Billionaire Empire System – Chapter 816
फिर उन्होंने उसे थाली में रखा हुआ ठंडा खाना खिलाया। रवि ने कुछ नहीं कहा, चुपचाप रोटी खाई, और माँ उसके सामने ही बैठी रही, जैसे बचपन में बैठती थीं।
मीरा और लुट्टन दुकान पर इंतज़ार कर रहे थे। लुट्टन ने दुकान के पीछे वाली कोठरी से एक लोहे की छड़ निकाली थी और मीरा उसे देखकर हँस पड़ी थी। "लुट्टन, तू लड़ने तो नहीं जा रहा?"
"मैं तो बस सँभालने जा रहा हूँ," लुट्टन ने कहा। "अगर रवि गिरे, तो मैं छड़ से उसे उठाऊँगा। और अगर कोई आए, तो मैं यही छड़ उसके सामने रखकर कहूँगा — भाई साहब, इससे दूर रहिए, इसमें ज़ंग लगी है, टिटनेस हो जाएगा।"
मीरा ने उसके कंधे पर हाथ रखा। "तू मज़ाक करता है, पर तेरी टाँगें काँप रही हैं।"
"पता है," लुट्टन ने कहा। "टाँगें मेरी नहीं, मेरे जूते काँप रहे हैं।"
इरा आई, उसके चेहरे पर थोड़ा पानी फिरा हुआ था और बाल फिर से बँधे हुए थे। उसने रवि की तरफ़ देखा और कहा, "मैं तैयार हूँ।"
"मीरा," रवि ने कहा, "तुम पिछली दीवार पर। जैसे ही हम अंदर घुसें, तुम दीवार के उस कोने पर चढ़ जाना जहाँ बिजली के तार हैं।"
"तीन मिनट," मीरा ने कहा। "तीन मिनट के बाद अगर तुम नहीं निकले, तो मैं अंदर आ जाऊँगी। और मेरे आने का मतलब होगा — तुम्हारी योजना बेकार हो गई।"
"और तुम, लुट्टन," रवि ने कहा, "तू गली के मोड़ पर रहेगा। जैसे ही कोई गाड़ी आए, तू ज़ोर से गाना शुरू कर देना — जैसे कोई नशे में हो। मैं तुझे सुनकर समझ जाऊँगा।"
लुट्टन ने गला साफ़ किया और एक सुर में गाने की कोशिश की। मीरा ने कान बंद कर लिए और बोली, "हे भगवान, अगर ये गाएगा, तो बलवंत खुद आकर पकड़ लेगा।"
रवि हँसा। इरा ने भी मुस्कुराकर उसकी तरफ़ देखा, और उसी पल रवि को लगा कि रात की सारी डरावनी बातें कुछ देर के लिए पीछे छूट गई हैं।
फिर सब चुप हो गए। रवि ने घड़ी को हथेली में उठाया। उसके अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई, बस सुइयाँ चलती रहीं — धड़… धड़… धड़… वो अब भी चल रही थी।
"पापा," रवि ने धीरे से कहा, "आज आख़िरी रात है।" उसने घड़ी को कान से लगाया, जैसे माँ करती थीं। "कल सुबह सिर्फ़ सच होगा। कुछ भी मेरा नहीं होगा।"
उसने घड़ी जेब में डाली और सबको देखा। "चलो," उसने कहा।
सब निकल पड़े। गली में अंधेरा था और बादलों के पीछे चाँद छिपा था। लुट्टन ने अपना जूता बाँधने के लिए झुककर देखा और फुसफुसाया, "भगवान, अगर आज मैं बच गया, तो तेरे नाम की लॉटरी का टिकट ले लूँगा।"
तभी रवि की जेब में फ़ोन काँपा। उसने निकाला — रोहित का मैसेज था।
"भैया, मेरे पापा ने अभी-अभी ज़ुबैर को फ़ोन करके कहा — वो चाय वाला आज रात आएगा, सब तैयार रखो। हमें जाल में बुलाया जा रहा है। पर मुझे लगता है ये सच है भी, क्योंकि पापा फ़ोन रखकर हँस रहे थे… और मेरे पूरे जीवन में मैंने उन्हें इतना डरा हुआ कभी नहीं देखा। भैया, आज पापा के हाथ काँप रहे थे।"
रवि ने मैसेज दो बार पढ़ा। उसके चेहरे पर कोई डर नहीं था। उलटा, उसकी आँखों में एक अलग चमक आ गई, और वो चमक इरा ने पहले भी देखी थी — तब जब रवि कहीं खोई हुई चीज़ ढूँढ लेता था।
"क्या हुआ?" इरा ने पूछा।
रवि ने फ़ोन जेब में रखा और पलटकर सबकी तरफ़ देखा। लुट्टन का जूता अभी भी खुला था, मीरा के हाथ पहले से मुट्ठी में बंधे थे, और इरा के कंधे पर उसका लैपटॉप बैग लटक रहा था।
"आज रात बंगला नहीं," रवि ने कहा, और वो शब्द सीधे उसकी छाती से निकले। "आज रात जाल है।"
लुट्टन का जूता उसके हाथ से छूटकर गिरा। "जाल? मतलब कि वो हमारा इंतज़ार कर रहे हैं?"
"हाँ," रवि ने कहा। "पर एक बात उन्होंने सोची नहीं।"
"क्या?" इरा ने पूछा।
रवि ने धीरे से मुस्कुराकर घड़ी को जेब से बाहर निकाला। "जाल मकड़ी ने बनाया है," उसने कहा। "पर इसमें फँसेगा कौन — ये मैं तय करूँगा। आज रात जाल मेरी मर्ज़ी से खुलेगा।"
और उसने क़दम बढ़ा दिया — उस गली से बाहर, जहाँ अंधेरे में कोई गाड़ी अपनी बत्तियाँ बुझाए खड़ी थी।
गली के मोड़ पर पहुँचकर रवि रुका। सामने अंधेरे में एक कार खड़ी थी, बत्तियाँ बुझी हुईं, इंजन चालू। उसकी खिड़की से धुँए की एक पतली लकीर ऊपर उठ रही थी।
"देखा?" लुट्टन ने फुसफुसाया। "वो हमारा इंतज़ार कर रहे हैं। चलो वापस।"
"नहीं," रवि ने कहा। उसने इरा की तरफ़ देखा। "तुम्हारे पापा की डायरी उस कार में नहीं है, न बंगले के ताले में। वो ज़ुबैर के पास है, और ज़ुबैर इसे अपने सीने से लगाकर रखता है। इसलिए वो हमें बुला रहा है — डरकर नहीं, लालच से। वो चाहता है कि हम अंदर आएँ, ताकि वो हमें ऐसे पकड़े जैसे मछली को काँटे से।"
इरा ने उसकी आँखों में देखा। "तो फिर?"
"तो हम वही करेंगे जो उसे उम्मीद नहीं है।" रवि ने कार की तरफ़ देखा। "वो सोचता है हम पिछली दीवार से आएँगे, क्योंकि चोर हमेशा पिछली दीवार से आता है। हम सामने के दरवाज़े से जाएँगे।"
लुट्टन का मुँह खुला रह गया। "सामने के दरवाज़े से? भैया, वहाँ तो दो आदमी खड़े होंगे।"
"तीन," रवि ने कहा। "पर उन तीनों को ज़ुबैर ने ये नहीं बताया होगा कि चाय वाला कैसा दिखता है। वो सिर्फ़ इतना जानते हैं कि कोई आएगा।" उसने अपनी जेब से एक पुरानी गमछी निकाली और सिर पर लपेट ली। "आज रात मैं चाय वाला हूँ। और चाय वाला सामने के दरवाज़े से ही आता है।"
मीरा ने धीरे से कहा, "और अगर वो पहचान गए?"
रवि ने घड़ी को जेब से निकाला, एक पल उसे देखा, और फिर इरा की तरफ़ बढ़ा दिया। "अगर पहचान गए," उसने कहा, "तो ये तुम्हारे पास रहेगी। मेरे पास ये रहने से ज़्यादा फ़ायदा तुम्हारे पास रहने में है।"
इरा ने घड़ी नहीं ली। उसने रवि का हाथ पकड़कर उसे वापस उसकी जेब में डाल दिया। "ये तुम्हारे पापा की है," उसने कहा। "और आज रात हम दोनों के पापा इसी शहर में दबे हुए हैं। इसे तुम्हारे सीने पर ही रहने दो।"
कुछ देर कोई नहीं बोला। लुट्टन ने अपना जूता बाँधा, इस बार ठीक से, दोहरी गाँठ लगाकर। मीरा ने अपने बाल पीछे बाँधे और अपनी जेब से एक छोटा-सा रुमाल निकालकर रवि को दिया।
"ये क्या है?" रवि ने पूछा।
"मेरी माँ का है," मीरा ने कहा, आवाज़ थोड़ी भारी। "कहती थी, जब डर लगे तो इसे हाथ में रख लेना। बस हाथ में। कुछ नहीं बोलना।" उसने रवि की तरफ़ देखा। "मुझे नहीं पता इसमें क्या ताक़त है, पर माँ झूठ नहीं बोलती थी।"
रवि ने रुमाल मुट्ठी में भींच लिया। वो ठंडा था, पर उसकी हथेली में गरम लग रहा था।
फिर वो सब गली से बाहर निकले। सड़क पार करके बंगले की सामने वाली सड़क पर आए। दूर, बंगले के सामने वाले गेट पर एक बल्ब जल रहा था, और उसकी पीली रोशनी में दो साये खड़े थे।
रवि ने गमछी ठीक से बाँधी, कंधे सीधे किए, और आवाज़ बदलकर बोला — "चाय वाला आया है। साहब ने बुलाया है।"
इरा ने उसे देखा। उसके हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ में कुछ ऐसा था जो पहले नहीं था। वो अब डर नहीं रहा था। वो अब किसी और की बात बोल रहा था — अपने पापा की।
लुट्टन ने धीरे से कहा, "भगवान, आज तो तू भी हमारे साथ चल।"
और वो तीनों उस पीली रोशनी की तरफ़ बढ़ने लगे — उस जाल की तरफ़, जो उनके लिए बिछाया गया था, पर जिसकी डोर अब रवि के हाथ में थी।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno