Billionaire Empire System – Chapter 815
फ़ोन पर हल्की हँसी आई — पर वो बंसल की नहीं थी। वो हँसी किसी और की थी, किसी ठंडी, मुलायम आवाज़ वाले की, जो रवि ने अस्पताल के बाहर सुनी थी, जब दो काली गाड़ियाँ आई थीं।
"मैडम," ज़ुबैर की आवाज़ आई, "बहादुरी अच्छी बात है। पर एक बात बता दूँ — मेरे पास इरा के अब्बू की डायरी है। वो डायरी जो उसके पापा ने आख़िरी रात लिखी थी। हर पन्ने पर उनका हाथ है, और आख़िरी पन्ने पर एक नाम भी है — मेरा।"
इरा के हाथ से मोबाइल फिसलकर कोठरी की मिट्टी पर गिर गया। धड़ाम की आवाज़ से मोमबत्ती की लौ हिल उठी। स्क्रीन अब भी जल रही थी, और उसमें से ज़ुबैर की आवाज़ आ रही थी, जैसे कोई मरी हुई चीज़ बोल रही हो।
"सोच लो, मैडम," वो कह रहा था। "तुम्हारे पापा की आख़िरी लिखाई — या तुम्हारे चाय वाले की दुकान। दोनों में से एक चुनना पड़ेगा।"
फ़ोन कट गया। स्क्रीन बुझ गई। और कोठरी में सिर्फ़ मोमबत्ती की काँपती लौ बची रह गई।
॥
मोबाइल की स्क्रीन बुझ चुकी थी, पर उसकी काली शीशे में मोमबत्ती की लौ अब भी काँप रही थी। इरा दीवार से टिककर बैठ गई थी। उसके घुटने सीने से लगे थे और दोनों हाथ ज़मीन पर पसरे थे, जैसे किसी ने उसके अंदर की सारी हड्डियाँ निकाल दी हों।
कोठरी में कोई कुछ नहीं बोला। बाहर गली में किसी कुत्ते ने एक बार भौंका और फिर चुप हो गया। क़ासिम भाई की बही मेज़ पर खुली पड़ी थी और उसके पन्नों की सरसराहट भी सुनाई नहीं दे रही थी।
रवि ने धीरे से क़दम बढ़ाया। उसने इरा के सामने घुटने टेके और गिरा हुआ मोबाइल उठाकर किनारे रख दिया।
"इरा," उसने कहा।
इरा ने कोई जवाब नहीं दिया। उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
मीरा ने आगे झुककर उसका कंधा छुआ। "इरा, क्या हुआ? वो क्या बोला?"
और तब इरा ने पहली बार सिर उठाया। उसकी आँखें सूखी थीं — बिलकुल सूखी, जैसे आँसू भी अंदर ही कहीं जम गए हों।
"तुम्हें पता है," उसने धीरे से कहा, "दस साल से मैं अपने अब्बू की डायरी ढूँढ रही हूँ।" उसकी आवाज़ टूटी, पर वो रुकी नहीं। "जिस रात वो मरे, उससे पहले उन्होंने कुछ लिखा था। माँ ने कभी नहीं बताया, और मैं सोचती रही कि शायद माँ ने ही छिपा दी है, शायद कहीं रख दी है। मैंने उनकी सिलाई की डिबिया तक देखी। हर काग़ज़ देखा।"
वो रुकी और अपनी हथेली अपने घुटने पर मलने लगी।
"और अब पता चला कि वो डायरी ज़ुबैर के पास है। उसके पास। मेरे पापा की आख़िरी लिखाई, उस आदमी की जेब में।"
"तो क्या वो उम्मीद भी झूठ है?" इरा ने पूछा।
रवि कुछ देर चुप बैठा रहा। फिर उसने अपनी जेब से घड़ी निकाली और मोमबत्ती की रोशनी में उसे हथेली पर रख लिया। घड़ी की सुइयाँ चल रही थीं।
"कुछ भी झूठ नहीं है," उसने कहा। "तुम्हारे पापा की डायरी सच का हिस्सा है। और ट्रस्ट का रजिस्टर बाक़ी हिस्सा है। दोनों एक ही जगह हैं।"
इरा ने उसकी तरफ़ देखा।
"कल रात बंगले से हमें दो चीज़ें चाहिए," रवि ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडापन आ गया जो बहुत कम लोगों ने सुना था। "तुम्हारे पापा की डायरी, और ट्रस्ट का रजिस्टर। एक भी काग़ज़ छूटा, तो पूरी रात बेकार।"
इरा ने अपनी आँखों को गीला होते देखा और झटके से पलकें झपकीं। "तुम अभी भी चले जाओगे?" उसके शब्द बाहर आते ही उसका हाथ रवि की आस्तीन पर चला गया। "इतना सब सुनने के बाद भी?"
रवि ने हल्की सी मुस्कान दी, वो मुस्कान जो उसके चेहरे पर बड़ी मुश्किल से आती थी। "तुमने एक बार कहा था कि तुम्हारे पापा की मौत का सच तुम खुद ढूँढ़ोगी।" उसने घड़ी जेब में रखी। "अब मैं तुम्हारे साथ चलूँगा। जब तक सच सामने नहीं आता, तुम अकेली नहीं रहोगी।"
इरा ने एक लंबी साँस खींची। पहली बार उसकी आँखों से पानी बहा और वो उसे पोंछने के लिए अपनी कलाई उठा ही रही थी कि लुट्टन ने अपनी जेब से एक मैली रूमाल निकालकर आगे बढ़ा दिया।
"ले," उसने कहा, "धोया हुआ है। कल ही धोया था। अरे, ऐसे मत देखो — पान की लाली लगी है, पर साफ़ है।"
इरा हँस पड़ी। हँसी गले में अटकी हुई, गीली हँसी थी, पर थी तो सही। मीरा ने भी मुस्कुराकर सिर हिलाया।
"ठीक है," इरा ने रूमाल लेकर कहा। "पर एक बात कहनी है।" उसने रवि की तरफ़ देखा। "अगर हम कल निकल आए, तो मैं तुम्हें वो बताऊँगी जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताया।"
"क्या?" रवि ने पूछा।
"कल," इरा ने कहा। "पहले वो काग़ज़।"
रात गहरा रही थी। क़ासिम भाई ने मेहरा को अलग बुलाकर कुछ कहा और मेहरा ने टेप को अपने सीने से लगाकर थाम लिया। रोहित ने फिर एक बार अपनी घड़ी देखी और बोला, "मुझे निकलना चाहिए। अगर मैं देर से घर पहुँचा, तो पापा को शक हो जाएगा।"
"सुन," रवि ने कहा, "अगर अंदर कुछ गड़बड़ लगे, तो तुरंत निकल जाना। मुझे अपने बारे में सोचने की ज़रूरत नहीं।"
रोहित ने गले में हँसी दबाई और उसकी आवाज़ में कड़वाहट आई। "तुम्हें पता है, रवि, पहली बार मुझे किसी की चिंता हो रही है। मेरे पूरे जीवन में पापा ने मेरे लिए सिर्फ़ एक चीज़ सिखाई — अपना हिसाब रखो। पर आज तुमने मुझे एक और चीज़ सिखाई।"
"क्या?" रवि ने पूछा।
"यह कि किसी की परवाह करना भी कोई हिसाब ही होता है," रोहित ने कहा, और चुपचाप कोठरी से बाहर निकल गया।
रवि घर पहुँचा तो रात के दो बज रहे थे, पर दरवाज़े पर ताला नहीं लगा था। अंदर से पीली रोशनी आ रही थी। उसका दिल धक् से रह गया। वो दौड़कर अंदर गया।
माँ ज़मीन पर बैठी थी, पापा की तस्वीर के सामने। उनके हाथ में माचिस थी और सामने एक दीया रखा था, जो अब तक बुझा हुआ था। उन्होंने माचिस की तीली जलाई, दीये की बाती पकड़ी, और रोशनी फैल गई।
"माँ," रवि ने कहा, और वो पास जाकर बैठ गया। "तुम जाग रही हो? इतनी रात को?"
सीता देवी ने उसकी तरफ़ नहीं देखा। वो तस्वीर को देख रही थी। उनके होंठ हिल रहे थे, बहुत धीरे, इतने धीरे कि रवि को सुनने के लिए झुकना पड़ा।
"अशोक," वो फुसफुसा रही थीं, "अब तेरा बेटा तेरे सामने खड़ा होगा। तू देख लेना। अपनी आँखों से देख लेना।"
रवि के हाथ काँपने लगे। वो उठने लगा, पर उसकी टाँगें जैसे ज़मीन से चिपक गई थीं। उसने देखा कि माँ ने तस्वीर के आगे चावल के कुछ दाने भी रखे हैं — ठीक वैसे ही, जैसे पापा को मीठा पसंद था।
"माँ," रवि ने फिर कहा।
सीता देवी ने पहली बार उसकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी नहीं था — बस एक ऐसी शांति थी जो किसी ने बहुत दुआ माँगकर बनाई हो।
"तू जब छोटा था," उन्होंने कहा, "तो तेरे पापा रात को उठकर तेरी चादर ओढ़ाते थे। तू सोते हुए सोचना कि तू बहुत बड़ा आदमी बनेगा। मैं पूछती कि क्या करेगा, तो तू कहता — मैं सबको चाय पिलाऊँगा।" उन्होंने उसका सिर सहलाया। "देख, तूने सच में सबको चाय पिलाई।"
रवि ने अपना सिर उनकी गोद में रख दिया। माँ के हाथ उसके बालों में फिरे, और उनकी साड़ी से चंदन की गंध आ रही थी।
"कल जाना है?" माँ ने पूछा।
"हाँ," रवि ने कहा।
"तो सुन।" उन्होंने उसका सिर उठाकर उसकी आँखों में देखा। "जब तू जाए, तो एक बात याद रखना। अगर वो तुझे डराए, तो तू उसकी आँख में देखना। डरने वाला आदमी दूसरे आदमी की आँख में देख नहीं पाता। तेरे पापा भी यही करते थे।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno