्फ़ उसकी आवाज़ सुनी है।"
रवि का खून ठंडा हो गया।
"कैसी आवाज़?"
मेहरा ने अपना मुँह खोला, पर जवाब देने से पहले उसकी नज़र बलवंत पर पड़ी, और उसके होंठ बंद हो गए। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
रवि पलटा। बलवंत अपनी जगह से हिल चुका था। वो भीड़ के बीच खिसक रहा था — धीरे, बिना जल्दी, जैसे कोई बारिश में छाता तानकर चलता है। उसके दो आदमी उसके साथ थे, और एक तीसरा पहले से भीड़ के उस पार खड़ा उसका इंतज़ार कर रहा था।
"बलवंत भाग रहा है!" रवि चीखा।
भीड़ हिली। कुछ लोग उसकी तरफ़ झपटे, पर बलवंत के आदमियों ने उन्हें रोक दिया — एक को धक्का, एक को कोहनी, और एक का हाथ पकड़कर मरोड़ दिया। मीरा ने मेहरा को छोड़कर बढ़ना चाहा, पर उसकी बैसाखी फिसली और वो एक पल के लिए लड़खड़ा गई। लुट्टन अपनी मोटी टाँगों से जितनी तेज़ भाग सकता था, भागा, पर भीड़ ने उसे रोक दिया।
"सामने के रास्ते से काटो!" रवि चिल्लाया। "लुट्टन, दाएँ से!"
रवि खुद मंच से उतरा और भागा। उसका दिल सीने में धड़-धड़ धड़ रहा था, और उसके कान में सिर्फ़ एक ही आवाज़ थी — घड़ी की टिक-टिक।
बलवंत भीड़ के आख़िरी किनारे पर पहुँच गया था। सामने गाड़ियों की कतार थी, और उसकी काली गाड़ी का दरवाज़ा खुला हुआ था — करीम ने खोला था, जो पहले से वहाँ खड़ा था, आँखें छोटी, हाथ दरवाज़े पर।
बलवंत ने एक कदम बढ़ाया।
और तभी रवि ने अपनी पूरी ताक़त से चीखकर कहा —
"बलवंत राय!"
बलवंत रुक गया।
वो पलटा। उसके चेहरे पर वो मुस्कान अब भी थी, पर आँखों में कुछ और था — कुछ ऐसा जो मुस्कान से मेल नहीं खाता था।
"क्या हुआ, बेटा?" उसने कहा, और "बेटा" शब्द इतना आसानी से निकला जैसे वो हजारों बार बोल चुका हो। "मैं तो जा रहा हूँ। तूने जीत लिया। मुझे जाने दे, वरना ये भीड़ तेरे ही हाथों से खून करवा देगी, और फिर तेरे पापा का बदला भी तू नहीं ले पाएगा।"
रवि उसके सामने आकर खड़ा हो गया। दोनों के बीच अब सिर्फ़ दो कदम थे।
"तुम नहीं जाओगे," रवि ने कहा। उसकी साँस फूल रही थी, पर आवाज़ साफ़ थी।
"क्यों?" बलवंत ने कहा, और अब उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ पतला सा आया। "तेरे पास क्या है?"
"मेरे पास सच है," रवि ने कहा। "और तुम्हारे पास अब कुछ नहीं।"
"सच?" बलवंत ने धीरे से कहा। उसने एक कदम बढ़ाया, और उसके आदमियों ने पीछे हटकर रास्ता छोड़ दिया। "सच किसी के पास नहीं होता, बेटा। सच सिर्फ़ उसके पास होता है, जिसके पास ताक़त होती है। और आज तेरे पास ताक़त है — भीड़ की, सबूत की, उस बूढ़े की।" उसने मेहरा की तरफ़ बिना देखे सिर हिलाया। "कल ये सब बिखर जाएगा। फिर देखता हूँ, तेरा सच कितना बड़ा है।"
रवि ने सुना, और उसके अंदर कुछ ऐसा हिला जो डर नहीं था — एक ठंडा, साफ़ गुस्सा। "तुम अभी भी समझे नहीं, सर," रवि ने कहा। "ये भीड़ तुम्हारी ताक़त से नहीं, तुम्हारे डर से खड़ी है। और आज जो एक बार डर गई, वो फिर कभी तुम्हारी नहीं होगी।"
किसी ने भीड़ में से कहा, "सही कह रहा है!" और फिर दूसरी आवाज़, "बहुत हो गया इसका राज!" बलवंत की मुस्कान फीकी पड़ने लगी।
तभी पीछे से एक आवाज़ आई, जो सबसे भारी थी। "रुको।"
सब पलटे। क़ासिम भाई अपनी कुर्सी से उठ रहे थे। उनके हाथ कुर्सी की बाँहों पर थे, और उँगलियाँ इतनी ज़ोर से दब रही थीं कि नाखून सफ़ेद हो गए थे। वो धीरे-धीरे चले — हर कदम में जैसे कोई भारी बोरी उठा रहे हों। भीड़ अपने आप दो हिस्सों में बँट गई।
रवि ने देखा, क़ासिम भाई बलवंत की तरफ़ नहीं जा रहे थे। वो मेहरा की तरफ़ जा रहे थे।
मेहरा ने उन्हें आते देखा और उसका सारा जिस्म काँपने लगा। वो पीछे हटना चाहा, पर उसकी पीठ भीड़ से टकरा गई। "क़ासिम भाई… मैं… मैं सब बता दूँगा…"
क़ासिम भाई उसके सामने रुके। उन्होंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ अपने दोनों हाथ उठाए और उसका चेहरा अपनी हथेलियों में ले लिया — जैसे कोई बच्चे का चेहरा पकड़ता है, प्यार से, बहुत धीरे। मेहरा की आँखों से आँसू बहने लगे।
क़ासिम भाई ने उसके माथे पर अपना माथा टेक दिया और फुसफुसाए, और उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि सिर्फ़ पास खड़े लोग सुन सके — "मैंने तुझे बचाया था, बेटा। उस रात तेरे पिता की लाश के पास से उठाया था, तेरे हाथ पकड़कर कहा था — अब तू मेरा है। और तूने मेरे ही हाथों से मेरा सब कुछ छीन लिया। मेरी बेटी का सपना, मेरा घर, मेरा नाम। सब।"
मेहरा की साँस रुक गई।
"बोल," क़ासिम भाई ने कहा, और अब उनकी आवाज़ में वो नरमी नहीं थी। "क्यों?"
मेहरा की टाँगें जवाब दे गईं। वो घुटनों के बल गिर पड़ा, और उसकी हथेलियाँ मिट्टी में धँस गईं। मैदान में इतना सन्नाटा था कि दूर किसी बच्चे के रोने की आवाज़ भी साफ़ सुनाई दे रही थी।
"मेरा नाम एहसान मेहरा है," उसने रोते हुए कहा, और आवाज़ गले में अटक रही थी। "और उस रात जो सुई दी गई थी… वो मेरे हाथ से दी गई थी।"
रवि के हाथ से बैग छूट गया।
धड़ाम!
बैग खुला गिरा और उसमें से दो काँच की शीशियाँ निकलकर घास पर लुढ़क गईं। एक पुराना पर्चा हवा में उड़ा और रवि के पैरों के पास आकर रुका। उस पर दवा का नाम लिखा था, और नीचे एक तारीख़ — वही तारीख़ जो उसने कितनी बार माँ की पुरानी डायरी में देखी थी।
रवि झुका। उसने पर्चा उठाया। उसके हाथ काँप रहे थे, और उसकी आँखों के सामने वो रात घूम गई — माँ का पीला चेहरा, अस्पताल की सफ़ेद बत्ती, और एक सफ़ेद कोट वाला आदमी जो उस वक़्त बहुत दूर खड़ा था।
"तुम?" रवि ने फुसफुसाया। "तुम मेरे पापा के…"
मेहरा ने सिर उठाया, और उसकी आँखों में वो चेहरा था जो हार मान चुका था। "मैं तुम्हारे पापा का दोस्त था, रवि। और मैंने ही उन्हें मारा।"
॥
"मैं तुम्हारे पापा का दोस्त था, रवि। और मैंने ही उन्हें मारा।"
ये शब्द मैदान में गिरे, और पूरा मैदान एक साथ जम गया। जैसे किसी ने हज़ार लोगों के सीने से हवा खींच ली हो। एक पल पहले जो भीड़ गरम थी, वो अब ठंडी पड़ गई — सिर्फ़ सन्नाटा, और उस सन्नाटे में किसी का हाँफना।
फिर भीड़ फटी।
"मारो इसे!" — एक आदमी चीखा, और उसकी आवाज़ में वो दर्द था जो सालों से दबा बैठा था। "इस डॉक्टर कुत्ते को मारो!"
"मेरी बहन भी उसी वार्ड में गई थी!"
"पकड़ो इसे!"
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