Billionaire Empire System – Chapter 821
बूढ़े का शरीर झटके से हिला, जैसे किसी ने उसके सीने में सुई चुभो दी हो। उसने क़ासिम भाई का हाथ अपने चेहरे से हटाने की कोशिश नहीं की। वो बस खड़ा रहा, आँखें बंद किए, और उसकी साँस इतनी तेज़ थी कि रवि उसे सुन सकता था।
भीड़ में एक बूढ़ी औरत ने मुँह पर हाथ रख लिया। किसी ने कहा, "अरे बाप रे… ये क्या हो रहा है?" किसी और ने धीरे से कहा, "चुप… सुन तो।"
रवि ने आगे बढ़कर बूढ़े का बैग उठाया — जो अब उसके पैरों के पास ज़मीन पर पड़ा था। बैग का चमड़ा पुराना था, कोने घिस चुके थे। उसने उसे खोला।
अंदर दो काँच की शीशियाँ थीं — छोटी, पीली, दोनों में हल्का पीला पाउडर। एक पुराना पर्चा भी था, जिसकी स्याही फीकी पड़ गई थी, पर लिखाई साफ़ थी। रवि ने उसे पढ़ा — एक दवा का नाम, और नीचे एक तारीख़। दस साल पुरानी तारीख़।
उसका हाथ काँपा। उसने शीशी को उठाकर क़ासिम भाई की तरफ़ बढ़ाया।
"ये वही शीशी है ना?" रवि ने धीरे से पूछा। "वो जो उस रात… मेरे पापा को…"
क़ासिम भाई ने शीशी देखी और उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने सिर हिलाया।
तभी बूढ़े ने अपना चेहरा ऊपर उठाया।
उसकी आँखों में पानी था, पर वो बह रहा था। चश्मा टेढ़ा था, और उसकी दाढ़ी पर आँसू टपक रहे थे। उसने एक बार रवि को देखा, फिर भीड़ को। फिर उसके घुटने ज़मीन पर टिक गए — धूल में। वो घुटनों के बल बैठ गया।
"मेरा नाम एहसान मेहरा है," उसने कहा, आवाज़ में पानी भरा था। "मैं डॉक्टर हूँ। और उस रात जो सुई दी गई थी… वो मेरे हाथ से दी गई थी।"
मैदान में सब एक साथ साँस लेना भूल गए।
रवि के हाथ में पकड़ा बैग उसकी उँगलियों से फिसला और धड़ाम से ज़मीन पर गिर गया।
शीशियाँ बैग में थीं, तो टूटीं नहीं। पर वो धड़ाम की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि जैसे मैदान की ज़मीन बज गई हो। पीछे खड़ी एक औरत ने चीख मार दी। एक बूढ़ा आदमी अपनी लाठी टेकते हुए एक कदम पीछे हटा।
रवि ने मेहरा को देखा।
"तुम?" उसकी आवाज़ अब बिलकुल नरम थी, जो सबसे डरावनी बात थी। "तुमने मेरे पापा को मारा?"
"नहीं!" मेहरा ने अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। "मैंने मारा नहीं! मैंने सिर्फ़… सुई भेजी। और वो भी… वो भी मेरी मरज़ी से नहीं।"
वो सिसककर रुक गया। उसकी सिसकी भीड़ में साफ़ सुनाई दे रही थी, इतना सन्नाटा था।
"मुझे धमकाया गया था," मेहरा ने कहा। "मेरे बेटे को ज़िंदा रखने की धमकी दी गई थी। वो मेरे सामने बैठकर कहते थे — 'डॉक्टर साहब, एक सुई भेजो, और तुम्हारा बेटा विदेश में पढ़ेगा। एक सुई नहीं भेजी, तो तुम्हारा बेटा उसी हफ़्ते लौटकर नहीं आएगा।'"
"और तुमने भेज दी," रवि ने कहा। आवाज़ में इल्ज़ाम नहीं था। सिर्फ़ एक सवाल।
"मैंने भेज दी," मेहरा ने सिर झुकाकर कहा। "और आज तक हर रात वो सुई मुझे जगाती है। मेरा बेटा… मेरा बेटा तो उससे पहले ही जा चुका था। मुझे तब पता चला जब वो पहले ही जा चुका था। उन्होंने मुझे जो धमकी दी थी, वो झूठ थी। और मैंने उस झूठ के डर से एक इंसान की जान ले ली।"
क़ासिम भाई ने आँखें बंद कर लीं।
रवि कुछ देर खड़ा रहा। उसका चेहरा सपाट था, पर उसकी जीभ उसके मुँह में सूख रही थी। उसने अपनी जेब में हाथ डाला — घड़ी। चाँदी की घड़ी, जो उसके पापा की थी। उसने उसे निकालकर अपनी हथेली पर रख लिया। घड़ी की टिक-टिक उसके कानों में गूँज रही थी।
"तुम्हारे बेटे का नाम क्या था?" रवि ने कहा।
मेहरा ने सिर उठाया। उसकी आँखों में हैरानी थी। ऐसा सवाल उसे उम्मीद नहीं थी।
"आरिफ़," उसने कहा, आवाज़ फटी हुई। "आरिफ़ मेहरा।"
रवि ने सिर हिलाया। वो कुछ नहीं बोला, बस उसने घड़ी वापस जेब में रखी और भीड़ की तरफ़ पलट गया।
"मारो इसे!" भीड़ के बीच से किसी की आवाज़ आई। "हमारे बीच में बैठा था! इसे ज़िंदा क्यों छोड़ें?"
"हाँ! मारो!"
"जो हमारे अपनों को मारते हैं, उन्हें क्या छोड़ें?"
भीड़ उबलने लगी। एक आदमी ने ज़मीन से ईंट उठाई। दूसरे ने जूता। मेहरा ने अपने दोनों हाथ ऊपर कर लिए, आँखें बंद कर लीं, जैसे अपने आने वाले अंजाम को कबूल कर रहा हो।
रवि ने अपना हाथ उठाया।
"रुको!"
उसकी आवाज़ ज़ोर की नहीं थी, पर इतनी थी कि ईंट हाथ में उठी हुई ही रह गई।
"ये आदमी मेरे पापा के खून में शामिल है," रवि ने भीड़ से कहा, हाथ अभी उठा हुआ था। "और मैं आपसे कह रहा हूँ — रुक जाओ।"
"क्यों?" भीड़ में से वही आदमी चीखा, ईंट हिलाते हुए। "ये तुम्हारा बाप था! और तुम इसकी तरफ़दारी कर रहे हो?"
"मैं तरफ़दारी नहीं कर रहा," रवि ने कहा। उसने भीड़ में उस आदमी की आँखों में देखा। "मैं ये चाहता हूँ कि अगर इसका मुँह खुल गया है, तो ये पूरा खुले। अगर आज ये मर गया, तो हमें कभी पता नहीं चलेगा कि इसने किस-किस के लिए सुई भेजी। कितने लोगों के पापा, कितने लोगों के बेटे…"
ईंट हाथ में लिए आदमी का हाथ धीरे-धीरे नीचे आया।
रवि ने मेहरा की तरफ़ देखा।
"तुम्हारे साथ कौन था?"
मेहरा ने आँखें खोलीं।
"उस रात?" उसने धीरे से पूछा।
"उस रात," रवि ने कहा, और अब उसकी आवाज़ ठंडी हो गई थी, जैसे लोहे की सिल्ली ज़मीन पर रख दी गई हो। "तुमने सुई दी। किसी ने आदमी भेजा। किसी ने उसे मुहैया किया। उस कमरे तक कौन ले गया? पापा के घर की चाबी किसके पास थी?"
मेहरा ने धीरे से अपना सिर एक तरफ़ झुकाया, जैसे कुछ याद कर रहा हो, और फिर — उसकी आँखें बलवंत की तरफ़ उठीं। बलवंत मंच के नीचे, बाईं तरफ़ खड़ा था, अपने चारों तरफ़ दो-तीन आदमियों के बीच, चेहरा वैसा ही शांत, जैसे बाज़ार में कोई तराजू देख रहा हो।
मेहरा ने कुछ नहीं कहा। पर उसके चेहरे ने सब कह दिया।
भीड़ के हज़ारों सिर उसी दिशा में घूम गए।
"बलवंत राय…" किसी ने धीरे से कहा, और यह नाम हवा में इतना भारी लगा कि रवि को लगा जैसे मैदान का तापमान गिर गया हो।
बलवंत मुस्कुराया।
वो धीरे-धीरे भीड़ को चीरता हुआ आगे आया। लोग उसके रास्ते से हटते गए, किसी ने कुछ नहीं कहा। उसका चेहरा बिलकुल साफ़ था, जैसे किसी ने उसे सुबह के नाश्ते के बाद धो दिया हो।
वो रुका, मेहरा के आगे। उसने नीचे झुककर उसे देखा — जैसे कोई दुकानदार अपनी फटी हुई चीज़ देखता है।
"डॉक्टर साहब," बलवंत ने धीरे से कहा। "आपने तो बड़ी मेहनत कर ली। इतने साल बाद भी आपकी याददाश्त अच्छी है।"
"आपने मेरा बेटा मारा था," मेहरा ने कहा। उसकी आवाज़ में अब सिर्फ़ थकान थी, रोना नहीं। "आपने मुझे ये सब करने पर मजबूर किया।"
"मैंने कुछ नहीं किया," बलवंत ने कहा, और फिर भीड़ की तरफ़ देखा। "मैंने तो बस… कुछ लोगों को अवसर दिया। अवसर हर किसी को नहीं मिलता, डॉक्टर साहब।"
वो पलटा और मीरा की तरफ़ देखा, जो अभी भी मेहरा का कॉलर पकड़े खड़ी थी।
"मीरा जी," बलवंत ने मुस्कुराकर कहा। "आपका हाथ अब भी मज़बूत है। भाई के जाने के बाद भी। ऐसा हाथ किसी काम का होता है। क्यों नहीं मेरे साथ…"
"एक और बात कही, तो ये बैसाखी आपके पैरों पर पड़ेगी," मीरा ने कहा, बिना आँखें झपकाए।
बलवंत हँसा — छोटी, धीमी हँसी — और एक कदम पीछे हटा।
"अच्छा," उसने कहा। "तो अब सच का खेल शुरू हो गया है।" उसने अपने सोने की चेन को उँगली से सहलाया। "रवि बेटा, तूने जो पन्ने बाँधे थे, वो खुल गए। अब तेरे हाथ में बही है, मेहरा का कबूलनामा है, भीड़ है। मैं मानता हूँ — तू जीत गया।" उसने अपनी दोनों बाहें फैला दीं। "तो अब क्या? मुझे यहीं गिरफ़्तार करवा?"
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