Billionaire Empire System – Chapter 820
"सर," रवि ने पहली बार बोला, और उसकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था, कोई जल्दबाज़ी नहीं। "आप मुझे 'बेटा' कहिए, मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता। पर उस बच्चे को 'बेटा' मत कहिए, जिसने अभी पूछा कि सुई क्या होती है। उसे आपका 'बेटा' सुनने की ज़रूरत नहीं है।"
मैदान में फिर सन्नाटा।
बलवंत का चेहरा एक पल के लिए बदला। सिर्फ़ एक पल। फिर वो वापस वैसा ही हो गया, जैसे किसी ने झट से पर्दा खींच दिया हो।
"तो तुम भी उन्हीं में से हो," बलवंत ने धीरे से कहा। "जो भीड़ के सामने अपनी बात कहकर खुद को हीरो समझते हैं।"
"नहीं सर," रवि ने कहा। "मैं वो चाय वाला हूँ, जिसे आपने तीन साल में नहीं पहचाना। मैं हीरो नहीं। मैं सिर्फ़ बही लेकर खड़ा हूँ। और ये बही आज बोलेगी, चाहे कुछ भी हो।"
उसने अपना हाथ उठाया। बही ऊपर चढ़ी। भीड़ में से एक आवाज़ आई — "बोलो!"
फिर दूसरी — "बोलो रवि!"
फिर तीसरी, चौथी, और फिर पूरा मैदान गूँजने लगा — "बो-लो! बो-लो!" — जैसे किसी विवाह में ढोल बज रहा हो।
रघुवीर सिंह ने हाथ उठाया और भीड़ फिर रुक गई। उन्होंने रवि की तरफ़ देखकर कहा, "बेटा, कल की तिजोरी वाली बात… उस पर बाद में। पहले इनका काम पूरा कर।"
रवि ने सिर हिलाया। उसने बही खोली — दूसरा पन्ना। पर इस बार उसने पढ़ना शुरू करने से पहले रुककर भीड़ से कहा, "ये बही में लिखे नामों की बात नहीं है। ये उन आँखों की बात है, जो आज भी मेरी तरफ़ देख रही हैं — क्या मैं उनके लिए ये सब खोल पाऊँगा या नहीं।"
किसी बूढ़ी औरत ने मुँह से दुपट्टा हटाया और कहा, "खोल दे बेटा। खोल दे। हम यहीं खड़े हैं।"
रवि हँसा — पहली बार उस दिन — और उसकी हँसी में कुछ ऐसा था कि पास खड़े लुट्टन की आँखें भर आईं। लुट्टन ने मुँह फेरकर अपनी बनियान से नाक पोंछी और फुसफुसाया, "भगवान भी मुझे भूल गया है… ये रवि भी ना…" उसका गला भर गया, बात पूरी नहीं हुई।
तभी ज़ुबैर ने एक कदम और आगे बढ़ाया।
"सुनो सब," उसने आवाज़ ऊँची की। "मेरी बात पूरी हुई नहीं।" उसने भीड़ को देखा। "मैंने कबूल किया कि मैंने पैसा दिया। पर सुई भेजने वाला एक आदमी और था। वो मेरे जैसा छोटा नहीं। वो बड़ा आदमी है।" उसने मंच के पीछे की तरफ़ नहीं, बल्कि भीड़ की तरफ़ उँगली उठाई। "वो आज इसी भीड़ में बैठा है।"
मैदान में एक सरसराहट दौड़ गई, जैसे सूखी घास में आग लगी हो।
"कौन?" किसी ने कहा।
"कौन है? कहाँ है?"
लोग अपने आस-पास देखने लगे, एक-दूसरे के चेहरे ताड़ने लगे। भीड़ का हर आदमी शक की नज़र से पड़ोसी को देखने लगा। एक औरत अपने पति का हाथ छोड़कर एक कदम पीछे हट गई, और किसी बूढ़े ने अपना थैला सीने से लगा लिया।
रवि झटके से पलटा।
उसकी नज़र भीड़ पर घूमी — हज़ार चेहरे, हज़ार आँखें, सब उलझे हुए। वो हर चेहरे पर रुकता, फिर आगे बढ़ जाता — किसी पर शक, किसी पर डर।
तभी उसकी नज़र भीड़ के एक कोने में रुकी। एक बूढ़ा आदमी। सफ़ेद कोट, टेढ़ा चश्मा, सफ़ेद बाल… हाथ में एक छोटा बैग।
रवि की साँस अटक गई। उसकी उँगलियों में बही काँपी।
और पीछे से, किसी की काँपती आवाज़ आई — इतनी धीमी कि सिर्फ़ पास वालों ने सुनी। क़ासिम भाई थे। वो अपनी कुर्सी पकड़े, होंठ हिलाते रह गए, जैसे दस साल का सन्नाटा टूट रहा हो। "एहसान…"
॥
क़ासिम भाई का वो "एहसान…" हवा में लटका रह गया, जैसे किसी ने घंटी बजाई हो और डोरी हाथ से छूट गई हो।
भीड़ में एक सरसराहट उठी — पहले धीमी, फिर तेज़। लोग गर्दन उठाकर देखने लगे कि क़ासिम भाई ने किसका नाम लिया। पर क़ासिम भाई की आँखें भीड़ के उस कोने पर टिकी थीं, जहाँ सफ़ेद कोट वाला बूढ़ा खड़ा था।
और वो बूढ़ा, जो अब तक सबके बीच एक आम आदमी की तरह खड़ा था, अचानक हिला।
पहले उसका कंधा काँपा। फिर उसने एक कदम पीछे किया। फिर दूसरा। और फिर वो अचानक पलटकर भागा — दाएँ-बाएँ लोगों को धक्के देता हुआ, अपने बैग को सीने से चिपकाए हुए।
"पकड़ो उसे!" किसी ने चीखकर कहा।
"भाग रहा है! देखो, भाग रहा है!"
भीड़ में हलचल मच गई। एक औरत गिरी, उसका दुपट्टा उसके सिर से खिसक गया। एक बूढ़े का थैला फिसला। लोग भागते हुए बूढ़े के पीछे भागने लगे, पर भीड़ इतनी घनी थी कि कोई ठीक से आगे नहीं बढ़ पा रहा था।
तभी सामने से कोई आया।
मीरा। बैसाखी टेकती हुई, चेहरे पर पसीना और आँखों में वो ठंडा गुस्सा। उसने अपनी बैसाखी ज़मीन पर जमाई और एक ही हाथ से बूढ़े का कॉलर पकड़ लिया। ज़ोर इतना कि बूढ़े का पूरा शरीर झटके से रुक गया, और उसका बैग उसके हाथ से छूटने ही को था।
"कहाँ जा रहे हो, बाबा?" मीरा ने कहा, आवाज़ में कोई जल्दी नहीं थी। "इतनी भीड़ में अकेले भागना ठीक नहीं। गिर जाते, तो कौन उठाता?"
बूढ़े ने उसका हाथ छुड़ाने की कोशिश की, पर मीरा की पकड़ लोहे की थी।
"छोड़ो मुझे!" वो हकलाया। "मेरा इससे कोई वास्ता नहीं!"
"वास्ता नहीं?" मीरा ने मुस्कुराकर कहा। "तो भाग क्यों रहे थे? ठीक-ठाक खड़े रहते।"
अब तक पीछे से तीन-चार आदमी आ पहुँचे। एक ने बूढ़े का दूसरा हाथ पकड़ा, एक ने कंधा। भीड़ ने चारों तरफ़ से घेरा बना लिया — आगे, पीछे, दाएँ, बाएँ, सब तरफ़ चेहरे ही चेहरे। भागने की जगह नहीं बची।
रवि मंच से उतरा। लोग उसे रास्ता देते गए, पर कोई कुछ बोला नहीं। वो बूढ़े के सामने आकर खड़ा हो गया।
दो कदम की दूरी। तीन शायद।
बूढ़े का चेहरा — झुर्रियाँ, सफ़ेद दाढ़ी, टेढ़ा चश्मा, और आँखों के नीचे काले गड्ढे। सफ़ेद बाल जगह-जगह से पसीने से भीगे हुए। वो चेहरा रवि को किसी और रात में ले गया — उस रात, जब सब कुछ धुँधला था, दालचीनी की गंध थी, और उसके पापा के होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
"तुम…" रवि की आवाज़ फटी। उसने एक गहरी साँस ली, जैसे वो हर बात से पहले लेता है, और खुद को संभाला। "तुम्हारा चेहरा…"
वो पूरा वाक्य ख़त्म नहीं कर पाया।
पीछे से लुट्टन आया, बनियान पसीने से भीगी, होंठों से पान की लाली उतर चुकी। उसने बूढ़े को देखा, फिर आँखें फाड़कर कहा, "अरे, ये तो…" — और वहीं रुक गया। उसका मुँह खुला रह गया, जैसे कोई भूखा हो और थाली सामने से खींच ली गई हो।
भीड़ के पीछे से चटाई पर बैठी कुर्सी की आवाज़ आई — खड़खड़। सब पलटकर देखने लगे।
क़ासिम भाई उठ रहे थे।
उन्होंने अपना मोटा काला चश्मा उतार दिया था, और पहली बार सबने उनकी आँखें देखीं — छोटी, धँसी हुई, लाल। वो धीरे-धीरे चलकर आगे आए। कोई उन्हें टोकने की हिम्मत नहीं कर रहा था, जैसे मैदान का हर आदमी जानता हो कि ये जो अब होगा, इसके बीच में नहीं आना चाहिए।
वो बूढ़े के सामने आकर रुके।
"एहसान?" उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा।
बूढ़े ने सिर झुका लिया। बस झुका लिया। कोई जवाब नहीं।
क़ासिम भाई ने अपना हाथ उठाया — काँपता हुआ, झुर्रियों वाला हाथ। उन्होंने बूढ़े का चेहरा दोनों हाथों में लिया। बड़े धीरे से, जैसे कोई टूटी हुई मूर्ति उठा रहा हो। और फिर वो फुसफुसाए, इतने धीमे कि सिर्फ़ पास वाले सुन सके, पर रवि सुन रहा था और सुनने वाले भी।
"मैंने तुझे बचाया था, बेटा। अपनी छाती पर बिठाया था, जब तेरी माँ मरी थी। तू नौ साल का था, और तू रात भर रोया था, और मैंने तेरे सिर पर हाथ रखकर कहा था — अब तू मेरा बेटा है।"
क़ासिम भाई की आवाज़ टूटी।
"और तूने मेरे ही हाथों से मेरा सब कुछ छीन लिया।"
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