Billionaire Empire System814 / 834

Billionaire Empire System – Chapter 814

6 min read November 7, 2026

रोहित ने एक काग़ज़ निकाला और मोमबत्ती के सामने रख दिया। उस पर उसने पेंसिल से कुछ लकीरें खींची थीं — बंगले का नक़्शा।

"ये मुख्य दरवाज़ा," उसने उँगली रखी। "यहाँ जग्गू रहता है। ये पिछली गैलरी — यहाँ एक आदमी। और ये ऊपर का कमरा — बापा। उनके कमरे से सटा हुआ वो कमरा है जहाँ तिजोरी है।"

"कुत्ते कहाँ सोते हैं?" मीरा ने पूछा।

"पिछली दीवार की तरफ़। उस कोने में एक पुराना पेड़ है — वहीं उनका बिस्तर है।"

"तो हम पिछली दीवार से चढ़ेंगे," मीरा ने कहा। "मैं अंदर जाऊँगी।"

रवि ने उसकी तरफ़ देखा। "तुम नहीं, मैं।"

मीरा ने उसकी आँखों में देखा, और उसकी आवाज़ में इतनी सख़्ती आई कि कोठरी की हवा काँप उठी। "तूने मुझे पहले भी बाहर खड़ा रखा था, रवि। बलवंत के आदमियों ने मेरे भाई को मारा था, तब मैं सिर्फ़ सोलह साल की थी। मैंने उस रात कसम खाई थी कि अगर कभी मौक़ा मिला, तो मैं खुद अंदर जाऊँगी।"

"और मेरे पापा को भी उसी ने मारा था," रवि ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "मीरा, मैं तुम्हारी इज़्ज़त करता हूँ, पर अंदर मैं जाऊँगा। तुम बाहर रहोगी — अगर कुछ गड़बड़ हो, तो तुम्हें ही तीन गाड़ियों के साथ अंदर आना होगा। तुम्हारे बिना हमारा कोई रास्ता नहीं।"

मीरा कुछ देर चुप रही। फिर उसने सिर हिलाया — ना में नहीं, हाँ में, बहुत धीरे — और अपनी मुट्ठी को मेज़ पर रख दिया।

तभी इरा ने कहा, "और मैं? मैं सिर्फ़ खबर लिखूँ?"

रवि उसकी तरफ़ देखता रहा। मोमबत्ती की लौ उसके चेहरे पर पड़ रही थी, और उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो रवि ने पहली बार दुकान के सामने देखी थी — जब वो खड़ी होकर पूछ रही थी, "आप सच बताइए, ग्राहक अपने आप नहीं डरेंगे।"

"तुम उस रात मेरे साथ रहोगी," रवि ने कहा। "पर एक शर्त है। अगर मैं कहूँ कि भागो, तो पलटकर भी नहीं देखोगी।"

इरा ने उसकी आँखों में देखा, और उसका गुस्सा कहीं ग़ायब हो गया। वो धीरे से बैठ गई और दोनों हाथ अपने घुटनों पर रख दिए।

"तुम भी," उसने कहा, "अगर मेरे लिए कुछ करने की सोचो, तो पहले मुझसे पूछ लेना। और उस रात तुमने मुझसे पूछा था कि मैं तुम्हारे साथ क्यों आ रही हूँ। मैंने कहा था — क्योंकि मेरे पापा का सच भी तुम्हारी तरफ़ से है। तो अब सुन लो, मैं तुम्हारे पीछे नहीं, तुम्हारे साथ चलूँगी।"

लुट्टन ने बीच में देखा, फिर अपने मुँह में पान दबाया, और ज़ोर से चबाया।

"अच्छा," उसने कहा। "तो मैं क्या करूँ? ताली बजाऊँ?"

इरा हँस पड़ी। रोहित ने भी होंठ दबाए, और मीरा ने लुट्टन की पीठ पर इतने ज़ोर से हाथ मारा कि वो आगे झुक गया।

"तू बंगले के बाहर कुत्तों से बात करेगा," मीरा ने कहा। "तेरे पर वो आसानी से सो जाएँगे।"

"मतलब मैं पहरेदार हूँ?" लुट्टन ने कहा, और अपना पेट सहलाया। "भगवान भी मुझे भूल गया है, यार रवि।"

रवि पहली बार उस शाम हँसा। फिर उसने उठकर दीवार पर टँगी पापा की पुरानी चाँदी की घड़ी देखी, और कोठरी की धूल में उसकी टिक-टिक गूँज उठी।

तभी कोठरी के दरवाज़े पर खड़ी परछाई हिली। सब सिर उठाकर देखने लगे। सीता देवी दरवाज़े पर खड़ी थीं — सफ़ेद साड़ी में, हाथ में एक थाली जिसमें दो रोटियाँ और थोड़ी सब्ज़ी थी। उनका चेहरा पीला था, पर आँखों में वो नमी थी जो सूखकर अब मज़बूत हो गई थी।

"मैं जानती हूँ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी थी, "कि तुम सब कुछ बड़ा करने जा रहे हो। मैं रोकने नहीं आई।"

उन्होंने थाली मेज़ पर रखी और सबके चेहरे एक-एक करके देखे।

"मैं अपने बेटे को जानती हूँ," सीता देवी ने कहा। "वो किसी को मुसीबत में नहीं छोड़ेगा, चाहे उसकी अपनी जान चली जाए। यही उसके पापा में भी था, और उसी ने उन्हें खत्म कर दिया।" उनकी आवाज़ काँपी, पर वो रुकीं नहीं। "पर आज मैं तुम सब से एक बात कहने आई हूँ — मेरे बेटे को अकेला मत छोड़ो। अगर वो आग में कूदे, तो तुम सब भी कूदना। और अगर वो हार जाए, तो तुम सब उसे उठाकर वापस लाना। मेरा बेटा अकेला नहीं है।"

इरा उठकर उनके पास गई और उनका हाथ पकड़ लिया। "नहीं है, माँ," उसने कहा। "एक भी पल नहीं।"

सीता देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा, और एक पल के लिए उनकी आँखें बंद हो गईं। फिर उन्होंने पलटकर रवि की तरफ़ देखा, और उनकी आवाज़ में वही लोहा आ गया जो सिर्फ़ बच्चों की बात पर आता था।

"जो तूने पापा की घड़ी पहनी है," उन्होंने कहा, "तो अब मत रुकना।"

वो चली गईं। कोठरी में कुछ देर किसी ने कुछ नहीं कहा। फिर लुट्टन ने थाली से रोटी उठाई, उसमें सब्ज़ी लगाई, और मुँह में रख दी।

"भाभी का हाथ," उसने कहा, "कभी नहीं बदलता।"

मीरा ने रोटी तोड़ी और रोहित की तरफ़ बढ़ाई। रोहित ने पहले तो मना किया, फिर ले लिया। और रवि ने मोमबत्ती की लौ देखते हुए धीरे से कहा, "तो कल रात।"

"कल रात," रोहित ने कहा। "दो पहर के बाद।"

"और कुत्तों का कोना?" मीरा ने पूछा।

"मैं जानता हूँ," रोहित ने कहा। "जिस आदमी को वो चारा देता है, वो पहले मेरे पापा के साथ काम करता था। उसे मैं मनाने की कोशिश करूँगा।"

मीरा ने मुट्ठी बाँधी। "मैं पिछली दीवार पर रहूँगी। अगर तीन मिनट में तुम लोग नहीं निकले, तो मैं अंदर आ जाऊँगी।"

लुट्टन ने अपना हाथ उठाया, जैसे स्कूल में बच्चा। "और मैं? मैं क्या करूँगा, ये तो बताओ?"

रवि ने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। "तू गली के मोड़ पर खड़ा रहेगा, लुट्टन। अगर कोई गाड़ी आए, तो चाय का कुल्हड़ हाथ में लेकर खड़ा हो जाना — जैसे कोई देर रात का ग्राहक हो।" उसने घड़ी जेब में रखी। "और हाँ, अगर सच में कुछ गड़बड़ हो, तो शोर मत करना — भागना।"

"भागना?" लुट्टन ने कहा, और उसकी टाँगें काँपने लगीं। "मैं भागूँगा तो मेरी टाँगें मुझे छोड़कर पहले निकल जाएँगी।"

इरा हँस पड़ी, और रोहित भी मुस्कुरा दिया। मीरा ने सिर हिलाया और अपनी जैकेट पहन ली।

तभी इरा के मोबाइल की स्क्रीन जल उठी। फ़ोन बज रहा था। उसने स्क्रीन देखी और उसका चेहरा एकदम से सख़्त हो गया।

"नरेश बंसल," उसने धीरे से कहा।

रवि ने उसकी तरफ़ देखा। "मत उठाओ।"

"वो दस बार बजा चुका है।" इरा ने स्क्रीन घुमाई। "अगर मैंने नहीं उठाया, तो वो कुछ और करेगा।"

उसने फ़ोन स्पीकर पर ले लिया। कोठरी में बंसल की आवाज़ गूँज उठी — धीमी, नपी-तुली, पर उसमें वो ज़हर था जो सिर्फ़ पैसे वाले आदमी की आवाज़ में होता है।

"इरा," बंसल ने कहा, "मैं तुम्हें आख़िरी बार चेता रहा हूँ। तुम्हारा कैमरा, तुम्हारी टीम, तुम्हारी नौकरी — सब मेरे हाथ में है। अगर रविवार को तुम्हारा कैमरा उस मैदान में दिखा, तो तुम्हारी नौकरी नहीं जाएगी…"

वो रुका। कोठरी में सबकी साँसें रुक गईं।

"तुम्हारी जान जाएगी," बंसल ने पूरा किया।

रवि ने फ़ोन छीनने के लिए हाथ बढ़ाया, पर इरा ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया। उसकी आँखें सूखी थीं, पर उसकी आवाज़ में कोई काँप नहीं थी।

"सर," उसने कहा, "ये धमकी आप पिछले हफ़्ते भी दे चुके हैं। कुछ नया बताइए।"

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