Billionaire Empire System – Chapter 813
पाँच मिनट बाद वो सड़क पर थे। रवि के घुटने से खून बह रहा था, और उसकी साँस इतनी तेज़ थी कि वो बोल नहीं पा रहा था। क़ासिम भाई एक पेड़ के नीचे बैठ गए, उनका बुढ़ापा उन्हें हरा रहा था।
"बेटा," क़ासिम भाई ने कहा, "तू… तूने कैसे किया? वो अंधेरा कैसे—"
"बाद में, क़ासिम भाई," रवि ने कहा। "अभी चलिए। मुझे… मुझे तीन दिन नहीं हैं। मेरे पास सिर्फ़ कुछ घंटे हैं।"
वो थाने के पिछले रास्ते से गए। रघुवीर सिंह पीछे के चौकीदार के कमरे में बैठे चाय पी रहे थे। जब रवि ने दरवाज़ा खोला, तो उन्होंने पहले कप पकड़ा, फिर रवि का चेहरा देखा — खून से भरी हथेली, कीचड़ में लथपथ कपड़े, और आँखों में वो चीज़ जो पहले नहीं थी — सिर्फ़ डर नहीं, कुछ और भी।
"क्या हुआ?" रघुवीर खड़े हो गए।
रवि ने टेप उनके हाथ में रखी।
"ये वो रात है, साहब," उसने कहा। "इसमें ज़ुबैर की आवाज़ है। वो खुद कह रहा है कि उसने पापा को…" उसका गला रुंध गया। उसने साँस ली और पूरा किया — "मारा क्यों था।"
रघुवीर ने टेप को उलट-पलटकर देखा, फिर रवि के चेहरे पर, फिर टेप पर, और फिर अपनी मेज़ की तरफ़। बत्ती की रोशनी में उनका पसीने वाला चेहरा चमक रहा था। उन्होंने जेब से रूमाल निकाला, माथा पोंछा, और अपनी कुर्सी पर धम से बैठ गए।
"रवि," उन्होंने कहा, "ये टेप चलेगा।"
रवि की साँस रुक गई। "सच, साहब?"
"पर तीन दिन में नहीं।" रघुवीर ने उँगली उठाई। "कल सुबह। और सुन — सिर्फ़ टेप से कुछ नहीं होगा। जज साहब कहेंगे, टेप में किसकी आवाज़ है, कैसे साबित करोगे? ज़ुबैर का वकील पूरी दुनिया को नचा देगा।"
रवि के चेहरे का रंग उतरने लगा। "तो?"
रघुवीर कुछ देर चुप रहे। उन्होंने मेज़ की दराज़ खोली, उसमें से पुरानी फ़ाइलों का ढेर हटाया, और सबसे नीचे से एक पीला काग़ज़ निकाला — फटा हुआ, मुड़ा हुआ, जिस पर कुछ हिसाब लिखा था।
"मैंने दस साल पहले इस केस को बंद होते देखा था," उन्होंने कहा। "उस दिन मैंने अपने आप से कसम खाई थी कि अगर कभी मौक़ा मिला, तो…" वो रुक गए। "अब वो मौक़ा आ गया है। पर हमें जज साहब को सिर्फ़ एक काग़ज़ दिखाना है — और वो काग़ज़ तेरे पास नहीं है।"
"कौन सा?" रवि ने पूछा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडी सी बेचैनी थी जो बहुत कम लोगों ने सुनी थी।
रघुवीर ने काग़ज़ मेज़ पर रखा और उस पर हाथ फेरा, जैसे कोई पुरानी चीज़ को सहला रहा हो।
"सेवा सदन ट्रस्ट का मूल रजिस्टर," उन्होंने धीरे से कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। "जिस पर उन्नीस सौ लोगों के हस्ताक्षर हैं। जिस पर तुम्हारे पापा का भी हस्ताक्षर है। और जो…" उन्होंने रवि की आँखों में देखा, "बलवंत के बंगले की तिजोरी में रखा है।"
कमरे में इतनी ख़ामोशी छा गई कि बाहर चौकीदार के बजते हुए तबले की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी।
मेहरा ने पहले क़ासिम भाई को देखा, फिर रवि को। क़ासिम भाई बेंच पर बैठे थे, हाथ जोड़े हुए, आँखें बंद। और रवि ने वो साँस ली जो वो हर मुश्किल से पहले लेता था — गहरी, धीमी — और फिर उसने अपनी जेब से चाँदी की घड़ी निकाली। हथेली में रखी, और उसकी टिक-टिक सुनने लगा।
घड़ी चल रही थी। बिना रुके।
॥
रघुवीर सिंह के हाथ से वो पीला काग़ज़ छूटते-छूटते बचा। उन्होंने उसे दोनों हाथों से पकड़ लिया, जैसे कोई कीमती चीज़ हो। चौकीदार के कमरे में तबले की आवाज़ बंद हो गई थी, और बाहर से सिर्फ़ कुत्तों के भौंकने की आवाज़ आ रही थी।
"साहब," रवि ने धीरे से कहा, "ये काग़ज़ क्या है?"
रघुवीर ने उसे मेज़ पर रखा और उँगली उस पर रख दी, जैसे उसे उड़ने से रोक रहे हों।
"मैंने ये काग़ज़ दस साल पहले छिपाया था," उन्होंने कहा। "उस रात जब तेरे पापा की लाश उठी थी, मैं चौकी पर ड्यूटी पर था। सुबह मैंने देखा कि केस की फ़ाइल में से कुछ पन्ने ग़ायब हैं। मैंने पूछा, तो मुझे डाँट पड़ी — 'अपना काम कर, दूसरों का नहीं।' उस दिन के बाद मैंने ये पन्ने अपनी जेब में रख लिए, और कभी किसी को नहीं दिखाए।"
रवि ने काग़ज़ को ध्यान से देखा। ऊपर कोने में ट्रस्ट की मुहर थी, और नीचे एक लंबी लाइन में हस्ताक्षर — छोटे-छोटे, झुके हुए।
"ये पापा की लिखाई है," उसने कहा। उसकी आवाज़ फूट रही थी।
"हाँ," रघुवीर ने कहा। "और यही काग़ज़ ये साबित करता है कि ट्रस्ट के उन्नीस सौ लोगों का पैसा किसने निकाला। बलवंत के पास ये नहीं होना चाहिए था, पर उसने इसे बंगले की तिजोरी में रख लिया। उसे लगा कि इससे वो सबसे सुरक्षित है।"
"तो फिर सीधा थाने से रेड क्यों नहीं?" रवि ने पूछा। "आपके पास टेप है, आपके पास ये काग़ज़ है—"
"रवि, बेटा।" रघुवीर ने कुर्सी की पीठ पर हाथ रखा। "तिवारी शहर का एस.एच.ओ. है। अगर मैं आज रात रेड की अर्ज़ी लिखूँगा, तो सुबह तक बलवंत को ख़बर मिल जाएगी। और फिर हम कभी उस तिजोरी तक नहीं पहुँचेंगे। हमें खुद अंदर जाना होगा। और ये सिर्फ़ तुम कर सकते हो।"
कमरे में चुप्पी छा गई। इरा ने सामने देखा, लुट्टन ने कुछ गुनगुनाया, और रवि ने अपनी चाँदी की घड़ी जेब से निकाल ली। उसकी हथेली में रखी, वो धीरे-धीरे टिक-टिक कर रही थी।
"बंगले में कैसे घुसेंगे?" रवि ने पूछा।
रघुवीर कुछ कहने ही वाले थे कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। रोहित राय अंदर आया — सफ़ेद कुर्ते में, बाल बिखरे हुए, आँखों के नीचे काला। वो सीधा रवि के सामने आकर खड़ा हो गया।
"मैं जानता हूँ," रोहित ने कहा। "मेरे पापा की तिजोरी बंगले के दूसरे माले पर है। उनके बेडरूम के पीछे वाले कमरे में। चाबी उनके गले की सोने की चेन में रहती है — रात में भी वो उतारते नहीं।"
रवि ने उसकी तरफ़ देखा। "तुम अपने पापा के ख़िलाफ़ जा रहे हो।"
रोहित ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस मुँह फेर लिया और खिड़की से बाहर देखने लगा। बाहर अंधेरा था, और गली में एक भी बत्ती नहीं जल रही थी।
"बंगले में रात को कितने आदमी रहते हैं?" रघुवीर ने पूछा।
"दो पहर बाद सिर्फ़ तीन," रोहित ने कहा। "जग्गू मुख्य दरवाज़े पर, एक आदमी पिछली गैलरी में, और एक बापा के कमरे के बाहर। बाक़ी सब शहर में छुट्टी पर चले जाते हैं। पापा को लगता है कि कोई उन तक नहीं पहुँच सकता।"
"और कुत्ते?" रवि ने पूछा।
"दो भुजंग।" रोहित ने मुँह बनाया। "उन्हें चारा देने वाला आदमी रात नौ बजे जाता है, फिर सुबह चार बजे। बीच में वो पिछली दीवार के पास सोते हैं।"
रघुवीर ने काग़ज़ सावधानी से अपनी जेब में रखा। "मैं चौकी पर तैयार रहूँगा। जब तुम रजिस्टर लेकर निकलोगे, तो मुझे फ़ोन करना। मैं एक घंटे के अंदर तीन गाड़ियाँ लेकर पहुँच जाऊँगा। पर रवि," उन्होंने उँगली उठाई, "अगर तुम पकड़े गए, तो मैं कुछ नहीं कर पाऊँगा। तिवारी मुझे भी उसी रात के हवाले से अंदर कर देगा।"
रवि ने सिर हिलाया। "समझ गया।"
वो चारों थाने से निकलकर सीधे रवि की दुकान के पीछे वाली कोठरी में पहुँचे। रास्ते में मीरा भी आ मिली — वो अखाड़े से सीधी आ रही थी, शरीर पर पसीना और आँखों में वो शांत आग जो रवि ने पहली बार तब देखी थी जब वो गिरी हुई थी और मीरा ने उसे उठाया था।
कोठरी में एक मोमबत्ती जल रही थी। उसकी लौ हवा से काँप रही थी। दीवारों पर पुराने बर्तन टँगे थे, कोने में पापा की खुरदुरी मेज़ रखी थी, और उस पर धूल की मोटी परत जमी थी। लुट्टन ने अपनी जेब से पान निकाला और उसे चबाने लगा, और इरा ने अपना लैपटॉप बैग ज़मीन पर रख दिया।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno