Billionaire Empire System – Chapter 819
"मैं चाय वाला हूँ," उसने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर मैदान के आख़िरी कोने तक पहुँची। "आज चाय नहीं, सच परोसूँगा। और सच कड़वा होता है, तो ज़रा सँभलकर सुनिए।"
उसने बही खोली। पन्ना पलटा। पहला नाम आया — बूढ़ा दर्ज़ी।
"इस आदमी ने पंद्रह साल दुकान चलाई। बलवंत सर ने इसे हर महीने अपनी फ़ीस दी। जिस दिन इसने मना किया, उस दिन इसकी सिलाई मशीन तोड़ दी गई।"
भीड़ में किसी ने धीरे से कहा, "अरे बाप रे…" और बूढ़ा दर्ज़ी धीरे-धीरे सीढ़ियों से ऊपर आया। चौकी के पास पहुँचते ही उसके हाथ जुड़ गए और आँखों से पानी बहने लगा। उसने कुछ कहने की कोशिश की, पर आवाज़ गले में ही अटक गई। रवि ने उसका कंधा पकड़ा और भीड़ की तरफ़ मुड़ा।
"ये रो रहा है। पर याद रखिए — ये रो नहीं रहा, ये पंद्रह साल बाद पहली बार खुलकर साँस ले रहा है।"
किसी की थाली हाथ से छूटकर गिरी। छन्न! आवाज़ मैदान में गूँज गई। उसके बाद ऐसा सन्नाटा छाया कि पक्षियों की आवाज़ दूर छतों से सुनाई दे रही थी।
तभी भीड़ के पीछे से सफ़ेद कुर्ते वाले चार आदमी आगे बढ़े। लोग अपने आप रास्ता छोड़ने लगे, जैसे पानी बँट रहा हो। सबसे आगे ज़ुबैर था — धीमी चाल, हाथ जेब में, चेहरे पर वो ठंडापन जो सिर्फ़ उस आदमी के पास होता है जिसने बहुत कुछ देखा है।
वो मंच के सामने आकर रुका। बिना माइक उठाए, बस इतनी ऊँची आवाज़ में बोला कि सब सुन सकें।
"मैं भीड़ से नहीं डरता, रवि। मैं इसलिए आया हूँ कि तेरी बही में जो नाम हैं, उनमें एक नाम मेरा भी है।" उसने भीड़ को देखा। "पर उससे पहले, मैं एक बात साफ़ कर दूँ।" उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ हिला। "मैंने दस साल पहले एक फ़ोन किया था।"
भीड़ में साँस रुक गई। और फिर भीड़ के बीच से एक बूढ़ी औरत की आवाज़ उठी, जिसने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया — "अरे बाप रे, ये तो खुद बोल रहा है!"
रवि ने अपने हाथ देखे। बही पकड़े हुए थे। और पहली बार… पहली बार वो नहीं काँप रहे थे।
ज़ुबैर ने जेब से रुमाल निकाला और माथा पोंछा। फिर उसने धीरे से कहा, इतने धीरे से कि माइक के बिना भी हर दिल तक पहुँच गया।
"उस फ़ोन के बाद एक आदमी मर गया… और वो आदमी तेरा पापा था।"
मैदान में हज़ार आदमी एक साथ साँस लेना भूल गए।
॥
"झूठ!" — आवाज़ भीड़ के बीच से निकली, और उसके बाद जो हुआ, वो किसी ने सोचा नहीं था।
हज़ार लोग एक साथ आगे बढ़े, जैसे मैदान में बारिश के बाद पानी की लहर दौड़ती है। ज़ुबैर के चारों तरफ़ सफ़ेद कुर्ते वाले घबराकर पीछे हटे, पर ज़ुबैर टस से मस नहीं हुआ। उसने रुमाल जेब में रखा और भीड़ को देखने लगा, जैसे कोई तमाशा देख रहा हो।
तभी भीड़ में एक हाथ उठा। रघुवीर सिंह का हाथ।
वो अपनी वर्दी में थे, पसीने से भीगे, पर आवाज़ में जो चीज़ थी, वो दस साल से दबी हुई थी। उन्होंने भीड़ की तरफ़ मुड़कर कहा, "रुको! पीछे हटो! अभी कोई कुछ नहीं करेगा।" फिर उन्होंने पत्थर की चौकी की तरफ़ देखा। "रवि, तेरे हाथ में बही है। बात पूरी होने दे।"
लीक पर खड़े लोग रुक गए। रघुवीर मंच के पास आकर खड़े हो गए, और उनकी उँगली भीड़ की तरफ़ उठी रही, जैसे कोई दरवाज़ा पकड़े हो।
ज़ुबैर ने जेब से हाथ निकाला। वो धीरे बोला, पर उसकी आवाज़ मैदान के कोने-कोने तक पहुँची, "मैं छोटा आदमी हूँ। मेरे हाथ में कुछ नहीं था। बस पैसा था… और मैंने पैसा दिया।"
किसी ने पीछे से कहा, "अब ये पैसे की बात करता है!"
ज़ुबैर ने उस तरफ़ देखा भी नहीं। वो बोलता रहा, "पर साहब लोग, पैसा सिर्फ़ चीज़ें खरीद सकता है। पैसा किसी को मार नहीं सकता। मारने के लिए एक हाथ चाहिए। एक उँगली चाहिए।" उसने अपनी उँगली उठाई और मंच के पीछे की तरफ़ इशारा किया।
भीड़ ने उस तरफ़ देखा।
वहाँ, पीछे की कतार में, एक लकड़ी की कुर्सी पर, एक आदमी बैठा था। सफ़ेद कुर्ता, गले में सोने की चेन, हाथ कुर्सी की बाँह पर टिके हुए। बलवंत राय। आज पहली बार, वो भीड़ के बीच आया था। उसने सोचा होगा कि कोई उसे नहीं देखेगा। पर हज़ार आँखें उस पर पड़ चुकी थीं।
"अरे, बलवंत साहब खुद आए हैं!" किसी ने कहा।
"कहाँ?" दूसरे ने गर्दन उठाई।
"वो… पीछे, कुर्सी पर…"
और फिर लहर सी चली — "बलवंत साहब… बलवंत साहब…" — जैसे किसी ने पूरी भीड़ में एक ही नाम बोलकर छोड़ दिया हो।
बलवंत का चेहरा पत्थर जैसा था। न कोई भाव, न कोई हलचल। बस, उसकी उँगली कुर्सी की बाँह पर इतनी ज़ोर से जमी थी कि नाखून सफ़ेद पड़ गए थे।
ज़ुबैर ने एक कदम आगे बढ़ाया। उसकी आवाज़ अब थोड़ी और साफ़ थी, जैसे वो अब भीड़ से नहीं, सिर्फ़ बलवंत से बात कर रहा हो।
"मैंने पैसा दिया," उसने कहा। "पर सुई बलवंत ने भेजी थी।"
मैदान में सन्नाटा छा गया।
सुई।
एक शब्द, जो सिर्फ़ चाय की दुकान वालों ने नहीं सुना था। इस इलाक़े में हर घर ने उसे सुना था — रातों को, धीरे से, अंधेरे में। कोई किसी को नहीं बताता था, पर सब जानते थे।
और फिर ऐसा हुआ कि रवि की साँस रुक गई।
भीड़ के बीच से, बच्चों की कतार में से, एक छोटा बच्चा — पाँच-छह साल का — अपने पिता की कमीज़ खींचकर बोला, "पापा, सुई क्या होती है?"
पिता का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने बच्चे को झट से गोद में उठाया और उसका सिर अपने कंधे पर दबा दिया। "चुप… चुप बेटा। बाद में बताऊँगा।"
रवि ने ये सुना। उसने देखा — पिता की गोद में बच्चा चुप हो गया था, पर उसकी छोटी-छोटी आँखें मटमैली-सी हो गई थीं, जैसे उसे भी कुछ समझ आ गया हो।
और रवि का हाथ, जो माइक पकड़े हुए था, धीरे-धीरे नीचे आ गया।
लुट्टन ने पास से देखा और फुसफुसाया, "रवि? बोल ना…"
रवि ने कुछ नहीं कहा। उसने बस अपना सिर उठाया और उस पिता को देखा, जो अपने बच्चे की आँखें अपनी कंधे पर छिपा रहा था। इसी इलाक़े में, इसी मैदान में, कितने बच्चे होंगे जो ये सवाल पूछेंगे और उनके पापा उन्हें चुप करा देंगे?
बही उसके हाथ में थी। पीली, फटी, काँपती नहीं। और पहली बार रवि को लगा कि ये बही उससे भारी है।
फिर बलवंत उठा।
वो खड़ा हुआ — धीरे-धीरे, जैसे कोई पुराना पेड़ हिल रहा हो। उसने कुर्सी का सहारा छोड़ा और ज़ुबैर की तरफ़ देखा। उसकी आवाज़ नहीं उठी। वो कभी आवाज़ नहीं उठाता। उसने बस कहा, "ज़ुबैर।"
बस इतना। ज़ुबैर।
ज़ुबैर ने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। वो मुस्कान ठंडी थी, जैसे लोहे पर बर्फ़ रख दी गई हो।
"सुन रहे हो, साहब?" ज़ुबैर ने कहा। "आज तुम्हारा नाम भी साथ बोला जाएगा। न सिर्फ़ मेरा।"
बलवंत ने एक कदम आगे बढ़ाया। उसका शरीर भारी था, पर कदम अब भी वैसे ही थे — पत्थर जैसे, जैसे कोई लड़खड़ाता नहीं। भीड़ ने अपने आप उसके लिए रास्ता छोड़ दिया, जैसे अंधेरे में इंसान बिना सोचे किनारे पर खिसक जाता है।
वो मंच के सामने रुका। उसने रवि को देखा — सीधे, आँखों में। और रवि ने पहली बार उन आँखों में जो देखा, वो उसे उम्मीद नहीं थी। वो डर भी नहीं था। वो कुछ और था — जैसे कोई पुराना हिसाब, बरसों का जमा हुआ, और आज वो खुद अपने ही सामने खड़ा हो गया हो।
"बेटा," बलवंत ने कहा। आवाज़ वही — धीमी, मीठी, और पीछे धमकी लिपटी हुई। "तुमने मेहनत की। मैं मानता हूँ। पर जो अब होने वाला है, उसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं। दोष उनका है, जो ये सब चला रहे हैं।"
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